We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Thursday, August 14, 2025

क्या दादी-नानी के नुस्खे जल्द लुप्त हो जायेंगे?

“दादी, पेट में बहुत दर्द हो रहा है।” छोटी सी बच्ची अपने दर्द से कराहते हुए अपनी दादी से कहती है। मम्मी डॉक्टर से अपॉइंटमेंट की कोशिश में लगी हैं, पर तब तक तो बिटिया को राहत नहीं। दादी मुस्कराते हुए एक गिलास गर्म पानी मंगवाती हैं, किचन की आलमारी से अजवाइन का चूर्ण निकालती हैं और बच्ची को एक चम्मच अजवाइन के साथ वह गर्म पानी दे देती हैं। कुछ ही समय में वह बच्ची फिर से खेल में मग्न हो जाती है। तब तक तो डॉक्टर के क्लिनिक का फोन भी नहीं मिला।

ऐसे दृश्य अब भी कई घरों में देखने को मिलते हैं, पर क्या यह अगली पीढ़ी में भी ऐसे ही जारी रहेंगे? यह एक बड़ा सवाल है।

आज की पीढ़ी विज्ञान-आधारित चिकित्सा पर ही विश्वास करती है, और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। परंतु समस्या तब होती है जब वे पारंपरिक घरेलू ज्ञान को पूरी तरह नकार देते हैं। वह ज्ञान जो अनुभवों की परतों से गुजरकर पनपा, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया। क्या वह अब केवल किताबों और इंटरनेट आर्टिकल्स में ही रह जाएगा?

हममें से अधिकांश ने अपने बचपन में दादी-नानी के नुस्खों का लाभ लिया है। घर के किचन में ही एक मिनी मेडिकल स्टोर जैसा इंतज़ाम होता था। अजवाइन, हींग, सौंफ, हल्दी, दालचीनी, तुलसी, लौंग, शहद, घी… – ये सभी ना सिर्फ़ स्वाद के लिए बल्कि सेहत के लिए भी जरूरी माने जाते थे।

अगर गला खराब हो जाए तो गरम पानी में नमक डालकर गरारा करना, कफ की समस्या हो तो अदरक और शहद का मिश्रण, नींद नहीं आ रही हो तो गर्म दूध में थोड़ा सा जायफल – ये सभी नुस्खे हमारे जीवन का हिस्सा रहे हैं।

यही नहीं, जीवनशैली से जुड़े कई ऐसे नियम भी होते थे जिन्हें हम बिना समझे पालन करते थे। जैसे – रात में दही न खाना, या खाली पेट नींबू पानी से दिन की शुरुआत करना। ये बातें केवल परंपरा नहीं थीं, इनके पीछे विज्ञान छुपा था – बस अभिव्यक्ति अलग शैली में होती थी।

आज के आधुनिक जीवन की गति इतनी तेज हो गई है कि वहां ठहरकर कोई दादी का मसाला डब्बा खोलने का समय नहीं। बाजार में मिलने वाली “इंस्टेंट रिलीफ” की गोलियों और सिरप ने हमारी धैर्य की परीक्षा ही बंद कर दी है। फिर चाहे वह साइड इफेक्ट के साथ क्यों न आए।

दूसरी ओर, बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, पर उनका ज्ञान अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंच रहा। नई पीढ़ी उनसे संवाद कम कर रही है, और बुजुर्गों का आत्मविश्वास भी कम हो गया है। वे अपने नुस्खे या सलाह देने में संकोच करने लगे हैं क्योंकि बच्चों को अब “गूगल” ज्यादा विश्वसनीय लगता है।

पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमें खुद से पूछना चाहिए – क्या केवल एलोपैथिक इलाज से हर समस्या का समाधान संभव है? क्या हम परंपराओं को पूरी तरह छोड़कर वास्तव में समृद्धि की ओर जा रहे हैं, या एक गहरे खालीपन की ओर?

आयुर्वेद, सिद्ध चिकित्सा, यूनानी और होम्योपैथी जैसी पद्धतियां केवल वैकल्पिक नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के परीक्षण की कसौटी पर खरी उतरी पद्धतियां हैं। पर इनका मूल आधार है – शरीर को समझना, प्रकृति से तालमेल और धैर्य। और यह धैर्य आज की पीढ़ी में बहुत कम है।

दादी-नानी के ये नुस्खे सिर्फ उपचार नहीं थे, वे एक जुड़ाव थे – परिवार से, प्रकृति से और अपनी जड़ों से। जब दादी बच्चे के माथे पर हाथ रखती थीं और कहती थीं – “कुछ नहीं हुआ, बस थोड़ा आराम कर लो” – तो वह स्पर्श ही आधा इलाज बन जाता था। यह भावनात्मक उपचार भी अब दुर्लभ होता जा रहा है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह ज्ञान यदि संरक्षित नहीं किया गया तो अगली पीढ़ियां इससे वंचित रह जाएंगी। आज आवश्यकता है कि हम इस पारंपरिक ज्ञान को दस्तावेज़ करें, बच्चों को सिखाएं, और घर में इसे पुनः सक्रिय करें। चाहे वह एक नोटबुक हो जिसमें दादी के नुस्खे लिखे हों, या बच्चों के साथ बैठकर मसालों के उपयोग की कहानी सुनाना – हर प्रयास मूल्यवान है।

शायद हमें स्कूलों में ‘परंपरागत स्वास्थ्य ज्ञान’ जैसी वैकल्पिक शिक्षा आरंभ करनी चाहिए, जिससे बच्चे आधुनिकता और परंपरा के संतुलन को समझें।

दादी-नानी के नुस्खे एक धरोहर हैं – अनुभव, संवेदना और प्रकृति से जुड़ाव की। उन्हें खो देना केवल ज्ञान की हानि नहीं, सांस्कृतिक विरासत की क्षति भी है।

इसलिए आइए, इस विलुप्त होते खजाने को संजोएं, सहेजें और साझा करें, ताकि अगली पीढ़ियां जब पूछें “दादी, क्या करना है?” तो सही उत्तर देने वाली कोई दादी-नानी हो घर में, न कि सिर्फ आपके माबाईल स्क्रीन पर।

Longevity is Rising — But Is Wellness Also Increasing?

One of the most striking features of modern life is the steady increase in longevity. People today are living much longer than previous generations. Yet, paradoxically, the number of those suffering from chronic ailments, both physical and mental, has risen alarmingly.

If we glance back just a few decades, in an average family, when someone passed away after the age of 65, people would say — “he lived a full life.” That was considered a satisfactory lifespan. But today, it is common to see people well into their 70s and 80s, many of them active and mobile — provided they’ve been fortunate enough to avoid serious diseases.

To put this in perspective, the official life expectancy in India in the 1980s was around 54-55 years. By the year 2000, it had risen to about 63 years, and today it stands close to 71 years, with many individuals comfortably surpassing that. Globally, life expectancy has also climbed, thanks to medical advancements, better health awareness, and improved living conditions.

However, this gift of extended life brings with it an important question — are we adding healthy years to life, or just more years of sickness and dependence? Sadly, for many, it is the latter.

It is not uncommon to find young individuals today grappling with ailments like diabetes, hypertension, obesity, and anxiety. What was once termed as “lifestyle diseases” among the middle-aged has now become prevalent even among people in their 20s and 30s. Our fast-paced lives, poor dietary habits, lack of physical exercise, polluted environments, and relentless mental stress have all taken a heavy toll on health.

Recently, I had the privilege of interacting with two revered saints. Both emphasized a profound yet simple wisdom drawn from our ancient scriptures: “Man should aspire to live a full life of 100 years — but only through a life of discipline, balance, and self-awareness.” The idea is not just to live long but to live well and purposefully.

For those already in their senior years, the path to a perfectly disciplined life might seem a bit late to traverse fully. Yet, it is never too late to adopt healthier habits, stay active mentally and physically, and cultivate joy and contentment in daily living. Small changes can still yield significant improvements in quality of life.

But for the younger generation, the message is even more crucial. The time to lay the foundation for a healthy, vibrant, and fulfilling old age is now. Health, like wealth, compounds over time — good habits adopted early can pay rich dividends later. We should adopt a disciplined lifestyle at home and introduce its education in schools from an early age. Only then can the seeds of good health be sown in childhood itself. A healthy individual is not just a blessing for oneself but also for the family, society, and the nation. A healthy body nurtures healthy thoughts and energy, which form the foundation of a progressive society. Therefore, health should not be seen as a personal responsibility alone but embraced as a social duty.
Longevity, after all, is a blessing. But longevity paired with vitality and well-being is the real goal.

A Personal Reflection

As I reflect on these truths, especially having crossed the threshold of what was once considered old age, I find myself valuing health more than ever. I realise that while we may not control how long we live, we certainly influence how well we live. Observing friends, peers, and family — some thriving in their 80s while others struggle in their 60s — makes this contrast even starker.

This is my gentle reminder to myself and to all who read this: let us not wait for illness to wake us up to health. Whether we are 30 or 70, today is the best time to begin caring for our body, mind, and soul. Let us embrace habits that nourish us, relationships that uplift us, and a mindset that keeps us curious and cheerful.

Let us aspire not just for a longer life, but for a life that remains meaningful, graceful, and joyful till the very end.

उम्र बढ़ रही है, स्वस्थता भी बढ़ी क्या?

आज का समय मानव जीवन में एक अनोखा परिवर्तन लेकर आया है — औसत जीवन प्रत्याशा लगातार बढ़ती जा रही है। लोग पहले की तुलना में कहीं अधिक उम्र तक जी रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही एक चिंताजनक बात यह भी है कि बीमार लोगों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है।

कुछ दशक पहले तक किसी परिवार में यदि कोई व्यक्ति 65 वर्ष की उम्र पार कर मृत्यु को प्राप्त होता था तो कहा जाता था — “अच्छी उम्र पाई।” लेकिन आज 75-80 वर्ष की उम्र में भी लोग सक्रिय और चलते-फिरते नजर आते हैं — बशर्ते वे किसी गंभीर बीमारी के शिकार न हुए हों।

अगर हम आंकड़ों की बात करें तो भारत में 1980 के दशक में औसत जीवन प्रत्याशा करीब 54-55 वर्ष थी। वर्ष 2000 तक यह बढ़कर 63 वर्ष हुई और आज यह करीब 71 वर्ष है। विश्व स्तर पर भी यह औसत बढ़ा है। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और बेहतर जीवनशैली ने इसमें योगदान दिया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हम इन बढ़ते वर्षों में सेहतमंद जीवन भी जोड़ पा रहे हैं या बस बीमारियों से ग्रस्त लाचार जीवन बढ़ा रहे हैं? दुर्भाग्यवश, अधिकतर के लिए उत्तर सकारात्मक नहीं है।

आज हम देखते हैं कि युवा भी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं — मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, चिंता, अवसाद — ऐसी बीमारियाँ जो पहले अधेड़ उम्र वालों में होती थीं, अब 20-30 की उम्र में ही दिख रही हैं। अनियमित खानपान, व्यायाम की कमी, तनावपूर्ण जीवनशैली, और प्रदूषण ने इस स्थिति को और भयावह बना दिया है।

हाल ही में मुझे दो संतों से संवाद करने का अवसर मिला। दोनों ने हमारे शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को 100 वर्ष तक जीने की कामना करनी चाहिए, लेकिन उसके लिए संयमित, अनुशासित और संतुलित जीवन जरूरी है। जीवन की लंबाई तभी सार्थक है जब उसमें स्वास्थ्य, संतुलन और उद्देश्य बना रहे।

वरिष्ठजनों के लिए अनुशासित जीवन अपनाने में भले ही कुछ देर हो चुकी हो, फिर भी जो कुछ भी बेहतर किया जा सकता है, उसे करना चाहिए ताकि जीवन का अंतिम पड़ाव भी सुखद और संतोषजनक हो।

युवाओं के लिए यह सीख और भी जरूरी है। अच्छा स्वास्थ्य बचपन और युवावस्था में डाली गई आदतों पर निर्भर करता है। जिस प्रकार धन पर ब्याज मिलता है, उसी तरह स्वास्थ्य में भी अच्छे कर्मों का चक्रवृद्धि लाभ है। अनुशासित जीवन शैली घरों में अपनाना चाहिए और स्कूलों में इसकी शिक्षा आरंभ करनी चाहिए। तभी बचपन से ही अच्छे स्वास्थ्य के बीज बोए जा सकते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति न केवल स्वयं के लिए, बल्कि परिवार, समाज और देश के लिए भी वरदान होता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ विचार और ऊर्जा का वास होता है, जो समाज की प्रगति का आधार बनते हैं। इसलिए स्वास्थ्य को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी न मानें, इसे सामाजिक कर्तव्य की तरह अपनाना होगा।

दीर्घायु होना तो वरदान है, लेकिन स्वस्थ दीर्घायु होना उससे भी बड़ा आशीर्वाद है।

एक व्यक्तिगत विचार

जब मैं स्वयं अपने जीवन की ओर देखता हूं — उस उम्र में पहुँचकर जिसे कभी ‘बुढ़ापा’ कहा जाता था — तो महसूस करता हूं कि जीवन की असली संपत्ति स्वास्थ्य ही है। जीवन कितने वर्ष का होगा, यह ईश्वर के हाथ में है, लेकिन कैसे जियेंगे, यह हमारे हाथ में है।

दोस्तों, परिचितों, परिवारजनों को देखकर यह अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है — कोई 80 की उम्र में भी प्रसन्न और सक्रिय है तो कोई 60 में ही बीमारियों से जूझ रहा है।

इसलिए मैं स्वयं को और आप सभी को यह स्मरण कराना चाहता हूं कि — बीमारी आने का इंतजार मत कीजिए, आज से ही स्वास्थ्य को अपना पहला लक्ष्य बनाइए। उम्र चाहे जो भी हो, अभी से शरीर, मन और आत्मा की देखभाल आरंभ करें। ऐसे संबंध बनाइए जो आपको सकारात्मक ऊर्जा दें, ऐसी दिनचर्या अपनाइए जो आपको स्वस्थ बनाए, और ऐसा दृष्टिकोण रखिए जो जीवन को आनंदमय बनाए।

आइए, हम केवल लंबा जीवन नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, गरिमामय और आनंदपूर्ण जीवन जीने का संकल्प लें — अंत तक।

Thursday, July 24, 2025

Seniors Must Embrace Change

 A question for everyone — do you remember any of your oldest memories that still excite you when you think about them? Perhaps a childhood game, playful fights with siblings, or moments spent with classmates in school. Recall those times when small quarrels had a certain sweetness, and everything returned to normal within moments. Trips with family to a relative’s house during holidays or pilgrimages to sacred places — these are just some of the many memories that remain alive in our hearts even today.

Now the question arises — are today’s children or our grandchildren experiencing similar emotions? Perhaps not. Life today has transformed significantly. The family structure has changed, nuclear families are now common, social interaction has reduced, and the digital age has created an entirely new world for children.

This change is not confined to social settings alone; it extends to technology, thinking, education, relationships, lifestyle — in fact, every sphere of life has evolved. To assume that change is wrong simply because it is different from our times is a negative perspective. Change is the eternal truth of life. Every generation considers what they experience in their time as the ideal.

It is the responsibility of seniors not to view these changes merely with criticism, but to understand and accept them. If we wish to maintain a connection with the younger generation, it is essential to understand their world and adapt ourselves accordingly.

Today’s children study online, build friendships on social media, video games are part of their daily routine, and the internet has broadened their knowledge base. While all this may seem unfamiliar or uninteresting to us, it is through these mediums that they are developing their interests, understanding, and capabilities.

If seniors reject these changes, the gap between generations will only widen. On the other hand, if they approach these new developments with curiosity and a willingness to learn, it can be a new journey for them too. Mobile phones, the internet, online banking, social media — all of these can be useful to us as well, provided we are ready to adopt them. Many elderly individuals are indeed learning new things. The challenge, however, is that technology evolves and upgrades so rapidly that it becomes difficult to keep up.

Moreover, change is not limited to technology alone. Social values, relationship dynamics, and lifestyles have also transformed. Joint families have given way to nuclear families. Life once had a slower, more patient rhythm — today, it’s a fast-paced race. Needs were once limited, but now options and aspirations have multiplied.

In such a scenario, the role of seniors becomes even more important. They can guide the younger generation with their experience, life values, and simplicity — but this is possible only if they themselves are willing to move forward with time. We cannot stop the flow of time, but we can certainly flow with it and shape our own direction.

We must also understand that change does not only come from the outside — it begins within. Only when our thinking is flexible can we remain relevant in a changing world. If we want to connect with our grandchildren, we must make an effort to understand their games, their studies, their technology. Only then will they be interested in listening to our experiences and learning from them.

Many seniors complain that no one listens to them anymore, that children are busy, and families don’t have time. But have we ever thought about whether we’ve tried to truly engage with them? When we try to see things from their perspective, they too will respect our feelings and experiences.

Therefore, if we want to maintain our role within the family and have our voice heard in society, we must accept change and be willing to change ourselves. Age should not merely be a count of years, but a reflection of experience, understanding, and adaptability. Remember, times change, but core values remain the same — love, belonging, dialogue, and cooperation. If we embrace change while holding on to these values, life can remain beautiful at every age.

(Adapted from my Hindi article of the week.)

वरिष्ठजन बदलाव को स्वीकार करें

एक प्रश्न सभी से — क्या आपको अपनी सबसे पुरानी ऐसी कोई बात याद है, जिसे सोचते ही आज भी रोमांच हो उठता है? कभी बचपन का कोई खेल, कभी भाइयों-बहनों के साथ की तकरार या स्कूल में सहपाठियों के साथ बिताए पल। याद कीजिए वह समय जब छोटे-छोटे झगड़े भी होते थे लेकिन उनमें एक मिठास होती थी। थोड़ी देर में सब सामान्य हो जाता था। परिवार के साथ छुट्टियों में किसी रिश्तेदार के यहां जाना या किसी तीर्थ स्थल की यात्रा — ऐसे अनेक पल जो आज भी स्मृतियों में जीवित हैं।

अब प्रश्न उठता है — क्या आज के बच्चे या हमारे पोते-पोतियां ऐसी ही भावना से गुजर रहे हैं? शायद नहीं। आज का जीवन परिवर्तित हो चुका है। परिवारों का ढांचा बदल गया है, एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ा है, सामाजिकता कम हो गई है और डिजिटल युग ने बच्चों की दुनिया ही अलग बना दी है।

यह बदलाव केवल सामाजिक परिवेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक, सोच, शिक्षा, संबंध, रहन-सहन या यूं कहें तो हर क्षेत्र में परिवर्तन आया है। यह मान लेना कि बदलाव गलत है, केवल इसलिए कि वह हमारे समय से भिन्न है, यह दृष्टिकोण नकारात्मक ही माना जाएगा। परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य है। हर पीढ़ी अपने समय में जो कुछ जीती है, वही उसके लिए आदर्श बनता है।

वरिष्ठजनों का दायित्व है कि वे इस बदलाव को केवल आलोचना की दृष्टि से न देखें, बल्कि इसे समझें और स्वीकार करें। यदि हम नई पीढ़ी के साथ संवाद स्थापित रखना चाहते हैं तो उनकी दुनिया को समझना और उसमें खुद को ढालना आवश्यक है।

आज बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं, मित्रता भी सोशल मीडिया पर निभाते हैं, वीडियो गेम्स उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, और ज्ञान का दायरा इंटरनेट ने व्यापक कर दिया है। यह सब भले ही हमें अपरिचित और शुष्क लगे, लेकिन इन्हीं में वे अपनी रुचि, समझ और सामर्थ्य का विकास कर रहे हैं।

यदि वरिष्ठजन इस परिवर्तन को अस्वीकार कर देंगे तो पीढ़ियों के बीच की दूरी और बढ़ती जाएगी। दूसरी ओर यदि वे जिज्ञासा के साथ इन नई चीजों को सीखने का प्रयास करें तो उनके लिए भी यह एक नयी यात्रा बन सकती है। मोबाइल फोन, इंटरनेट, ऑनलाइन बैंकिंग, सोशल मीडिया — ये सब हमारे लिए भी उपयोगी हो सकते हैं बशर्ते हम इन्हें अपनाने को तैयार हों। ज्यादातर बुजुर्ग लोग भी बहुत कुछ सिख रहे हैं। दिक्कत यह होती है कि इनकी तकनिक में इतनी जल्दी जल्दी परिवर्तन या अपग्रेडेशन होते हैं कि उनके साथ चलना मुश्किल हो जाता है।

साथ ही, बदलाव का अर्थ केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं है। सामाजिक मूल्यों, संबंधों के स्वरूप और जीवनशैली में भी परिवर्तन आया है। पहले संयुक्त परिवार होते थे, आज एकल परिवार हैं। पहले जीवन में धीमापन और धैर्य था, आज भागमभाग है। पहले जीवन सीमित आवश्यकताओं तक सिमटा था, अब विकल्प और आकांक्षाएं बढ़ गई हैं।

ऐसे में वरिष्ठजनों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे अपने अनुभव, जीवन मूल्य और सादगी की शिक्षा देकर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन कर सकते हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब वे खुद समय के साथ चलने को तैयार हों। समय की धार को रोकना संभव नहीं है, लेकिन उसमें बहना और अपनी दिशा बनाना अवश्य संभव है।

हमें यह भी समझना होगा कि बदलाव केवल बाहर नहीं आता, भीतर से भी आता है। जब हमारी सोच लचीली होगी, तब ही हम बदलती दुनिया में प्रासंगिक बने रह सकते हैं। यदि हम अपने पोते-पोतियों से संवाद करना चाहते हैं, तो उनके खेल, उनकी पढ़ाई, उनकी तकनीक को जानने का प्रयास करना होगा। तभी वे भी हमारे अनुभवों को सुनना और समझना चाहेंगे।

कई वरिष्ठजन शिकायत करते हैं कि अब कोई सुनता नहीं, बच्चे व्यस्त हैं, परिवार समय नहीं देता। पर हमने कभी सोचा कि क्या हमने उनके साथ समरसता का प्रयास किया? जब हम खुद को उनके नजरिए से देखने का प्रयास करेंगे तभी वे भी हमारी भावनाओं का सम्मान करेंगे।

इसलिए, यदि हम चाहते हैं कि परिवार में हमारी भूमिका बनी रहे, समाज में हमारी बातों को सुना जाए, तो हमें बदलाव को स्वीकार कर, स्वयं में भी बदलाव लाना होगा। उम्र का अर्थ केवल वर्षों की गिनती नहीं, बल्कि अनुभव, समझ और लचीलापन होना चाहिए। ध्यान रहे, समय बदलता है, पर मूल्य वही रहते हैं — प्यार, अपनापन, संवाद और सहयोग। हम इन मूल्यों के साथ बदलाव को अंगीकार करें, तो जीवन हर उम्र में सुंदर हो सकता है।

बुढ़ापा, अभी न आ…

कुछ दिनों पहले की बात है। मैंने 75 वर्ष की उम्र पार कर ली। जीवन की इस अवस्था में जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है जैसे समय पंख लगाकर उड़ गया। अब सामने बुढ़ापा खड़ा है, और ऐसा लगता है जैसे वह कुछ ज्यादा ही तेजी से मेरी ओर बढ़ रहा है। यह एहसास और भी गहरा तब हो जाता है, जब सफर में अजनबी लोग मुझे “अंकल जी” कहकर संबोधित करते हैं। घर-परिवार और मित्रों की बातचीत भी उम्र को केंद्र में रखकर ही चलती है – कि अब क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उस समय मन में एक विद्रोही विचार आता है – “क्या मैं अब भी यह कह सकता हूं कि बुढ़ापा, अभी न आ!”

याद आने लगते हैं वे दिन – भले ही 50 साल पहले की बात हो, पर लगता है जैसे कल ही की हो। कभी हम दौड़ते-भागते थे, उफान से भरे हुए, और आज… आज एक वॉकिंग स्टिक का सहारा चाहिए। शरीर धीरे-धीरे थकता है, पर मन अब भी जवान रहना चाहता है। कहीं पढ़ा था, या शायद किसी संत के प्रवचन में सुना था, कि भगवान ने मनुष्य को 100 वर्ष की उम्र दी है, लेकिन साथ ही अनुशासन, संयम और सजगता का पालन करने को भी कहा है। खानपान, व्यायाम और मानसिक विचारों में संतुलन रखा जाए तो यह उम्र आराम से पाई जा सकती है। पर शायद हम जीवन की दौड़ में इतना उलझे रहे कि इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया।

अब भूतकाल को बदला नहीं जा सकता, लेकिन वर्तमान हमारे हाथ में है। और भविष्य अभी भी हमारे प्रयासों पर निर्भर करता है। तो क्यों न इस बची हुई जिंदगी को ऐसे जिएं कि यह ‘सुनहरे वर्ष’ सच में सुनहरे बन जाएं?

हमें अब इस बात से कोई लाभ नहीं कि युवावस्था में क्या छूट गया, क्या करना था, और क्या नहीं किया। वह जिम्मेदारी अब नई पीढ़ी की है – और सच कहूं, वे हमारी बातों को सुनेंगे भी या नहीं, यह कहना कठिन है। हमने जो कहा, जो सिखाया, वह हमारे समय की भूमिका थी। अब समय है खुद पर ध्यान देने का – शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बने रहने का। हम क्या कर सकते हैं इस पर जरा विचार करे।

  1. बुढ़ापे से कहें – ठहरो अभी!
  2. स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें
  3. मानसिक सेहत का ध्यान रखें
  4. रिश्तों को संजोएं
  5. नए शौक विकसित करें
  6. सामाजिक योगदान में सक्रिय रहें

बुढ़ापे से कहें – ठहरो अभी!

हां, सबसे पहले तो यही प्रण लें कि बुढ़ापा अभी न आए। हम उसे बुलाने में थोड़ा विलंब कर सकते हैं, अगर हम चाहें तो। आप कहेंगे की कौन नहीं चाहेगा यह करना पर क्या हम अपनी जीवन शेली को आवश्यकतानुसार ढ़ालते है। और यहां पहले की बात नहीं करेंगे, कि क्या क्या कर सकते थे, हम केवल बात करेंगे कि अभी हम क्या कर सकते है।

स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें

हर दिन शरीर के लिए 2–3 घंटे अवश्य निकालें। योग, प्राणायाम, मॉर्निंग वॉक, हल्का व्यायाम – जो भी संभव हो, उसे आदत बनाएं। यह न सिर्फ शरीर को सक्रिय रखता है, बल्कि आत्मविश्वास भी बनाए रखता है। सब जानते है, पर सवाल तो यह है कि क्या हम इस का नियमित पालन करते है। मन में यह निश्चित करने की आवश्यकता है कि आलस्य किसी भी बहाने नहीं करना है।

मानसिक सेहत का ध्यान रखें

यह उम्र सबसे ज्यादा मनोबल के सहारे ही चलती है। सकारात्मक लोगों से मिलना, अच्छी किताबें पढ़ना, प्रेरणादायक लेखों या प्रवचनों को सुनना, मानसिक शक्ति को बनाए रखता है। नकारात्मकता से दूर रहें – यह एक धीमा ज़हर है, जो बुजुर्गों को सबसे पहले जकड़ता है। आजकल बहुत से ऐसे खेल आपको मिल जाएंगे जिसे खेलने से मानसिक सेहत सुधारने में सहयोग मिलता है। मेरे कुछ मित्रों ने सलाह दी कि क्रॉसवर्ड, सुडोकू जैसे मस्तिष्क के खेल नियमित रूप से करें। मैंने भी अब इन्हें अपनाया है। इससे याददाश्त बनी रहती है और मस्तिष्क की कार्यक्षमता बनी रहती है।

रिश्तों को संजोएं

इस उम्र में सबसे जरूरी है – संबंधों की गर्माहट। परिवार, मित्र, पड़ोसी – सभी से संवाद बनाए रखें। साझा हंसी, हल्की-फुल्की बातें, एक-दूसरे का सहारा – यही जीवन की सच्ची थकान को मिटाते हैं। कभी फोन करके हालचाल पूछ लें, कभी चाय पर बुला लें, कभी कोई पुरानी बात याद करके साथ हंस लें – ये सब जीवन में नई ऊर्जा भरते हैं। हम उम्र के लोगों के साथ आउटिंग पर जाना भी बहुत लाभदायक हो सकता है।

नए शौक विकसित करें

क्यों न अब कुछ नया शुरू किया जाए? पेंटिंग, बागवानी, संगीत, लेखन – वह सब जो जीवन की व्यस्तता में छूट गया था। ये शौक न सिर्फ रचनात्मक ऊर्जा देते हैं बल्कि अकेलेपन को भी दूर करते हैं। हो सकता है आप इनमें से कुछ में एक्सपर्ट हो – इनमें आप दुबारा नियमित अपने आप को व्यस्त करे। एक कदम और आगे बढ़ कर आप अपनी यह कला दूसरो के साथ भी बांट सकते है।

सामाजिक योगदान में सक्रिय रहें

हमारे अनुभव किसी खजाने से कम नहीं। बच्चों को और युवा को पढ़ाना का दायित्व आप ले सकते है। आप जब पढ़ाएंगे तो साथ में आप स्वाभाविक रुप में संस्कार भी देंगे। विचार किजिए इससे कितनो को आप लाभ पहुंचाएंगे। साथ ही आपको इस कार्य से जो खुशी मिलेगी उसका वर्णण करना मुश्किल है।

आपको बस मन में ठान लेना है कि अभी मन जवान है, बुढ़ापा ठहर जा। आपका सफर बाकी है और थकना मना है, भले आपकी उम्र कहती है रुक जा पर दिल तो कह रहा है चल। हमें सुनहरा बुढ़ापा नहीं, सक्रिय जीवन चाहिए। जीवन के इस मोड़ पर भी, हमारी उम्मीद जवान है, बुढ़ापा दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, पर मैंने ताला लगा दिया है, यहीं हमें मन में रखना है। हमें अपनी उम्र की नहीं, ऊर्जा की गिनती करनी हैं और इसे बढ़ाने का भरपूर प्रयास करना है।

Thursday, July 10, 2025

जीते जी प्रशंसा करिए, केवल विदाई पर नहीं

हमारा समाज एक विचित्र मनोवृत्ति से ग्रसित है — हम अक्सर किसी की अच्छाई तब ही खुलकर कहते हैं जब वह व्यक्ति हमारे बीच नहीं रहता। शमशान घाट या श्रद्धांजलि सभाएं — ये वो जगहें बन गई हैं जहां हम किसी के जीवन की महानताओं का उल्लेख करते हैं, उनके गुणों को सराहते हैं, और यह कहते नहीं थकते कि वह कितने नेक इंसान थे।
घाट पर अक्सर समूह में लोग बैठकर यही चर्चा करते हैं – “बहुत सज्जन थे, हर किसी की मदद को तत्पर रहते थे, परिवार का ख्याल रखते थे, समाज सेवा में भी आगे रहते थे…” और न जाने कितनी बातें। लेकिन यही सवाल अगर हम खुद से पूछें — क्या जब वह व्यक्ति जीवित थे तब भी हमने उनके इन गुणों की सराहना की थी? क्या कभी उनके सामने कहा था कि हम उनका कितना सम्मान करते हैं, या उनका व्यवहार हमें कितना प्रेरित करता है?

सच कहें तो अक्सर जवाब “नहीं” होता है। हम प्रशंसा करने में कंजूसी करते हैं। कहीं यह अहं का विषय बन जाता है, कहीं संकोच आड़े आ जाता है, तो कहीं यह सोच कि “इतनी भी क्या प्रशंसा करनी?” लेकिन जब व्यक्ति इस संसार को छोड़ जाते है, तब हम उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ने लगते हैं। सोचिए, इन शब्दों से उस व्यक्ति को क्या लाभ? वह तो इन शब्दों को सुनने के लिए अब नहीं रहा।

प्रशंसा की शक्ति:

हर इंसान के भीतर एक बच्चा होता है जो चाहता है कि उसे सराहा जाए, उसके प्रयासों को पहचाना जाए। प्रशंसा करना केवल शब्दों का खेल नहीं है, यह एक सजीव ऊर्जा है जो किसी के आत्मविश्वास को नई उड़ान देती है। अगर किसी ने अच्छा काम किया है, या उनके व्यवहार में कोई सुंदरता है — तो क्यों न उसे जीते जी यह कह दिया जाए?

जरा सोचिए, जब कोई हमें कहता है, “आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं”, तो हमें कितना अच्छा लगता है। दिल खुश हो जाता है, मन उत्साहित हो जाता है और हम और बेहतर करने की प्रेरणा पाते हैं। यही प्रभाव तब और अधिक होता है जब कोई हमारे गुणों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करता है। इससे न केवल वह व्यक्ति आनंदित होता है, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक लहर फैलती है।

प्रशंसा करने की संस्कृति को अपनाइए:

हमें यह समझना होगा कि प्रशंसा करने से कोई छोटा नहीं होता, बल्कि यह हमारे बड़े दिल और विशाल सोच का प्रमाण है। जब हम दूसरों के गुणों को खुले दिल से स्वीकारते हैं, तो हम एक बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाते हैं। ऐसे समाज की ओर, जहां प्रतिस्पर्धा की जगह प्रेरणा हो, ईर्ष्या की जगह सम्मान हो।

प्रशंसा करने का मतलब केवल शब्दों में कुछ अच्छा कह देना नहीं है — इसका तात्पर्य है कि हम किसी के अच्छे कार्यों को मान्यता देते हैं, उन्हें उनके जीवन में ही उनके योगदान के लिए सम्मानित करते हैं। यह सम्मान उनके आत्मबल को मजबूत करता है और उन्हें और भी अच्छा करने की प्रेरणा देता है।

सराहना करने से उपजता है सद्भाव:

जब आप किसी की सच्ची प्रशंसा करते हैं, तो आपके और उस व्यक्ति के बीच एक आत्मीयता पनपती है। यह संबंध केवल औपचारिक नहीं होता, बल्कि दिल से दिल का संबंध होता है। ऐसे संबंधों की बुनियाद होती है – समझ, प्रेम और परस्पर आदर।

सच्ची प्रशंसा वह संजीवनी है जो न केवल आत्मा को प्रफुल्लित करती है, बल्कि व्यक्ति को और बेहतर करने की प्रेरणा भी देती है। जब किसी के प्रयासों को ईमानदारी से सराहा जाता है, तो उसे अपने कार्य में मूल्य और उद्देश्य दिखाई देने लगता है। यह प्रशंसा आत्मविश्वास को बल देती है, थके कदमों को गति देती है और नए सपनों को आकार देती है। सच्चे शब्दों की यह ऊर्जा व्यक्ति को न केवल वर्तमान में उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करती है, बल्कि भविष्य में और ऊंचाइयों को छूने का साहस भी प्रदान करती है।
यह भी समझिए कि आपकी कही गई एक सकारात्मक बात, किसी के मन से निराशा का अंधेरा मिटा सकती है। वह व्यक्ति अगर किसी संघर्ष से गुजर रहा है, तो आपकी एक सच्ची प्रशंसा उसे जीवन की ओर लौटने का हौसला दे सकती है।

एक विनम्र आग्रह:

तो आइए, आज से ही यह संकल्प लें कि हम उन लोगों की प्रशंसा करेंगे जिनसे हम प्रभावित हैं — चाहे वे हमारे सहकर्मी हों, परिवारजन, मित्र, या कोई साधारण व्यक्ति, जिनकी कोई साधारण सी बात भी हमें छू जाती है।

मरने के बाद की गई प्रशंसा उस व्यक्ति तक नहीं पहुंचती। लेकिन जीते जी की गई तारीफ़ एक अमिट छाप छोड़ जाती है – न केवल सुनने वाले के हृदय में, बल्कि कहने वाले की आत्मा में भी। ध्यान रहे कि यह प्रशंसा या अभिनंदन आज करनी है, कल‌ पर न छोड़ें।

अनुभव की जीवित पुस्तकें हैं बुजुर्ग महिलाएं

जब भी बुजुर्गों की बात होती है, तो अधिकतर चर्चा पुरुषों के अनुभव, संघर्ष और योगदान पर ही केंद्रित रहती है। लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि हमारे घरों की बड़ी बुजुर्ग महिलाएं भी अनुभव की जीवित पुस्तकें हैं, जिनमें जीवन की अनगिनत कहानियाँ, परंपराओं की गहराई और व्यवहारिक ज्ञान छिपा हुआ है?

आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम अक्सर उस अनमोल खजाने को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो हमारे घर की बड़ी महिलाएं अपने भीतर समेटे बैठी होती हैं। वे न केवल परिवार की रीढ़ रही हैं, बल्कि समय के साथ उन्होंने समाज, रिश्तों और जीवन के प्रति जो समझ विकसित की है, वह नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का काम कर सकती है।

हमारे समाज में दादी-नानी का स्थान विशेष रहा है। उनके पास कहानियों का भंडार होता है, जिनमें न केवल मनोरंजन होता है, बल्कि जीवन मूल्य भी समाहित होते हैं। उनकी कहानियाँ हमें नैतिकता, सहिष्णुता, त्याग और प्रेम का पाठ पढ़ाती हैं। परंतु अफसोस की बात यह है कि अब हम इन बातों को ‘पुराना जमाना’ कहकर टाल देते हैं और उनका महत्व कम कर देते हैं।

बड़ी बुजुर्ग महिलाओं ने अपने जीवन में अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ देखी होती हैं — आर्थिक तंगी, सामाजिक बदलाव, पारिवारिक चुनौतियाँ — और इन सबसे पार पाकर उन्होंने जो धैर्य और समझ विकसित की है, वह किसी भी स्कूल या कॉलेज से नहीं सीखी जा सकती। उनके अनुभव हमें जीवन की कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाना सिखा सकते हैं।

आज की पीढ़ी तेज़ी से डिजिटल और व्यावसायिक दुनिया की ओर बढ़ रही है, लेकिन साथ ही वह मानसिक तनाव, अकेलेपन और असंतुलन से भी जूझ रही है। ऐसे में यदि हम अपने घर की बुजुर्ग महिलाओं से संवाद करें, उनके अनुभवों को सुनें, तो शायद हम एक संतुलित जीवन की दिशा में बढ़ सकें। वे हमें सिखा सकती हैं कि सीमित संसाधनों में भी खुश कैसे रहा जा सकता है, परिवार को एक सूत्र में कैसे बांधा जा सकता है, और विपरीत समय में कैसे धैर्य रखा जाता है।

उनकी इस समझ का हम लाभ कुछ इस प्रकार भी ले सकते हैं।

हमारे घरों में बुजुर्ग महिलाएं बहुत कुशलतापूर्वक आस पड़ोस के बच्चों को अपनी योग्यतानुसार तरह तरह के कौशल सिखा सकती है। इस उम्र में आकर सभी महिलाओं का पाक कला में निपुण होना तो स्वाभाविक ही है पर इसके अतिरिक्त अन्य कई कौशल सिखाने की क्षमता भी अनेकों में मिल जाएगी।

उदहारण स्वरूप अगर किसी में पढ़ाने की क्षमता है तो वो यह कार्य अविलंब शुरू कर सकती हैं, इस बढ़ी हुई उम्र में भी। हो सकता है बहुत तो शिक्षा के क्षेत्र से ही रिटायर हुए हों। अपने घर पर ही जरूरतमंद काम वाली के बच्चों को कोचिंग चाहिए तो उन्हें सहयोग कर सकती है। इसी तरह अगर पास ही कोई कन्सट्रंक्शन का काम चल रहा हो तो उन मजदूरों के बच्चों को भी पढ़ाने का बीड़ा उठाया जा सकता है। हम बहुत दान करते होंगे पर शिक्षा दान से अच्छा और क्या दान हो सकता है।

महिलाओं में सिलाई कढ़ाई का कौशल भरपूर होता है। ये जब छोटी थी तब तो यह सब सिखना अनिवार्य ही होता था। बहुतों को तो यह भी याद होगा कि उनको विवाह के समय यह पूछा जाता था कि वो क्या क्या सिलाई, कढ़ाई और बुनाई कर सकती है। अपने घरों पर जो काम वाली बाई आती है, उन्हें या उनकी लड़कीयों को यह कला सिखायी जा सकती हैं। उनको अतिरिक्त आय का साधन मिल जाएगा।

कितने तो अपने युवावस्था में गाने-बजाने में एक्सपर्ट रही होगी। वो अपनी इस कला को सिखा सकती है। ये तो कुछ उदाहरण हमने यहां दिये है। आपका ध्यान इस ओर भी ले जाना चाहेंगे कि कुछ ही माह पूर्व नेवर से रिटायर्ड यूट्यूब चैनल के लिए हमने एक 85 वर्षिय महिला से साक्षात्कार लिया था जो आज भी अपने घर में हस्तकला कर कुछ न कुछ बनाती रहती है। उनका समय अच्छे से व्यतीत हो जाता है और कुछ अतिरिक्त आय भी हो जाती है। हमारे नेवर से रिटायर्ड के यूट्यूब चैनल पर इनका वीडियो जरूर देखें। ऐसी बड़ी उम्र के कर्मशील व्यक्तित्व ओरों को भी प्रोत्साहित करते हैं।

अपने कॉलोनी के बच्चों को गीता और रामायण का पाठ पढ़ा सकते हैं। इससे अपना भी समय अच्छा बीतेगा और हम हमारे संस्कार भी उनको दे सकेंगे। मेरे कुछ परिचित यह कर भी रहे हैं और वह बहुत खुश हैं। उनके मन में यह विचार आता है कि वो समाज के लिए कुछ कर रहे हैं, अपने धर्म के लिए कुछ कर रहे हैं।

हम उन्हें केवल सेवा लेने का माध्यम न समझें, बल्कि उनका सम्मान करें, उनके विचारों को महत्व दें। उनके पास रसोई से लेकर रिश्तों तक की समझ है, जिसका लाभ हमें पूरे जीवन भर मिल सकता है।

अंत में यही कहना चाहूँगा कि यदि हम अपने घर की बड़ी महिलाओं को सिर्फ ‘बुजुर्ग’ नहीं, बल्कि ‘अनुभव की धरोहर’ मानें, तो हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ेंगे जो जड़ों से जुड़ा हुआ होगा और भविष्य की ओर सशक्त कदम बढ़ाएगा। उनकी उपेक्षा नहीं, उनका सहयोग — यही समय की माँग है।

‘फादर्स डे’ हम बुजुर्गों ने तो बचपन में सुना ही नहीं था

पाश्चात्य संस्कृति, जिसे पश्चिमी संस्कृति भी कहा जाता है, की देन है यह पितृ दिवस या फादर्स डे को मनाना। हर वर्ष, जून के तीसरे रविवार को जश्न, उपहार और श्रद्धांजलि के साथ मनाया जाता है फादर्स डे। इस वर्ष पिछले रविवार, 15 जून को यह मनाया गया। सुबह से फोन पर शुभकामना संदेश और सोशल मीडिया पर भावनात्मक संदेशों, तस्वीरों और धन्यवाद के साथ भरा पड़ा था। इस दिवस पर बच्चे, युवा और बड़े, गले मिलकर और कभी-कभी भव्य इशारों से अपना प्यार व्यक्त करते हैं।

बुजुर्गों ने तो, जब छोटे थे, इस दिवस के विषय में शायद सुना ही नहीं था। यह तो कुछ वर्षों से ही ज्यादा प्रचलित हुआ है। इसमें बिजनेस एंगल भी हैं और यह कहां भी जाता हैं कि इस से जुड़े व्यक्ति ही फादर्स डे मनाने का प्रचार प्रसार खूब करने लगे। कार्ड्स का चलन शुरु हुआ जब बच्चे अपने पिता को ग्रिटिंग्स भेजने लगे, गिफ्टिंग शुरू हुआ और होटलों में पार्टी मनाने लगे।

लेकिन एक बार यह विषेश दिन बीत जाने के बाद, कई लोग अपनी व्यस्त दिनचर्या में वापस लौट आते हैं, अक्सर उस व्यक्ति की शांत उपस्थिति को भूल जाते हैं जिसने कभी उन्हें अपनी पूरी दुनिया दी थी। क्या यह एक फोर्मेलिटि ही रह गई हैं कि ऐसे प्यार दिखाया जाता है। सच्चाई तो यह हैं कि फादर्स डे तो हर दिन उत्सव के रूप में मनाना चाहिए, क्योंकि पिता सिर्फ रिश्ते का नाम नहीं, वो एक भाव है जो हर खुशी की नींव रखता है।

हमारे पिता के लिए – खास तौर पर उनके बुढ़ापे में – एक दिन काफी नहीं होता। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उन्हें भव्य शो या आकर्षक शब्दों की ज़रूरत नहीं होती। उन्हें वास्तव में हमारे समय, ध्यान और प्यार की ज़रूरत होती है – सिर्फ़ वर्ष में एक बार नहीं, बल्कि हर दिन। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि कई पिता, जीवन भर पालन-पोषण, भरण-पोषण और त्याग करने के बाद, अपने जीवन के अंतिम वर्षों में स्वयं को अकेला पाते हैं। एक बार जीवंत, ज़िम्मेदारी और काम से भरा जीवन धीरे-धीरे एकांत में सिमट जाता है – जून माह में उस एक दिन को छोड़कर। कोई भी उत्सव, चाहे कितना भी भव्य क्यों न हो, दैनिक देखभाल, सम्मान और जुड़ाव की कमी की भरपाई नहीं कर सकता।

हमारे पिता ही हमारे अस्तित्व का कारण हैं – न केवल जैविक रूप से, बल्कि भावनात्मक और नैतिक रूप से भी। उनकी ताकत ने हमें आकार दिया, उनके बलिदानों ने हमें अवसर दिए, और उनका शांत प्रेम अक्सर अनदेखा रह गया। अब, जब जीवन का चक्र घूम रहा है, तो यह हमारी बारी है कि हम वापस दें – गरिमा के साथ, उपस्थिति के साथ, ऐसे प्रेम के साथ जिसे व्यक्त करने के लिए कैलेंडर की आवश्यकता नहीं है। यह भी विचार करना होगा कि हमारा भी बुढ़ापा आएगा और उस समय हमें भी अपने बच्चों से प्रेम और उनके व्यस्त जीवन से कुछ समय की बहुत आस रहेगी।

झारखंड के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन ने एक बहुत ही भावुक पोस्ट अपने पिता पर एक्स पर उनके साथ फोटो साझा की है और अपने जीवन में पिता की भूमिका को रेखांकित करते हुए लिखा कि पिता एक ऐसा वटवृक्ष है जिनकी छांव में आत्मविश्वास पलता है और जड़ों से मिली सीख से जीवन का हर पल सार्थक हो जाता है।
एक वाट्सएप ग्रुप पर मिला यह संदेश सभी से साझा कर रहां हूं।

पिताजी के वो डायलॉग्स, जो बचपन में सिर्फ “शब्द” लगे थे, पर आज “सबक” बन गए हैं:

  1. “पढ़ाई पर ध्यान दो, बाकी सब बाद में!”
  2. “मैं जो कर रहा हूं, सब तुम्हारे लिए कर रहा हूं।”
  3. “खुद के पैरों पर खड़ा होना सीख।”
  4. “मेरे जैसे मत बन, मुझसे अच्छा बन।”
  5. “बड़ा आदमी बन, लेकिन अच्छा इंसान पहले बन।”
  6. “नाम रोशन करना, बस यही सपना है मेरा।”
  7. “खर्च सोच-समझकर करना, पैसे पेड़ पर नहीं उगते।”
  8. “बचपन जल्दी निकल जाएगा, सम्हल जा।”
  9. “पैसा कमाना आसान है, इज्जत कमाना मुश्किल।”
  10. “अपने फैसले खुद ले, लेकिन सोच समझकर।”
  11. “दोस्ती सोच समझकर करना, सब तेरे जैसे नहीं होते।”
  12. “हर वक्त तेरे पीछे नहीं रहूंगा, खुद लड़ना सीख।”
  13. “जो भी कर, मेरा सिर ऊँचा होना चाहिए!”
  14. “मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा, तू खुश रहे बस।”
  15. “कभी भी झूठ मत बोलना, चाहे हालात कैसे भी हों।”

ये कुछ शब्द ही नहीं है, एक एक शब्द में गहराई और अपनापन है। आज ये हर वाक्य जिंदगी की नींव जैसा लगता है। आपके पिताजी ने भी कभी इनमें से कुछ आपको कहा जरूर होगा।

आज की व्यस्त जीदंगी में जब हम अपना पूरा ध्यान जीविकोपार्जन पर लगाने के लिए मजबूर होते हैं, उन परिस्थितियों में भी अपने बुजुर्ग माता-पिता के देखभाल करने की जिम्मेदारी भी उठानी आवश्यक हैं। उनके साथ समय बिताना सबसे जरूरी है। फादर्स डे को, बधाई या केक पर समाप्त न होने दें। इसे कृतज्ञता और देखभाल के दैनिक उत्सव की शुरुआत – या निरंतरता – बनने दें। क्योंकि पिता एक दिन से ज्यादा के हकदार हैं। वे जीवन भर के प्यार के हकदार हैं।

बुजुर्ग पर्यावरण की रक्षा खूब करते हैं

अभी पिछले सप्ताह ही 5 जून को हमने पर्यावरण दिवस मनाया। मन में विचार आया कि हम बुजुर्ग जब छोटे थे तब इस विषय पर शायद ही कभी चर्चा होती थी। और आज तो किसी गोष्ठी में हो, परिवार के बीच हो या दोस्तों की महफिल ही क्यूं न हो, पर्यावरण – पोल्यूशन पर सब अपना ज्ञान बांटते रहते हैं।

समय बहुत बदल गया है। जनसंख्या तो बढ़ ही‌ गई है पर ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि बदल गई है हमारी जीवन शैली। आज आवश्यकताओं की कोई सीमा नहीं रही, देखा-देखी की होड़ में बहुत कुछ वो कर बैठते हैं जिससे हम पर्यावरण को हानि ही पहुंचाते हैं।

याद किजिए बचपन के वो दिन जब अपना शहर एक छोटा सा नगर होता था। आसपास जाने के लिए या तो हम पैदल ही निकल जाते थे या रिक्शा कर लेते थे। सड़क पर गाड़ियों की भीड़ नजर नहीं आती थी और आज तो किसी भी शहर में जाए, कोई जरूरी नहीं है कि वह मेट्रो शहर हो, ज्यादातर जाम ही लगा रहता है और गाड़ी के एग्जास्ट से पूरा वातावरण दूषित हो जाता है। सड़क पर चल रही गाड़ियों में एक या दो सवारी ही अक्सर नजर आती है, कारण घर पर सभी के पास तो अपनी अपनी गाड़ी हैं।

दूसरी ओर देखे तो, अपने इतनी बातें करते हैं प्लास्टिक के कम उपयोग करने की, पर नजर तो यह आता है कि इसमें दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही है। एक उदाहरण लें तो हम देखते हैं शहरों में रोज सुबह हर घर से एक पोलिथिन का बैग पिछले दिन का कचरा भरा हुआ निकलता है। कोई डाटा तो नहीं है पर टनों में यह पॉलिथिन प्रतिदिन फैंका जाता है। इसमें से कुछ हिस्सा रिसाइक्लिंग के लिए एकत्रित हो जाता होगा, पर ज्यादा तो इधर-उधर सड़कों के किनारे या नालियों में हर नगर/शहर में नजर आएगा। रेलवे ट्रैक के दोनों तरफ इन पॉलिथिन थेलियों का अंबार सभी जगह देखने को मिलता हैं। शहरों में नालियों में जमा हुए इन थेलियों से पानी का निकास नहीं होता है और जल जमाव हर तरफ दिखने लगता है। वर्षो पहले कागज के ठोंगे का ही उपयोग होता था, और प्रायः घर से बाहर निकलते वक्त हम सभी कपड़ो के थैले साथ लेकर चलते थे।

आज जो सामग्री जोमेटो, स्वीगी, अमेजोन, ब्लिन्किट जैसे डिलिवरी करने वालों से हम मंगवाते हैं उनमें कितना प्लास्टिक या गत्ते का उपयोग पेकेजिंग में होता है उससे बेहिसाब पर्यावरण का नुक्सान हो रहा है। इनको पेकिंग करने में टनों टन केवल एधेसिव टेप लग जाते हैं। पहले के जैसे बांधने के लिए जूट से बनी सुतली तो नजर ही नहीं आती है। विचार किजिए की आपके यहां भी जब ऐसी कोई पेकिंग की हुई सामग्री आती है तो आप एधेसिव टेप, प्लास्टिक या गत्ते के कार्टून्स का क्या करते हैं।

इस वर्ष पर्यावरण दिवस पर विशेष अभियान चलाया गया था प्लास्टिक के उपयोग के विरुद्ध। पर जरा हम अपने चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो देखेंगे केवल बोतल बंद पानी में, जो आज के दिन इतना प्रचलित है, उसमें कितनी प्लास्टिक को हम काम में लेते हैं। काफी इसमें रीसाइकल भी हो जाती होगी पर ज्यादातर तो हमारे कूड़े के ढेर में ही नजर आती है। पहाड़ों पर भी जाएं या सुदुर गांवो में भी देखें तो प्लास्टिक की बोतले चारों तरफ नजर आती है। शहरों में तो आजकल जिस हिसाब से छोटी-छोटी बोतले, डेढ़ सौ और 200 एम.ल. की हर फंक्शन में उपयोग की जा रही है, लगता है हम थोड़े दिन में भूल ही जाएंगे की गिलास में भी पानी दिया जाता था।

आईआईटी और अन्य तकनीकी संस्थानों में रिसर्च कर रहे छात्रो को नवाचार यह करना चाहिए कि हम इन प्लास्टिक की बोतलों को व पॉलिथिन थैलियों को रीसाइकलिंग कैसे पोर्टेबल छोटी-छोटी मशीनों से कर सकते हैं। विचार कीजिए क्या ऐसी छोटी मशीने हर पर्यटक स्थल पर लगा दी जाए या एक टेंपो पर ही लोड करके इसे पोर्टेबल यूनिट बना दी जाए। इसे जगह-जगह घूमाते रहे और वहीं पर उसे कचरे का निष्पादन कर दे। इसके जो ग्रेन्यूल्स बने वह आराम से पैकिंग करके बाजार में बेचे जा सकते हैं। सरकार को भी इस पर विशेष ध्यान देना होगा नहीं तो आने वाले समय में हमारी आनेवाली पीढ़ियां बहुत ही तकलीफ में आ जाएगी।

विकास और आधुनिकता के नाम पर हम यह सब सह तो रहें हैं पर हमारी सेहत पर जो बुरा असर हो रहा है वह हमें ही भुगतना होगा। हम बुजुर्ग व्यक्तियों से ज्यादा आज के युवाओ को इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।

Monday, June 09, 2025

तब हम दोस्तों को आवाज देकर बुलाते थे

मैंने कोई एक वर्ष पहले इसी विषय पर एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था बुजुर्ग के लिए मित्र मंडली बहुत आवश्यक। आज पुनः, जब व्हाट्सएप पर एक मैसेज आया तो मन हुआ कि इस विषय पर तो और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है। यह मैसेज तो दिल को ही छू गया। मैसेज में लिखा था “फिर से लौटना चाहता हूं उसे दौर में, जहां दोस्त फोन से नहीं आवाज देकर बुलाते थे।”

इस मैसेज को बनाने वाले ने कितना सही लिखा है। याद कीजिए वों दिन जब हम छोटे थे, मोबाइल फोन नहीं था और लैंडलाइन फोन की भी बहुत कमी ही थी। सबके घरों में नहीं होता था और जिनके घरो में होता भी था तो एक ही फोन होता था। उस समय भी हम जब रोज सुबह घूमने जाते थे तो अपने घर से निकले, पास में ही दोस्त के घर गए और बाहर से ही पुकारते थे की आओ समय हो गया है चलने का। फिर अगले दोस्त के पास और फिर अगले दोस्त के पास यही क्रम होता था। सबको पुकार कर साथ लेकर अपने निश्चित स्थान की ओर प्रस्थान कर देते थे।

उन दिनों, दोपहर की धूप में भी दोस्त की पुकार दिल को ठंडी छांव सी लगती थी। जब गली में “अरे ओ… ” की आवाज़ सुनकर हम दौड़कर बाहर आ जाया करते थे — बिना ये सोचे कि क्या पहना है, बाल ठीक हैं या नहीं। क्योंकि तब मिलने की खुशी होती थी तो उसमें दिखावा कहीं नहीं होता था। झगड़े भी होते और आपसी बातचीत में हल्की फुल्की बहस भी होती थी, पर अगले ही पल सुलह हो जाती थी। ‘लेट्स प्ले’ का कोई नोटिफिकेशन नहीं आता था, बस दोस्त की हंसी और गली में गूंजती पुकार ही सब कुछ थी। खेलने के लिए तय समय नहीं होता था, बस मां की एक डांट बताती थी कि बहुत हो गया, अब घर आ जाओ।

इसके विपरीत आज समय कितना परिवर्तित हो रहा है। ज्यादातर लोग मोबाइल पर ही यह काम निपटा लेते हैं। अब रिश्ते ऑनलाइन हैं, चैट्स पर टाइप हो रहे हैं, पर आंखों में वो चमक, वो अपनापन कहीं खो गया है। अब पहले कॉल आता है, फिर मिलने का वादा। अगर अच्छी मित्रता है तो सप्ताह में दो-चार दिन फोन कर लिए तो सोचते हैं बहुत बड़ी उपलब्धि है हमारी। कुछ ग्रुप ऐसे जरूर हैं जो की सप्ताह में या रोज सुबह भी मिलते हैं। लेकिन ऐसा अनुपात में अगर देखें तो बहुत कम है। वो बरसात में भीगते हुए खेलने का मज़ा, वो बिना कारण छत पर देर तक बातें करना, अब सब कुछ फोटोज़ और वीडियोज तक सिमट गया है। अब जो पास हैं, वो दूर लगते हैं। और जो दूर हैं, बस स्क्रीन पर दिखते हैं। दिलों की नजदीकियाँ, टेक्स्ट मैसेज की लाइनों में कहीं खो सी गई हैं।

आज हमारी जीवन शैली इतनी बदल गई है की पुरानी बातें याद करके दिल भर जाता है। विकास, शहरीकरण और दिखावा, यह सब इतना बढ़ गया है कि वह सपना फिर से जीवित होने के कोई आसार हो ही नहीं सकते। वैसे, कुछ भी बदलाव आ गया हो लेकिन यह निश्चित है कि हमारे दोस्तों से संपर्क बनाए रखने का महत्व कभी काम नहीं होगा। कई बार तो ऐसा लगता है कि शायद परिवार से भी ज्यादा एक उम्र आने के बाद हमें दोस्तों से ही ज्यादा बात करने की इच्छा रहती है।

इसके बहुत से कारण भी हो सकते हैं। परिवार के साथ क्योंकि हम हर पल बिताते हैं तो बहुत सी बातें व्यक्तिगत रूप में अलग हो जाती है। दोस्त क्योंकि हमसे अलग रहते हैं तो उनसे मिलकर पुरानी यादों की बातें करना बहुत अच्छा लगता है। एक विशेष बात यह भी रहती है कि इस उम्र में आकर हमारे बहुत से मित्र तो अब हमारे बीच है ही नहीं। तो फिर जो बचे हुए हैं उन्हीं से तो हम पुरानी यादें ताजा कर सकते हैं। हालांकि बढ़ती उम्र में याददाश्त भी कुछ कम हो जाती है, डिमेंशिया का असर हो जाता है, फिर भी जितनी भी बातें याद हैं उसी में बहुत आनंद आता है।

उस दौर में हम कभी लौट नहीं सकते जहां दोस्ती में ना टाइम टेबल था, ना प्लानिंग। हां. हर मुलाकात में अपनापन था, हर हंसी में सच्चाई थी। वो दौर सिर्फ बीता हुआ कल नहीं था, बल्कि एक जादू था, जो दिलों को जोड़ता था — बिना नेटवर्क, बिना तकनीक के।

Sunday, June 01, 2025

जिंदगी जो शेष है उसे विशेष बनाए

हमपर भगवान की बहुत कृपा रही हैं कि हम इस उम्र तक पहुंच पाये हैं। अड़चने भी आई होगी इस सफर को यहां तक पार करने में। पर चारो तरफ नजर दौड़ाये तो देखेंगे कि हमारे साथ कितने ही लोग थे जिनके साथ हमने कभी खुशी कभी गम के पलों को बहुत ही आनन्द से व्यतीत किया था, वो अब साथ नहीं हैं। हमें तो अब भगवान से यही प्रार्थना करनी हैं कि जिंदगी जो शेष बची है, उसे विशेष बनाने में हमारे ऊपर अपनी कृपा बनाये रखें। कहने का तात्पर्य यह हैं कि हम अपने जीवन को सार्थक बनाये, खुशियों को बढ़ाये और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के बारे में विचार करें। इसे विशेष बनाने के लिए हमको अपनी जीवनशैली को संतुलित करना होगा, लक्ष्य निर्धारित करना होगा, नए आयाम सीखना और विकसित करना होगा, समाज सेवा में अपने आप को समर्पित करना होगा, प्रकृति के साथ जुड़ना होगा और अपने रिश्तों की गहराई को समझते हुयें इसको महत्व देना होगा। खुश, स्वस्थ और संतुष्ट रहने के लिए हमें सचेत प्रयास करना ही हैं।

रिटायरमेंट जीवन का अंत नहीं है – यह एक सुंदर, खुला राजमार्ग है जिसमें कम ट्रैफ़िक लाइटें और अधिक सुंदर दृश्य हैं। यह हमारे लिए पूरी तरह से जीने, लंबे समय से रखे गए सपनों का पीछा करने और अपने जीवन की यात्रा के पुरस्कारों का आनंद लेने का समय है। विश्वास करे की ईश्वर की दी हुई धरोहर जीवन एक उपहार है, इसका मूल्यांकन करें और इसका अधिकतम लाभ उठाएं। अपना समय जो बचा हुआ है वह बहुत कीमती है, इसका सदुपयोग करें।
कुछ बिन्दुओं पर विषेश ध्यान देना आवश्यक है –

  1. अपने स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता दें
  2. नए लक्ष्य निर्धारित करें और आजीवन सीखने को अपनाएं
  3. अपनी जीवनशैली को संतुलित करें
  4. सेवा के ज़रिए वापस दें
  5. प्रकृति से फिर से जुड़ें
  6. अपने रिश्तों को संजोएं

अपने स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता दें

अच्छा स्वास्थ्य एक पूर्ण जीवन की नींव है। नियमित रूप से चलना, अच्छा खाना, हाइड्रेटेड रहना और अच्छी नींद लेना जैसी सरल आदतें कल्याणकारी जीवन जीने में बहुत सहायक होती हैं। नियमित जांच करे कि आपके आस-पास जो वातावरण बना हुआ है उसमें कहां कुछ ठीक नहीं हैं और उसे सुधारने का भरसक प्रयास करे। डायरी लिखने का भी अभ्यास करना चाहिए, जिसमें आप अपने विचारों, भावनाओं, अनुभवों और प्रतिबिंबो को भावजनित रूप से लिखते है। ऐसा मानना है कि डायरी लिखने से तनाव, चिंता और अवसाद को कम करने में, अपने आप को अधिक जानने में और अपनी प्राथमिकता को समझने में सहायक होती है। इन प्रयासो से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी प्रथाएं हमको अधिक ऊर्जावान और भावनात्मक रूप से स्थिर महसूस करने में मदद कर सकती हैं।

नए लक्ष्य निर्धारित करें और आजीवन सीखने को अपनाएं

कौन कहता है कि लक्ष्य-निर्धारण केवल युवाओं के लिए है? चाहे वह संगीत वाद्ययंत्र बजाना सीखना हो, संस्मरण लिखना हो, बगीचा लगाना हो या फिर नई जगहों की यात्रा करना हो – आपके लक्ष्य बड़े या छोटे हो सकते हैं। कुछ नया सीखने से आपका दिमाग तेज रहता है और आपकी आत्मा युवा रहती है।

अपनी जीवनशैली को संतुलित करें

सेवानिवृत्ति आपको अपनी पसंद की जीवनशैली बनाने की आज़ादी देती है। आराम को गतिविधि के साथ मिलाएं। ऐसी दिनचर्या बनाएं जो आराम दे, लेकिन सहजता के लिए जगह छोड़ें। अकेले समय को सामाजिक पलों के साथ संतुलित करें। अपने शरीर और दिल की सुनें – वे आपको बताएंगे कि आपको क्या चाहिए।

सेवा के ज़रिए वापस दें

उद्देश्य खोजने के सबसे संतोषजनक तरीकों में से एक दूसरों की मदद करना है। चाहे वह स्थानीय आश्रय में स्वयंसेवा करना हो, युवाओं को सलाह देना हो, या बस ज़रूरतमंद पड़ोसी की मदद करना हो, आपकी बुद्धि और समय मूल्यवान उपहार हैं। दूसरों की मदद करना आपके उद्देश्य और अपनेपन की भावना को बढ़ाता है।

प्रकृति से फिर से जुड़ें

प्रकृति में शांत करने वाला, उपचारात्मक प्रभाव होता है। बाहर समय बिताएं—पार्क में टहलने जाएं, अपने बगीचे की देखभाल करें, या अपने बरामदे पर एक कप चाय के साथ बैठें। प्रकृति से जुड़ने से आपकी ऊर्जा का नवीनीकरण होता है और आपको अपने आस-पास की सुंदरता की याद आती है।

अपने रिश्तों को संजोएं

रिश्ते सार्थक जीवन की धड़कन होते हैं। पुराने दोस्तों से फिर से जुड़ें, नए दोस्त बनाएं और परिवार के साथ बंधन को मज़बूत करें, और उन्हें सम्मान दें। हंसी, यादें और सरल पल साझा करने से अपार खुशी और सुकून मिलता है। ध्यान रहे इस उम्र में आकर बहुत से बचपन के दोस्तों व परिवार वालों को जिन्हें आप खो चुके हैं, उनके परिवार वालों से भी प्यार भरा सम्पर्क बनाये रखना हैं।

सारभूत विचार

जीवन के ये सुनहरे वर्ष सबसे समृद्ध और सबसे सार्थक हो सकते हैं। आनंद चुनें, अपने जुनून का पीछा करें और ऐसा जीवन बनाएं जो दर्शाता हो कि आप वास्तव में कौन हैं। आपका बाकी जीवन केवल लंबे समय तक जीने के विषय में नहीं है – यह बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक जीवन जीने के विषय में है।

जीवन में आनंद हम वरिष्ठ ज्यादा लेते थे

हम बुजुर्ग अपनी जिंदगी में जितनी मस्ती करते हुए इस आयु पर आएं हैं और जब यह विचार करते हैं कि क्या हमारे बेटे-बेटियां, आज के युवा, भी उतना ही आनंद अपने जीवन का लें रहें हैं तो अक्सर ना ही इस प्रश्न का उत्तर मिलता है। आज सभी युवा वर्ग के चेहरे पर एक अजीब सा तनाव नजर आता है, चाहे उन्हें सड़कों पर गाड़ी में या टू-विलर चलाते हुए देख ले या उनको घरों और रेस्टोरेंट तक में देख ले।

अपने साथियों का दबाव, जिसे सहज से हम पियर प्रेशर कहते हैं, आज के युवा पर बहुत ज्यादा प्रभाव डाल रहा है। अगर उसने इतनी बड़ी गाड़ी खरीदी है या विदेश घूमने जा रहा है या ब्रांडेड कपड़े खरीद रहा है तो हमें भी वही सब करना या उससे भी उत्तम ही करना है, चाहे हम उसे आसानी से अफोर्ड कर सकते हैं या नहीं। इस तरह की मनोदशा में हम गलत डिसीजंस लेते हैं या अपने भविष्य की आर्थिक स्थिति को बिगड़ने में सहयोग करते हैं। यह केवल युवाओं में ही नहीं कुछ बड़ी उम्र के लोगों में भी काफी देखने को मिल जाती है। बुजुर्ग व्यक्तियों ने अपने जमाने में यह सब कम देखा और इस कारण घरों में बच्चों से मन मुटाव भी उत्पन्न हो जाता है।

अतीत में, वरिष्ठों का जीवन सरल रहता था, ज्यादातर। वे बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने पर ज़्यादा ध्यान देते थे, और छोटे-छोटे, रोज़मर्रा के पलों में आनंद लेते थे। आज का युवा EMI (समान मासिक किस्तें), चाहे वो होम लोन, कार लोन, मोबाईल फोन, अन्य विभिन्न गैजेट्स जैसे के लिए हो, चुकाने में ही लगा रहता हैं। इस ई.एम.आई. की किस्त भरने के लिए फिर नए लोन लेना आम बात हो गई हैं। सोशल मीडिया और धन दिखाने की इच्छा से प्रेरित दिखावे को बनाए रखने का सामाजिक दबाव हमारे मन और मस्तिष्क पर खराब प्रभाव डालता है और अक्सर स्वास्थ्य को भी इसी से हानी पहुंचती है और हमारी भावनात्मक सोच भी डगमगा जाती है।

वरिष्ठ जन के मध्य साथियों का दबाव ज़्यादातर सामाजिक मानदंडों और परंपराओं के अनुरूप रहता था, जो भौतिक सफलता के बारे में कम था। आज के युवा अक्सर दिखावे में फंस जाते हैं, जबकि वरिष्ठ अधिक प्रामाणिक रूप से और अपने स्वयं के मूल्यों के अनुरूप रहते हैं। वरिष्ठ लोगों के जीवन की गति थोड़ी धीमी चलती थी और धैर्य स्वाभाविक होता था। ये लोग कड़ी मेहनत करते थे। आज का युवा इसके विपरीत तत्काल संतुष्टि को ही अपना आदर्श बना रखा है – सब कुछ तेज़ गति से चल रहा है, फ़ास्ट फ़ूड से लेकर तेज़ जानकारी तक, सोशल मीडिया पर “लाइक” तक।अधीरता की ओर इस बदलाव ने युवा पीढ़ी के लिए संतुष्टि में देरी करना या कठिन समय में दृढ़ रहना कठिन बना दिया है।

एक और विषय पर अगर बात करे तो युवा पीढ़ी में तलाक की उच्च दर बताती है कि आज वैवाहिक जीवन की लंबी उम्र को बनाए रखना कठिन है। वरिष्ठजन पारंपरिक मूल्यों और कम विकर्षणों के कारण अक्सर मजबूत वैवाहिक बंधन में रहते हैं। हालांकि शादी में चुनौतियां रहती थीं, लेकिन जोड़े अक्सर जीवन भर साथ रहते थे। आज के युवाओं में अपने करियर की आकांक्षाओं, वित्तीय बोझ और सोशल मीडिया के आकर्षण को संतुलित करने के दबाव ने आधुनिक रिश्तों में दरार पैदा होती जा रही है। दोहरी आय वाले परिवारों, जहां पति-पत्नी दोनों अपने अपने काम में लगे रहते हैं, उनको अतिरिक्त तनाव का सामना करना पड़ता है।

काम का दबाव कभी न खत्म होने वाली परेशानी उत्पन्न कर देता है। वरिष्ठजन एक बार जब वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो काम अक्सर उनके पीछे छूट जाता है। अवकाश और सेवानिवृत्ति को आराम करने और जीवन का आनंद लेने के समय के रूप में देखा जाता था। आज के युवाओ की जिन्दगी में, खासकर कोविड के बाद घर से काम (WFH) के आगमन ने सीमाओं को धुंधला कर दिया है। काम 24/7 तक बढ़ सकता है, जिससे थकान और व्यक्तिगत समय की कमी हो जाती है। काम से लगातार जुड़े रहना – ईमेल, कॉल, मैसेज – इससे अलग होना और आराम करना मुश्किल हो जाता है। स्वाभाविक पारिवारिक जीवन पर इसका दुस्प्रभाव होता है। काम की प्रतिबद्धताओं के कारण परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय की कमी आ जाती है। यह अक्सर देखने को मिलता है कि परिवार के ज़्यादा सदस्य काम करते हैं लेकिन साथ में कम समय बिताते हैं। साथ रहकर भी अकेलापन महसूस करते हैं।

पहले ज्यादातर बड़े परिवार होते थे और भाई-बहनों और विस्तारित परिवार के साथ मज़बूत संबंध होते थे। मिलना-जुलना, और साझा पल बिताना आम बात थी। आज परिवार अक्सर बिखरे हुए होते हैं और रिश्ते ज़्यादा व्यक्तिगत होते हैं। पारिवारिक पुनर्मिलन बहुत कम हो गया है, ज़्यादा अलग-थलग अनुभव और व्यापक सहायता प्रणाली के साथ कम बातचीत होती हैं। बुजुर्ग व्यक्ति खुशकिस्मत हैं जिन्हे ऐसी जीवनशेली व तनाव भरी जिन्दगी को ज्यादा नहीं देखनी पड़ी। हम जिस तरह का आनंद जीवन में चाहते है उसकी कोई सीमा नहीं है। क्रियाशील और कार्यशील होने के साथ साथ युवाओं को चिन्तनशील भी होना होगा।

Monday, May 19, 2025

सुनहरे वर्षों में तनाव से बचे

हम जब डॉक्टर के पास जाते हैं अपना चेकअप करवाने तो बड़े उम्र के व्यक्तियों को आमतौर पर यही बताया जाता है कि आप स्ट्रेस बिल्कुल ना ले, और यह खासकर हार्ट की शिकायत वाले व्यक्तियों को तो बहुत जोर देकर बोला जाता है। यह भी कहा जाता है कि आप ज्यादा सोचे नहीं। कई वर्षों पहले मुझे भी जब कुछ ऐसी ही तकलीफ हुई थी दिल की, तो डॉक्टरों ने यही बात कही थी। मेरा उनसे एक ही सवाल था, आप जो बोल रहे हैं वह तो ठीक है पर क्या यह प्रैक्टिकल में इतना आसान काम है। क्या आपके पास ऐसी कोई विधा नहीं है जिससे कि आप सोचने वाली हमारी नस को ही निष्क्रिय कर दे। और कुछ नहीं तो, हम यहीं सोचते रहेंगे कि सोचना कैसे बंद करे।

इसमे कोई दो राय नहीं है कि जिनकी तनाव भरी जिन्दगी रहती हैं उनको अपने स्वास्थ पर विषेश ध्यान देने की आबश्यकता है। बहुत से परिचितों को हम जानते होंगे जो कि निंद की गोलियां या अन्य डि-स्ट्रेस करने की दवाईयां अक्सर लेते हैं। शरिर पर इन दवाईयां का दुष्प्रभाव भी पड़ता ही हैं। तनाव में रहने के बहुत कारण हो सकते हैं। किसी को वित्तीय परेशानी, किसी को पारिवारिक परेशानी, किसी को अपने स्वास्थ्य सम्बन्धित परेशानी हो सकती है। और यहीं सब कारण बन जाते है टेंशन में आने के जिसका स्वास्थ पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

कुछ ही दिनो पहले एक समाचार पढ़ने को मिला जिसमे बताया गया कि एक 115 वर्ष की महिला, जिनका नाम एथेल कैटरहम है, दुनिया की सबसे बुजुर्ग जीवित व्यक्ति है। गीनेस वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में भी यह दर्ज है। उनका जन्म शिप्टन बेलिंजर, हैम्पशायर, इंग्लैंड में 21 अगस्त 1909 को हुआ था। इनसे जब इस लंबी उम्र का राज पूछा गया तो बोली कि मेरा खान-पान तो बहुत सादा ही होता है पर जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है वो यह कि मै किसी से बहस नहीं करती हूं, किसी से बातों में उलझती नहीं हूं और अपना काम अपनी इच्छानुसार करती रहती हूं। ऐसी भी जानकारी मिली कि वो जब 18 वर्ष की थी तब उनको तीन वर्ष भारत में रहने का मौका मिला था।

उम्र बढ़ना एक ऐसा सफ़र है जो ज्ञान, अनुभव और सरल सुखों का आनंद लेकर आता है। लेकिन इसके साथ ही कई चुनौतियां भी आ सकती हैं – जिनमें से कुछ के बारे में बात करना हमेशा आसान नहीं होता। पारिवारिक गतिशीलता, वित्तीय दबाव और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं, जिनके विषय में पहले भी चर्चा की गई हैं, सभी बुज़ुर्गों के लिए तनाव के स्रोत बन सकते हैं। और जबकि यह जीवन का एक हिस्सा लग सकता है, आधुनिक शोध एक बात स्पष्ट करता है: पुराना तनाव सिर्फ़ असुविधाजनक नहीं है – इसका स्वास्थ पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मनोवैज्ञानिक आज चेतावनी देते हैं कि लंबे समय तक तनाव, अनसुलझे गुस्से और भावनात्मक संघर्ष से हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है, प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर हो सकती है और यहाँ तक कि बुढ़ापे की प्रक्रिया भी तेज़ हो सकती है। शरीर और मन गहराई से जुड़े हुए हैं, और जब भावनात्मक उथल-पुथल लगातार साथी बन जाती है, तो शारीरिक स्वास्थ्य चुपचाप पीड़ित होने लगता है।

इसलिए अनावश्यक बहस से बचने और रोज़मर्रा के नाटक के आकर्षण का विरोध करने वाली मानसिकता को अपनाना सिर्फ़ मन की शांति के बारे में नहीं है – यह बेहतर स्वास्थ्य के लिए एक रणनीति है। भावनात्मक ऊर्जा को संरक्षित करना और संघर्ष के बजाय शांति को चुनना सेहत पर लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव डाल सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि जो लोग भावनात्मक स्थिरता के साथ तनाव का जवाब देते हैं और बार-बार टकराव से बचते हैं, वे लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जीते हैं। दूसरी ओर, लगातार भावनात्मक तनाव शरीर में सूजन को बढ़ाने से जुड़ा हुआ है, जो हृदय रोग से लेकर मधुमेह तक कई पुरानी बीमारियों में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।

बेशक, तनाव कम करने के लिए कहना जितना आसान है, करना उतना आसान नहीं है। इसके लिए अभ्यास, समर्थन और कभी-कभी दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता होती है। चाहे वह ध्यान, हल्का व्यायाम, हंसी, सार्थक बातचीत के माध्यम से हो या बस जो नियंत्रित नहीं किया जा सकता है उसे छोड़ देना हो, बुजुर्ग लचीलापन विकसित कर सकते हैं और मन की अधिक शांतिपूर्ण स्थिति को बढ़ावा दे सकते हैं।

बुढ़ापे का मतलब तनाव के आगे समर्पण करना नहीं है। सोच-समझकर चुनाव करने और थोड़ी भावनात्मक गृह व्यवस्था के साथ, बुजुर्ग अनावश्यक चिंताओं का बोझ उठा सकते हैं – और अपने सुनहरे वर्षों में खुशी, जुड़ाव और जीवन शक्ति के लिए जगह बना सकते हैं।