We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Monday, March 09, 2026

बुजुर्गों को “थ्रो अवे” कल्चर नहीं भाता

आज थोड़ा विमर्श पर्यावरण संरक्षण पर। इस विषय पर लेखों की कमी नहीं है, सेमिनार और वर्कशॉप्स भी लगातार होते रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में युवा भाग लेते हैं। मंचों पर पर्यावरण बचाने की बातें होती हैं, संकल्प लिए जाते हैं। लेकिन जब व्यवहार पर नजर डालें, तो एक विरोधाभास साफ दिखता है। वही युवा वर्ग अनजाने में “थ्रो अवे कल्चर” को सबसे अधिक बढ़ावा भी दे रहा है।

आज की प्रवृत्ति यह बन गई है कि किसी भी वस्तु में जरा-सी खराबी आई नहीं कि उसे रिपेयर करवाने के बजाय तुरंत डिस्पोज कर दिया जाता है और नई वस्तु खरीद ली जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं, पर एक बड़ा कारण यह भी है कि हम स्वयं कुछ करने की मेहनत नहीं करना चाहते।

एक छोटा-सा उदाहरण लें। मान लीजिए आपके घर का टोस्टर खराब हो गया। उसकी कीमत लगभग ₹1500 रही होगी। सामान्यतः हम उसे रिपेयर कराने के बजाय नया टोस्टर खरीदने का विचार करते हैं। हो सकता है कोई एक्सचेंज स्कीम मिल जाए और पुराने टोस्टर के बदले 200–300 रुपये भी मिल जाएं। लेकिन यदि उसी टोस्टर को रिपेयर कराया जाए, तो संभव है कि मात्र 200–300 रुपये में वह फिर से पूरी तरह उपयोग योग्य बन जाए। प्रश्न यह है—क्या हम यह विकल्प सोचते भी हैं?

इसका एक दूसरा पहलू भी है। आज रिपेयरिंग की दुकानें तेजी से कम होती जा रही हैं। कारण साफ है—जब लोग रिपेयर करवाने ही नहीं आते, तो दुकानदार इस पेशे में क्यों टिके रहें? दूसरी ओर, ऑनलाइन ऑर्डर का चलन बढ़ गया है। नया सामान तो ऑनलाइन एक क्लिक पर मिल जाता है, लेकिन रिपेयरिंग की सेवाएं इस डिजिटल दुनिया में लगभग गायब हैं।

अब जरा यह भी सोचिए कि नया टोस्टर खरीदने के बाद पुराना टोस्टर कहां जाता है। बहुत कम मामलों में उसे कोई रिपेयर करके दोबारा बेचता होगा, पर अधिकांशतः वह कबाड़ बनकर रह जाता है। इस कबाड़ को निपटाने की प्रक्रिया में पर्यावरण को कितना नुकसान होता है, इस पर हम शायद ही कभी गंभीरता से विचार करते हैं।

आज स्थिति यह है कि इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं बहुत तेजी से ई-वेस्ट में बदल रही हैं। इससे मैन्युफैक्चरर्स को तो लाभ हो रहा है, क्योंकि बिक्री बढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर ई-वेस्ट का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है।

ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर में लगभग 62 मिलियन मेट्रिक टन ई-वेस्ट पैदा हुआ, जिसमें से एक चौथाई से भी कम हिस्सा ही रीसायकल हो सका। अधिकांश उपकरण मामूली-सी खराबी के कारण ही फेंक दिए जाते हैं। यूरोपीय एनवायरनमेंटल ब्यूरो के एक शोध के अनुसार, यदि हम अपने स्मार्टफोन को केवल एक वर्ष अधिक उपयोग में लें, तो उसके कार्बन फुटप्रिंट में लगभग 30% तक की कमी लाई जा सकती है। यह आंकड़ा अपने आप में सोचने पर मजबूर करता है।

यदि हमें वास्तव में पर्यावरण बचाना है, तो रिपेयरिंग की संस्कृति को फिर से जीवित करना ही होगा। इसके लिए सरकार को भी आने वाली पीढ़ियों के हित में ठोस कदम उठाने होंगे। साथ ही, हम सभी को अपनी मानसिकता बदलनी होगी।

एक ओर हमारे देश के युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं, और दूसरी ओर रिपेयरिंग जैसे हुनर वाले पेशों में लोगों की भारी कमी है। क्यों न हम एक ऐसी मुहिम शुरू करें, जिसमें बेरोजगार युवाओं को रिपेयरिंग की स्किल सिखाई जाए, ताकि अधिक से अधिक वस्तुओं को दोबारा उपयोग में लाया जा सके। स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में पहल कर सकती हैं और सरकार भी प्रशिक्षण, प्रोत्साहन व संसाधनों के माध्यम से बड़ा योगदान दे सकती है।

कुछ यूरोपीय देशों के उदाहरण इस संदर्भ में प्रेरक हैं। स्वीडन में रिपेयरिंग सेवाओं पर वैट कम कर दिया गया, ताकि लोग रिपेयर को प्राथमिकता दें। रवांडा में कम्युनिटी रिपेयर हब्स बनाए गए, जिससे ई-वेस्ट के आयात में कमी आई। कुछ देशों में तो रिपेयरिंग पर सीधी सब्सिडी भी दी जा रही है।

सच तो यह है कि बुजुर्गों को “थ्रो अवे” कल्चर कभी रास ही नहीं आया। आज भी किसी बुजुर्ग से बात कर लीजिए—चाहे कपड़े हों या घरेलू उपकरण—उनका पहला सवाल यही होता है, “इसे रिपेयर क्यों नहीं कर लेते?” यह सोच केवल बचत की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की सोच है।

यदि सरकार, समाज और आम नागरिक मिलकर उन युवाओं को प्रोत्साहन दें जो इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हम एक बड़ा कदम उठा सकते हैं। हर शहर में छोटे-छोटे उद्यम खड़े हो सकते हैं, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

हो सकता है कि बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को इससे कुछ असुविधा हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण की रक्षा आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

वरिष्ठ नागरिक और एआई: ज्ञान को डिजिटल शक्ति में बदलना

हाल ही में भारत में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन ने पूरे देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के भविष्य को लेकर चर्चा छेड़ दी है। जहां एक ओर स्टार्टअप्स, टेक्नोलॉजी लैब्स और युवा नवाचारकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, वहीं एक वर्ग ऐसा है जिसकी भूमिका अक्सर अनदेखी की जाती है — वरिष्ठ नागरिक।

समय, अनुभव और ज्ञान से परिपूर्ण हमारे बुजुर्ग एआई को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और साथ ही मानसिक रूप से सक्रिय और सामाजिक रूप से जुड़े रह सकते हैं।

एआई केवल कोडिंग और एल्गोरिदम तक सीमित नहीं है; यह संदर्भ, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के बारे में भी है। दशकों के अनुभव के साथ, वरिष्ठ नागरिक इन तीनों को एआई में ला सकते हैं। उनकी भागीदारी एआई को एक ठंडे, डेटा-आधारित टूल से बदलकर एक ऐसी तकनीक बना सकती है जो मानवीय ज्ञान को दर्शाती है।

एआई में वरिष्ठ नागरिक क्यों महत्वपूर्ण हैं

एआई सिस्टम उतने ही अच्छे होते हैं जितना डेटा और संदर्भ उन्हें दिया जाता है। वरिष्ठ नागरिक लाते हैं:

  • जीवन का अनुभव: स्वास्थ्य, वित्त, संस्कृति और सामुदायिक जीवन में दशकों का ज्ञान।
  • नैतिक निर्णय: जीवन भर के निर्णय लेने का अनुभव एआई को निष्पक्ष और जिम्मेदार बनाने में मदद करता है।
  • सांस्कृतिक स्मृति: बुजुर्ग भाषाओं, परंपराओं और स्थानीय ज्ञान को एआई डेटासेट में संरक्षित करने में मदद कर सकते हैं।

भारत जैसे देश में, जहां परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चलते हैं, वरिष्ठ नागरिक एआई सिस्टम को नवाचार और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, एआई आधारित स्वास्थ्य ऐप्स मरीजों के व्यवहार पर बुजुर्गों की अंतर्दृष्टि से लाभ उठा सकते हैं, जबकि वित्तीय एआई टूल्स उनके धन प्रबंधन अनुभव से सीख सकते हैं।

दैनिक व्यवहार के प्रत्येक क्षेत्र में एआई का प्रयोग बढ़ रहा है। इससे डरने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है इसे समझने की, अपने अनुरूप उपयोग में लाने की।

वरिष्ठ नागरिकों की संभावित भूमिकाएं

  1. ज्ञान सलाहकार: वरिष्ठ नागरिक एआई टीमों के साथ काम कर सकते हैं और अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता साझा कर सकते हैं। एक सेवानिवृत्त डॉक्टर स्वास्थ्य एआई को प्रशिक्षित करने में मदद कर सकता है, एक पूर्व बैंकर वित्तीय एआई का मार्गदर्शन कर सकता है, और एक शिक्षक शिक्षा एआई को समृद्ध कर सकता है।
  2. परीक्षक और उपयोगिता सलाहकार: कई एआई टूल्स बुजुर्गों के लिए उपयोगकर्ता-अनुकूल नहीं होते। वरिष्ठ नागरिक ऐप्स, वॉइस असिस्टेंट और स्वास्थ्य उपकरणों का परीक्षण कर सकते हैं, जिससे वे सभी उम्र के लिए सुलभ बन सकें।
  3. कहानीकार और डेटा योगदानकर्ता: अपनी कहानियों, मौखिक इतिहास और सांस्कृतिक ज्ञान को साझा करके, वरिष्ठ नागरिक एआई को मानवीय संदर्भ प्रदान कर सकते हैं। कल्पना कीजिए, एआई सिस्टम जो लोक कथाओं, स्थानीय भाषाओं और परंपराओं को संरक्षित करते हैं — यह सब बुजुर्गों के योगदान से संभव है।
  4. आजीवन शिक्षार्थी: एआई टूल्स के साथ जुड़ने से दिमाग तेज रहता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और उद्देश्य की भावना मिलती है। एआई का उपयोग सीखना सशक्त बनाने वाला हो सकता है और वरिष्ठ नागरिकों को परिवार, समाज और नवाचार से जुड़े रहने में सहयोग करता है।
  5. समुदाय सेतु: वरिष्ठ नागरिक अपने समुदायों में जागरूकता फैला सकते हैं, तकनीकी डर को कम कर सकते हैं और पीढ़ियों के बीच सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। वे एआई साक्षरता के राजदूत बन सकते हैं।

समाज के लिए जीत-जीत

जब वरिष्ठ नागरिक एआई से जुड़ते हैं, तो वे न केवल सक्रिय और सम्मानित रहते हैं, बल्कि एक ऐसी तकनीक बनाने में मदद करते हैं जो समावेशी, नैतिक और मानव-केंद्रित हो। यह नेवर से रिटायर्ड मिशन के साथ पूरी तरह मेल खाता है: बुजुर्गों को सक्रिय, उद्देश्यपूर्ण और सम्मानित बनाए रखना।

एआई, जब बुजुर्गों द्वारा निर्देशित होता है, तो पीढ़ियों के बीच एक सेतु बन सकता है — अतीत को संरक्षित करते हुए, वर्तमान को सुधारते हुए और भविष्य को आकार देते हुए।

आह्वान

आइए एआई को केवल युवाओं का खेल न समझें। इसके बजाय, ऐसे मंच बनाएं जहां वरिष्ठ नागरिक मार्गदर्शन, परीक्षण और योगदान कर सकें। समुदाय, एनजीओ और टेक कंपनियों को बुजुर्गों को शामिल करना चाहिए — क्योंकि एआई के भविष्य को केवल कोड नहीं, ज्ञान की भी आवश्यकता है।

वरिष्ठ नागरिकों को शामिल करके, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि एआई सहानुभूति, जिम्मेदारी और सांस्कृतिक गहराई के साथ विकसित हो। और हमारे बुजुर्गों के लिए, यह तेजी से बदलती दुनिया में सक्रिय, संलग्न और सम्मानित बने रहने का एक अवसर है।

Tuesday, February 24, 2026

जब “रामायण” और “महाभारत” सीरियल्स का जादू था

आज मैं आपको 80 के दशक के उस दौर में ले चलना चाहता हूं, जब भारत टेलीविजन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर रहा था। वह समय केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि सामूहिक अनुभवों का समय था। आज हम बात करेंगे उन धारावाहिकों की, जिन्होंने भारतीय जनमानस को टेलीविजन से इस तरह जोड़ दिया कि प्रसारण के समय सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था।

उन दिनों दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था। मनोरंजन के साधन सीमित थे, लेकिन जो था, वह पूरे देश को एक सूत्र में बांध देता था। 1982 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला लोकप्रिय कार्यक्रम “चित्रहार” लोगों के बीच अत्यंत प्रिय था। इसमें पुराने और नए हिंदी फिल्मों के गीत दिखाए जाते थे। इसका प्रसारण शाम के समय होता था, जब परिवार के सभी सदस्य दिनभर के काम से निवृत्त होकर एक साथ बैठते थे। टेलीविजन के सामने बैठना एक पारिवारिक अनुष्ठान जैसा बन गया था।

हमें भली-भांति याद है दूरदर्शन का पहला लोकप्रिय धारावाहिक “हम लोग”, जो जुलाई 1984 में प्रारंभ हुआ। यह मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी थी और लगभग डेढ़ सौ एपिसोड तक चला। इसके पात्र इतने वास्तविक लगते थे कि दर्शक उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानने लगे थे। इसके बाद 1986 में “बुनियाद” का प्रसारण हुआ, जो भारत विभाजन और उसके सामाजिक प्रभावों पर आधारित था। इस धारावाहिक ने लोगों के हृदय को गहराई से छुआ।

फिर आया वह ऐतिहासिक क्षण—जनवरी 1987 में रामानंद सागर की “रामायण” का प्रसारण आरंभ हुआ। यह केवल एक धारावाहिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन बन गया था। रविवार सुबह 9:30 बजे जैसे ही इसका प्रसारण शुरू होता, पूरा देश थम-सा जाता था। सड़कें सूनी हो जाती थीं, दुकानें बंद रहती थीं और सार्वजनिक परिवहन लगभग खाली दिखाई देता था।

लोगों की श्रद्धा इतनी प्रबल थी कि कई दर्शक प्रसारण से पहले स्नान करते, आरती उतारते और अपने टेलीविजन सेट को फूलों की माला पहनाते थे। भगवान राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल और माता सीता की भूमिका में दीपिका चिखलिया जहां भी जाते, लोग उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते थे। उन्हें साक्षात देवी-देवता के रूप में देखा जाने लगा था। रावण की भूमिका निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी इतने प्रभावशाली थे कि उनके किरदार की मृत्यु के प्रसारण पर उनके गृह नगर में शोक का वातावरण बन गया था।

उस समय सभी के घर में टेलीविजन नहीं हुआ करता था। सैकड़ों लोग एक ही मोहल्ले में एक टीवी सेट के सामने इकट्ठा होकर एपिसोड देखा करते थे। प्रसारण के समय महत्वपूर्ण सरकारी बैठकों तक को टाल दिया जाता था। बिजली विभाग पर भी विशेष दबाव रहता था, क्योंकि थोड़ी देर की बिजली कटौती भी लोगों के रोष का कारण बन जाती थी।

“रामायण” के बाद बी.आर. चोपड़ा की “महाभारत” 1988 से 1990 के बीच प्रसारित हुई। इसका शीर्षक गीत “मैं समय हूँ…” आज भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है। भीष्म पितामह के रूप में मुकेश खन्ना, श्रीकृष्ण की भूमिका में नितीश भारद्वाज और दुर्योधन के रूप में पुनीत इस्सर ने अपने अभिनय से पात्रों को जीवंत कर दिया। “महाभारत” केवल एक पौराणिक कथा नहीं थी, बल्कि नीति, धर्म, राजनीति और मानवीय संबंधों की गहन व्याख्या थी। इसके संवाद इतने प्रभावशाली थे कि लोग उन्हें याद कर लिया करते थे। हर एपिसोड के बाद घरों में उस दिन की कथा पर चर्चा होती थी, मानो कोई पारिवारिक गोष्ठी चल रही हो।

इन धारावाहिकों का प्रभाव इतना व्यापक था कि भारत में टेलीविजन सेटों की बिक्री में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। उन्होंने एक साझा राष्ट्रीय अनुभव का निर्माण किया, जिसमें लाखों लोग एक ही समय पर, एक ही कथा से जुड़ते थे। यह भारतीय सामाजिक इतिहास का एक स्वर्णिम कालखंड था, जिसने मनोरंजन को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ दिया।

यदि भारतीय टेलीविजन के इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत सितंबर 1959 में नई दिल्ली से हुई थी। प्रारंभिक प्रसारण सीमित घंटों के लिए होता था, जबकि दैनिक नियमित सेवा 1965 में शुरू हुई। 1972 में इसका विस्तार मुंबई और अमृतसर तक हुआ। 1982 के एशियाई खेलों ने रंगीन टेलीविजन की शुरुआत कर देश में एक नया युग आरंभ किया। इसी पृष्ठभूमि में 80 का दशक भारतीय टेलीविजन का स्वर्णिम युग बन गया।

आज भले ही सैकड़ों चैनल और ओटीटी प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं, कार्यक्रमों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उस दौर की बात ही कुछ और थी। तब विकल्प कम थे, पर अपनापन अधिक था। पूरा देश एक समय, एक भावना और एक कहानी में बंध जाता था। वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक था।

शायद यही कारण है कि “रामायण” और “महाभारत” आज भी भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में स्मरण किए जाते हैं—एक ऐसा दौर, जब टेलीविजन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला माध्यम था।

स्वीकार्यता: वृद्धावस्था की सबसे बड़ी पूंजी

कहना आसान है, पर करना अत्यंत कठिन—विशेषकर जीवन के उत्तरार्ध में—कि हर कठिन परिस्थिति को सहजता और मुस्कान के साथ स्वीकार किया जाए। उम्र अनुभव तो देती है, पर दुःख, आघात और पीड़ा से बचाव नहीं करती। कई बार तो लगता है कि जीवन के इस पड़ाव पर, जब हम सोचते हैं कि अब बहुत कुछ सह लिया है, कोई अप्रत्याशित घटना भीतर तक हिला देती है।

इस लेख की शुरुआत मैं अपने एक हालिया व्यक्तिगत आघात से कर रहा हूं। मेरे एक मित्र, जिनसे मेरी मित्रता सत्तर वर्षों से अधिक पुरानी है, और जो अब अपने इक्यासीवें वर्ष में हैं, उन्होंने अपने इकलौते पुत्र को खो दिया—महज छियालीस वर्ष की आयु में—एक दुर्घटना में। वह क्षण उनके लिए कैसा रहा होगा, इसकी कल्पना करना भी असंभव है। ऐसी खबर किसी भी माता-पिता के लिए वज्रपात से कम नहीं होती। हम जैसे मित्र भी स्तब्ध रह गए—न समझ में आया कि क्या कहें, कैसे सांत्वना दें। कुछ दुःख शब्दों से परे होते हैं।

यह घटना मुझे वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के साथ हुई एक समान त्रासदी की याद दिला गई। कुछ समय पहले उन्होंने भी अपने उनचास वर्षीय पुत्र को अमेरिका में एक स्कीइंग दुर्घटना में खो दिया था। इसके बाद उन्होंने जो पत्र लिखा, वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। उस पत्र की पंक्तियां सीधे हृदय को छू जाती हैं—
अपने ही पुत्र को विदा करना एक पिता के लिए असहनीय पीड़ा है। पुत्र का जाना पिता से पहले नहीं होना चाहिए।” ये शब्द केवल उनके नहीं, हर माता-पिता की व्यथा को व्यक्त करते हैं।

जीवन अत्यंत अनिश्चित है। जो हमें सहारा देता है, वह है—आस्था। यह मान लिया जाता है कि वृद्धावस्था हमें हर प्रकार के वियोग के लिए तैयार कर देती है, पर यह सच नहीं है। माता-पिता को खोना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है, पर संतान को खोना कभी भी स्वाभाविक नहीं लगता—किसी भी उम्र में। ऐसा दुःख विश्वास, संतुलन और उद्देश्य—सबको झकझोर देता है। फिर भी समाज वरिष्ठजनों से अपेक्षा करता है कि वे चुपचाप सब सह लें, मजबूत बने रहें।

आधुनिक जीवन हमें अनेक भ्रम देता है—योजना, सुरक्षा, बीमा, संपत्ति, स्वास्थ्य, सफलता। हम मान लेते हैं कि सावधानी हमें हर संकट से बचा लेगी। पर जीवन कोई गारंटी नहीं देता। वह बिना चेतावनी दिए प्रहार करता है। यह सच्चाई विचलित करने वाली है, पर साथ ही मुक्त करने वाली भी। यह हमें हमारी सीमाएं दिखाती है और विनम्रता सिखाती है।

इसीलिए वरिष्ठजनों को यह सीखने का प्रयास करना चाहिए कि हर परिस्थिति को स्वीकार करें—मुस्कान के साथ। यह मुस्कान पीड़ा से इनकार नहीं है, न ही समर्पण। स्वीकार्यता कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रमाण है। यह हमें गरिमा के साथ दुःख को जीने का साहस देती है। जब तर्क असफल हो जाता है, तब आस्था शेष रह जाती है। ईश्वर में विश्वास उस निरर्थक प्रतीत होने वाली पीड़ा को भी अर्थ देता है। हम उसके विधान को समझ न सकें, यह स्वाभाविक है—शायद हमें समझना आवश्यक भी नहीं। आस्था दुःख को मिटाती नहीं, पर उसे वहन करने की शक्ति देती है।

मृत्यु ही जीवन की एकमात्र निश्चित सच्चाई है; उसका समय हमारे हाथ में नहीं। इस सत्य को स्वीकार करना भय नहीं, बल्कि विनम्रता लाता है। वरिष्ठजनों के लिए यह बोध चिंता नहीं, शांति का कारण होना चाहिए। जीवन आगे भी हमें चौंका सकता है—कभी सुख से, कभी दुःख से। हमारी असली परीक्षा सुख में नहीं, संकट में होती है। भावनात्मक संतुलन, आस्था और स्वीकार्यता—ये केवल गुण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता के संकेत हैं।

संयोग ही है कि पिछले सप्ताह मेरा लेख था—“वरिष्ठजन, मन का विश्वास कम न होने दें।” उसमें एक पुरानी, आत्मा को छूने वाली प्रार्थना का उल्लेख था। किसे पता था कि कुछ ही दिनों में इतना निकट का व्यक्तिगत आघात होगा और मुझे फिर से विश्वास, स्वीकार्यता और आंतरिक शक्ति पर लिखना पड़ेगा।

जीवन की लंबी यात्रा तय कर चुके वरिष्ठजन अब यह भलीभांति जानते हैं कि धन, सत्ता और प्रभाव—सब नियति के आगे तुच्छ हैं। जीवन हमेशा न्यायपूर्ण न हो, पर उद्देश्यहीन भी नहीं होता। जिसे हम बदल नहीं सकते, उसे गरिमा के साथ स्वीकार करना ही बुद्धिमानी है। और यदि यह स्वीकार्यता एक शांत मुस्कान के साथ हो सके—तो वही सच्चे अर्थों में उम्र की कमाई हुई समझ है।

Wednesday, February 11, 2026

वरिष्ठजन, मन का विश्वास कम न होने दे

हम सभी को एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण भजन अवश्य याद होगा, जिसे हम अपने बालपन से सुनते आ रहे हैं— “इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।” इन दो पंक्तियों में जीवन का सार छिपा हुआ है। आज के समय में, और विशेष रूप से हम वरिष्ठजनों के लिए, यह पंक्तियां किसी संबल से कम नहीं हैं। आयु कितनी ही क्यों न बढ़ गई हो, यदि अपने ऊपर विश्वास बना हुआ है, तो जीवन की राह कभी पूरी तरह कठिन नहीं होती। विश्वास ही वह शक्ति है जो हमें गिरने के बाद फिर खड़ा होना सिखाती है।

भगवान से हमारी यह प्रार्थना होनी चाहिए कि वे हमें इस विश्वास के पथ से भटकने न दें। जीवन की संध्या में जब शरीर कुछ सीमाएं तय करने लगता है, तब मन का मजबूत रहना और भी आवश्यक हो जाता है। यदि मन हार गया, तो सबसे बड़ा पराजय वहीं हो जाती है। लेकिन यदि मन ने कहा—“मैं कर सकता हूं, मैं सीख सकता हूं, मैं आगे बढ़ सकता हूं”—तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।

इस भजन की अगली पंक्तियां भी उतनी ही गहरी हैं— “हम चले नेक रास्ते पर, हमसे भूल कर भी कोई भूल हो ना।” इसे अपने जीवन में उतारना आसान नहीं है। मनुष्य होने के नाते हमसे भूलें होती रही हैं और आगे भी हो सकती हैं। परंतु जीवन के इस पड़ाव पर, जब हमने अनेक अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है, तब यह प्रयास तो अवश्य होना चाहिए कि हमारी भूलें कम से कम हों। यही वे सुनहरे वर्ष हैं जब हमें अत्यंत संयम, संतुलन और विवेक के साथ जीना है।

यह वह समय है जब हम अपने से छोटे लोगों को उपदेश देने के बजाय, अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करें। हमने जो कुछ भी जीवन में अर्जित किया है—ज्ञान, अनुभव, समझ और धैर्य—उसे बांटना ही वरिष्ठ होने का सबसे बड़ा धर्म है। आज की पीढ़ी के पास तकनीक है, गति है, लेकिन अनुभव की वह गहराई नहीं जो उम्र के साथ आती है। यदि हम शांत भाव से, बिना अहंकार के, अपने अनुभव साझा करें, तो समाज को उसका बड़ा लाभ मिल सकता है।

भजन की आगे की पंक्तियां भी हम वरिष्ठजनों के लिए एक स्पष्ट संदेश देती हैं— “अज्ञान के अंधेरे से दूर रहे, ज्ञान की रोशनी हमें दे।” अक्सर यह मान लिया जाता है कि बढ़ती उम्र में सीखने की आवश्यकता नहीं रहती। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि खतरनाक भी है। सीखना बंद करते ही व्यक्ति भीतर से जड़ हो जाता है। आज के समय में थोड़ी सी अज्ञानता भी हमें भारी नुकसान पहुंचा सकती है—चाहे वह ऑनलाइन फ्रॉड हो, गलत स्वास्थ्य सलाह हो या भ्रामक सूचनाएं।

इसलिए यह आवश्यक है कि हम आज भी सीखते रहें। नई तकनीक से डरने के बजाय, उसे समझने का प्रयास करें। प्रश्न पूछने में संकोच न करें। यह स्वीकार करना कि “मुझे नहीं पता” कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की पहली सीढ़ी है। जब हम ज्ञान की रोशनी को अपने जीवन में प्रवेश करने देते हैं, तब अज्ञान का अंधेरा स्वतः ही दूर हो जाता है।

भजन में आगे कहा गया है कि हम हर बुराई से बचकर रहें और हमारी शेष जीवन-यात्रा भली हो। यह संदेश अत्यंत सरल है, पर उसका पालन उतना ही गहन है। मन में किसी के प्रति द्वेष न हो, बदले की भावना न आए, और यह भावना भी न पनपे कि किसी ने हमारे साथ अन्याय किया है। जीवन बहुत छोटा है इन भावनाओं में उलझने के लिए। शांति और क्षमा ही इस अवस्था के सबसे बड़े आभूषण हैं।

यह सोचने के बजाय कि हमें जीवन से क्या मिला, यह विचार करना अधिक सार्थक है कि हमने जीवन को क्या दिया। अंततः कवि की यही कामना है कि सभी का जीवन मधुबन बन जाए—जहां मधुरता हो, सौहार्द हो और संतोष हो। इससे सुंदर कल्पना और क्या हो सकती है?

पुराने भजन हों या गीत, ऐसा लगता है कि उस समय के रचनाकार शब्दों के माध्यम से आत्मा को स्पर्श करना जानते थे। उनकी रचनाओं में संदेश भी होता था और संवेदना भी। आज भी यदि हम उन पंक्तियों को अपने जीवन में उतार लें, तो बहुत सी उलझनें अपने आप सुलझ सकती हैं।

अंत में, एक बार फिर यही दोहराना चाहूंगा कि हम वरिष्ठजन हर परिस्थिति में अपने मन को मजबूत रखें। यह जीवन की एक सच्चाई है कि जब हम स्वयं पर विश्वास करना नहीं छोड़ते, तब परिस्थितियां भी धीरे-धीरे हमारा साथ देने लगती हैं। जितना अधिक विश्वास हम अपने भीतर जगाएंगे, जीवन की राह उतनी ही सरल और सुखद होती चली जाएगी। यही नेवर से रिटायर्ड अभियान का मूल संदेश है—जीवन के अंतिम क्षण तक विश्वास, उद्देश्य और सक्रियता के साथ जीना।

पांच वर्ष का सफर : नेवर से रिटायर्ड — एक अभियान, एक दृष्टि

शुरुआत : एक विचार से अभियान तक (2020–2021)

नेवर से रिटायर्ड मिशन का औपचारिक शुभारम्भ जनवरी 2021 में हुआ, हालांकि इसका विचार कुछ माह पहले ही मन में आकार लेने लगा था। उस समय मुझे एक विरोधाभास लगातार परेशान कर रहा था। एक ओर औसत आयु बढ़ रही थी और लोग अधिक स्वस्थ जीवन जी रहे थे, वहीं दूसरी ओर 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्ति को जीवन की पूर्णविराम रेखा मान लिया गया था।

सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ा देना समाधान नहीं था, क्योंकि इससे युवाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। वास्तविक समस्या यह थी कि 30–35 वर्षों का अनुभव, ज्ञान और विवेक रखने वाले सेवानिवृत्त नागरिक—जो देश की अमूल्य पूंजी हैं—अनुपयोगी छोड़ दिए जा रहे थे। यदि इस अनुभव को सकारात्मक दिशा में लगाया जाए, तो यह राष्ट्र-निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकता है। यही नेवर से रिटायर्ड की आधारशिला बनी।

एक मित्र की सहायता से वेबसाइट बनी और यह यात्रा औपचारिक रूप से शुरू हुई।

प्रारम्भिक प्रयास : जागरूकता और जुड़ाव

शुरुआत में ध्यान वरिष्ठजनों से जुड़े प्रसंगों और सकारात्मक उदाहरणों को साझा करने पर रहा। समाचार-पत्रों, डिजिटल मीडिया और वास्तविक जीवन से प्रेरित कहानियां वेबसाइट और फेसबुक समूह पर पोस्ट की जाने लगीं।

एक घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय रही—एक वृद्ध महिला की जान केवल इसलिए बच सकी क्योंकि वह एक व्हाट्सऐप समूह का हिस्सा थीं, जहां हर सुबह सभी सदस्य अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे। एक दिन उनके उत्तर न देने पर साथी सदस्यों ने चिंता जताई, घर जाकर देखा और उन्हें अचेत अवस्था में पाया। समय पर अस्पताल पहुंचाने से उनकी जान बच गई। जब इस उदाहरण को साझा कर ऐसे समूह बनाने का आग्रह किया गया, तो कई लोगों ने इसे अपनाया। इसने यह विश्वास और मजबूत किया कि छोटे प्रयास भी जीवनरक्षक बन सकते हैं।

लेखन : प्रेरणा का सशक्त माध्यम

इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के बाद नियमित लेखन आरम्भ हुआ। उद्देश्य था—वरिष्ठजनों को सक्रिय, संलग्न और सकारात्मक बने रहने के लिए प्रेरित करना। मूल दर्शन स्पष्ट था: दूसरों की मदद करके हम वास्तव में अपनी ही मदद करते हैं। सक्रियता से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, मानसिक सजगता बनी रहती है और नकारात्मकता स्वतः दूर होती है। अब तक लगभग 100 लेख लिखे जा चुके हैं, जो वरिष्ठजनों से जुड़े मुद्दों, अवसरों और प्रेरणाओं पर केन्द्रित हैं।

फुटपाथों की दुर्दशा और उसके कारण वरिष्ठजनों की पैदल चलने की आदत पर पड़ने वाले प्रभाव पर लिखा गया एक लेख अत्यंत चर्चित रहा। इस विषय पर माननीय प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा गया, क्योंकि वरिष्ठ-अनुकूल अधोसंरचना सार्वजनिक स्वास्थ्य का ही एक आयाम है।

नीति और पक्ष-प्रस्तुति (Advocacy)

समय के साथ नेवर से रिटायर्ड केवल प्रेरणा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीति-स्तर पर संवाद की दिशा में भी आगे बढ़ा। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को देखते हुए सेवानिवृत्त शिक्षकों एवं पेशेवरों की सेवाएं लेने का सुझाव दिया गया। इस संबंध में प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री एवं अन्य संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखे गए और लेख भी प्रकाशित हुआ।

इसी क्रम में वृद्धाश्रमों की बढ़ती आवश्यकता, उनकी संख्या, नियमन तथा न्यूनतम सुविधाओं पर भी ध्यान आकर्षित किया गया। बदलते पारिवारिक ढांचे और बढ़ती आयु के साथ वृद्धाश्रम अब सामाजिक विफलता नहीं, बल्कि समय की आवश्यकता हैं। नेवर से रिटायर्ड के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री को इस विषय पर विस्तार से अवगत कराया गया, ताकि वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक, सुरक्षित और मानवीय जीवन मिल सके।

डिजिटल विस्तार

वरिष्ठजनों तक व्यापक पहुंच के लिए यूट्यूब चैनल शुरू किया गया, जहां 100 से अधिक वीडियो उपलब्ध हैं—सभी वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े विषयों पर। इसके अतिरिक्त फेसबुक समूह व पेज, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम, लिंक्डइन तथा हाल ही में शुरू किया गया व्हाट्सऐप चैनल भी सक्रिय हैं।

मान्यता और सहभागिता

आवासीय परिसरों और वरिष्ठ नागरिक समूहों से संबोधन के निमंत्रण मिलने लगे। एक सुखद क्षण तब आया जब सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के एक अधिकारी ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए कानूनी जागरूकता सत्र आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। यह संकेत था कि यह अभियान अब संस्थागत स्तर पर भी पहचाना जा रहा है।

हर तरफ से मिल रही सराहना

इस मिशन को महत्वपूर्ण हस्तियों और कई मित्रों एवं रिश्तेदारों से सराहना मिलने लगी। कई संतों और सार्वजनिक हस्तियों ने संदेश भेजे, जिनके प्रशंसापत्र वेबसाइट पर दर्ज किए गए हैं। मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला जब न्यूजीलैंड से किसी ने फोन करके अपनी 75 वर्षीय मां के लिए सुझाई जाने वाली गतिविधियों के बारे में पूछा, या जब सिलीगुड़ी से किसी ने उस वृद्धाश्रम के बारे में और जानकारी मांगी जिसके बारे में मैंने अपने हालिया लेख में लिखा था। कई शुभचिंतकों ने मुझे प्रतिदिन संदेश/वीडियो भेजने शुरू कर दिए हैं, जो मेरे मिशन से संबंधित हैं। वास्तव में, इनसे मुझे अपने लेखन में मदद मिल रही है।

आगे की राह

पांच वर्षों में नेवर से रिटायर्ड एक विचार से आंदोलन की दिशा में बढ़ा है। मूल विश्वास आज भी अटल है—

सेवानिवृत्ति जीवन से विदाई नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण योगदान के एक नए चरण की शुरुआत है।

Thursday, January 29, 2026

वरिष्ठजनों द्वारा मार्गदर्शन (मेंटोरिंग) का महत्व

वरिष्ठजन जब अपने अनुभवों के साथ मार्गदर्शन के लिए किसी युवा का हाथ थामते हैं, तो केवल एक व्यक्ति नहीं संवरता—एक सोच, एक परिवार और अंततः एक समाज दिशा पाता है। जीवन के लंबे सफर में सीखे गए सबक, देखे गए संघर्ष और अर्जित की गई समझ कोई साधारण पूंजी नहीं होती। यह वह धरोहर है, जो बांटी जाए तो पीढ़ियों को समृद्ध कर सकती है। फिर भी विडंबना यह है कि आज की तेज रफ्तार दुनिया में यह अमूल्य निधि अक्सर अनसुनी और अनदेखी रह जाती है।

आज हम बार-बार यह कहते हैं कि युवाओं में मूल्यों का क्षरण हो रहा है। रिश्तों में गर्माहट कम हो रही है, धैर्य घट रहा है और तात्कालिक सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया गया है। असफलता को स्वीकार करने की क्षमता कम होती जा रही है। इन सबके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, पर एक सच्चाई यह भी है कि पीढ़ियों के बीच संवाद कम होता जा रहा है। जब यह संवाद टूटता है, तो अनुभव और ऊर्जा के बीच की स्वाभाविक कड़ी भी कमजोर पड़ जाती है। यहीं वरिष्ठजनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

वरिष्ठ अपने साथ केवल स्मृतियां नहीं लाते, वे इतिहास को जीवंत रूप में लेकर आते हैं। उन्होंने अभाव के दिन देखे हैं, धीरे-धीरे मिली सफलताओं का स्वाद चखा है और असफलताओं से उबरने की कला सीखी है। वे जानते हैं कि जीवन में हर समस्या का समाधान तुरंत नहीं मिलता और हर रात के बाद सुबह अवश्य होती है। जब वे यह सब किसी युवा से साझा करते हैं, तो वह केवल प्रेरित नहीं होता—वह जीवन को समझना सीखता है।

संस्कृति और मूल्यों की बात करें तो वरिष्ठजन इसके सबसे सशक्त वाहक हैं। संस्कृति केवल त्योहारों या परंपराओं तक सीमित नहीं होती; यह दूसरों के प्रति संवेदना, बड़ों के प्रति सम्मान, और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से बनती है। ये मूल्य भाषणों से नहीं, बल्कि आचरण से सिखाए जाते हैं। जब कोई युवा अपने दादा-दादी या किसी वरिष्ठ को जीवन को गरिमा और संतुलन के साथ जीते देखता है, तो वह अनजाने ही बहुत कुछ सीख लेता है।

आज तकनीक ने हमें सुविधाएं तो दी हैं, पर मानवीय संपर्क कम कर दिया है। ऑनलाइन खरीदारी ने दुकानदार से होने वाली सहज बातचीत भी छीन ली है। सोशल मीडिया ने संपर्क बढ़ाया है, पर रिश्तों की गहराई कम की है। ऐसे समय में वरिष्ठजनों की संबंध-निर्माण की क्षमता युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है। वे जानते हैं कि रिश्ते समय, विश्वास और निरंतर संवाद से बनते हैं—लाइक्स और फॉलोअर्स से नहीं।

जीवन कौशलों की शिक्षा में भी वरिष्ठों का कोई विकल्प नहीं है। धैर्य, संयम, भावनात्मक संतुलन, आर्थिक विवेक और निर्णय क्षमता—ये सब अनुभव से उपजते हैं। बड़े-बड़े संस्थान इन्हें सैद्धांतिक रूप से सिखा सकते हैं, पर जीवन में उतारने की कला वरिष्ठ ही सिखा सकते हैं। कई बार एक साधारण-सी सलाह, जो अनुभव से निकली हो, जीवन की दिशा बदल देती है।

आज का युवा मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चित भविष्य के भय से जूझ रहा है। बहुतों के पास अपनी बात कहने वाला कोई नहीं है। ऐसे समय में किसी वरिष्ठ का शांत स्वर, बिना जजमेंट के सुनने का धैर्य और स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन किसी औषधि से कम नहीं होता। वरिष्ठ केवल सलाह नहीं देते—वे भरोसा देते हैं कि जीवन को जिया जा सकता है।
समाज को अब यह समझना होगा कि वरिष्ठजन बोझ नहीं, बल्कि अमूल्य संसाधन हैं। उन्हें केवल सहायता पाने वाला वर्ग मानने के बजाय, ज्ञान देने वाला वर्ग मानना होगा। विद्यालयों, सामाजिक मंचों और सामुदायिक संस्थाओं में वरिष्ठों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

वरिष्ठों के लिए भी मेंटरशिप एक नया अर्थ लेकर आती है। यह उन्हें यह एहसास दिलाती है कि सेवानिवृत्ति का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। जीवन का यह चरण भी उतना ही उपयोगी और सार्थक हो सकता है। यही “नेवर से रिटायर्ड” की आत्मा है—जहां अनुभव रुकता नहीं, बल्कि और अधिक उजाला फैलाता है।

यदि हम वरिष्ठजनों के अनुभव और मार्गदर्शन को अपनाएं, तो हम केवल युवाओं का भविष्य नहीं संवारेंगे, बल्कि एक संवेदनशील, संतुलित और मजबूत समाज की नींव रखेंगे। अपने वरिष्ठों को सुनना, सम्मान देना और अवसर देना—यही हमारे प्रिय भारत को सच्चे अर्थों में सशक्त बनाएगा।

Monday, January 19, 2026

वृद्धाश्रम कितने आवश्यक हैं?

समाज की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए अब यह स्वीकार करना ही होगा कि भारत में भी वृद्धाश्रमों की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। वह समय अब केवल स्मृतियों में सिमट गया है जब संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग, युवा और बच्चे एक साथ रहते थे। तब वृद्धाश्रम की कल्पना भी सामाजिक अपराध या पाप के समान मानी जाती थी। लेकिन समय बदला है, जीवनशैली बदली है और साथ ही पारिवारिक संरचना भी।

हमने अपने बच्चों को सर्वोत्तम शिक्षा दी, उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्रगति की, सफल हुए और अपने करियर के लिए हमसे दूर चले गए। गर्व से हम दूसरों को बताते रहे—“मेरा बेटा अमेरिका में है, लाखों रुपये महीना कमाता है।” ऐसे उदाहरण केवल गिने-चुने नहीं हैं; सैकड़ों परिवारों की यही कहानी है। केवल विदेश ही नहीं, देश के बड़े शहरों में भी हमारे बच्चे बेहतर अवसरों की तलाश में बस गए हैं।

इन परिस्थितियों में न तो बच्चे अपने मूल शहर या गांव लौटना चाहते हैं और न ही कई माता-पिता उनके साथ जाना पसंद करते हैं। अपनी जड़ों से जुड़ाव, सामाजिक परिवेश, भाषा और जीवनशैली—इन सबके कारण बुजुर्ग अक्सर अपने ही स्थान पर रहना बेहतर समझते हैं। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, निजी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान भी ऐसे निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पिछले सप्ताह मुझे रांची स्थित एक वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिला। वहां की व्यवस्था देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। अपेक्षाकृत कम खर्च में स्वच्छ, सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन की व्यवस्था थी। लगभग पचास बुजुर्ग वहां निवास कर रहे थे। यह वृद्धाश्रम आर्य ज्ञान प्रचार समिति द्वारा संचालित है और वर्ष 2000 से लगातार सेवा में संलग्न है।

लौटते समय मुझे उनकी पत्रिका ‘जीवन संध्या’ दी गई। उसमें वहां रहने वाले बुजुर्गों के अनुभव पढ़ने को मिले। इन अनुभवों से यह समझने का अवसर मिला कि किन परिस्थितियों में लोग वृद्धाश्रम तक पहुंचते हैं—और यह भी कि इनमें से अधिकांश कारण नकारात्मक नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकताओं से जुड़े होते हैं।

एक दंपत्ति ने लिखा कि बच्चों के बिना उन्हें गहरा अकेलापन महसूस होने लगा था। घर के दैनिक काम संभालना कठिन हो गया था और मानसिक शांति भी समाप्त हो चुकी थी। वृद्धाश्रम में आकर उन्हें न केवल सहारा मिला, बल्कि समान आयु वर्ग के लोगों के साथ रहने से जीवन में फिर से उत्साह लौटा।

एक अन्य महिला ने लिखा कि उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी थी। पति के निधन के बाद घर पूरी तरह सूना लगने लगा। वृद्धाश्रम में आकर उन्हें फिर से अपनापन और उद्देश्य मिला।

एक कहानी अत्यंत मार्मिक भी थी। वह लिखती हैं कि उनके चार पुत्र और एक पुत्री हैं। चालीस वर्षों की सेवा के बाद सेवानिवृत्त होने पर भी कोई संतान उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुई। तब उन्हें एहसास हुआ कि बच्चों का लगाव उनसे नहीं, उनकी आर्थिक स्थिति से था। उम्र और बीमारी के कारण शारीरिक रूप से वे असमर्थ हो चुकी थीं और मानसिक रूप से भी टूट चुकी थीं। ऐसे अंधकारमय समय में यह वृद्धाश्रम उनके लिए प्रकाश की किरण बनकर सामने आया।

इस वृद्धाश्रम की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाने वाले समाजसेवी श्री एस. एल. गुप्ता कहते हैं—
“मेरा मानना है कि आदर्श समाज में वृद्धाश्रम होने ही नहीं चाहिए, क्योंकि यह भारतीय संस्कारों के विरुद्ध है। लेकिन आज की परिस्थितियों में कई बार यही वृद्धाश्रम बुजुर्गों के लिए संजीवनी बूटी सिद्ध होते हैं। वरना वे जाएं तो कहां जाएं?”

आज की सामाजिक सच्चाइयों को देखते हुए कई लोग मानते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत जैसे देश में बड़ी संख्या में वृद्धाश्रमों की आवश्यकता पड़ेगी। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हम बुजुर्गों के प्रति अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाएंगे।

आज वृद्धाश्रम विभिन्न श्रेणियों में उपलब्ध हैं—उच्च सुविधाओं वाले आधुनिक आश्रमों से लेकर सामान्य सेवा-भाव से संचालित संस्थाओं तक। लेकिन इस क्षेत्र में सुव्यवस्थित और गुणवत्तापूर्ण विकास के लिए सरकार की सक्रिय भूमिका अनिवार्य है। इच्छुक संस्थाओं को कर-छूट, सस्ती भूमि, जीएसटी में रियायत और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

इसके साथ ही वृद्धाश्रमों के पंजीकरण और न्यूनतम मानकों की स्पष्ट व्यवस्था भी आवश्यक है। वर्तमान में देश में कुल कितने वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं, इसका कोई प्रमाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। विभिन्न स्रोतों के अनुसार यह संख्या लगभग 700 से 1300 के बीच बताई जाती है। ऐसे में सरकार के पास एक ठोस डाटा होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गुणवत्ता और निगरानी सुनिश्चित की जा सके।

अब यह स्पष्ट है कि वृद्धाश्रम केवल भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता बन चुके हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगभग 32 करोड़ हो जाएगी। इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए हमें यह समझना होगा कि वृद्धाश्रम त्याग का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का एक विकल्प हैं।

बुजुर्गों की सुरक्षा: छोटी सावधानियां, बड़ा संरक्षण

पिछले दिनों एक परिचित 87 वर्षीय महिला बाथरूम में गिर गईं। दुर्भाग्यवश उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया और वे कोमा में चली गईं। इस आयु में ऐसी घटनाएं अब अक्सर सुनने को मिल जाती हैं। परंतु सबसे अधिक पीड़ा इस बात की हुई कि इतनी अधिक उम्र में भी वे बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद करके उपयोग करती थीं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ।

जब काफी देर तक वे बाहर नहीं आईं, तो परिजनों ने दरवाजा खटखटाया। कोई उत्तर न मिलने पर दरवाजा तोड़ा गया और वे ज़मीन पर अचेत अवस्था में पाई गईं। तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि बुजुर्ग व्यक्तियों को बाथरूम का उपयोग करते समय दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं करना चाहिए। निजता आवश्यक है, पर सुरक्षा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण। इसका एक अत्यंत सरल समाधान एक सजग व्यक्ति ने अपनाया—उन्होंने बाथरूम के भीतर पर्दा लगवा लिया। दरवाज़ा केवल बंद किया, चिटकनी नहीं लगाई, परदा खींचा, और समस्या का समाधान हो गया। पहले के समय में यह आम बात थी, और आज भी कई घरों में यह व्यवस्था देखने को मिल जाती है।

आज के इस लेख में हम ऐसी ही कुछ और छोटी-छोटी, पर अत्यंत महत्वपूर्ण सावधानियों पर ध्यान केंद्रित करेंगे। इनमें से कुछ बिंदु पहले के लेखों में भी आए होंगे, पर दोहराना आवश्यक है। अपने जीवन के सुनहरे वर्षों में इन साधारण सावधानियों को अपनाकर हम अनेक बड़ी परेशानियों से बच सकते हैं।

कुछ आवश्यक सावधानियां:

  • बाथरूम में ग्रैब बार्स या सपोर्ट हैंडल अवश्य लगवाएं।
  • एंटी-स्किड मैट का प्रयोग सुनिश्चित करें।
  • बाथरूम में पहनने वाली चप्पलों की सोल घिसी हुई न हो।
  • बाथरूम को यथासंभव सूखा रखने पर विशेष ध्यान दें।
  • सीढ़ियां चढ़ते-उतरते समय साइड रेलिंग को अवश्य पकड़ें। आवश्यकता हो तो नई रेलिंग लगवाएं।
  • जिन कुर्सियों में व्हील लगे हों, उनका उपयोग करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतें।

यदि पीछे रखा कोई सामान उठाना हो, तो केवल हाथ पीछे घुमाकर उसे उठाने का प्रयास न करें। इसके बजाय अपने पूरे शरीर को मोड़ें और फिर सामान उठाएं। इससे जोड़ों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता। कई बार गलत ढंग से सामान उठाने पर नस चढ़ जाती है, और ठीक होने में लंबा समय लग जाता है।

अब थोड़ी चर्चा मोबिलिटी—अर्थात चलने-फिरने की क्षमता—पर। बढ़ती उम्र में हमें अपने पैरों पर विशेष ध्यान देते हुए चलने की प्रक्रिया को मस्तिष्क में केंद्रित करना चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ चलते समय हमारे पैर पहले जितने ऊपर नहीं उठते, जिससे ठोकर लगने की संभावना बढ़ जाती है। ज़मीन पर बिछी साधारण-सी मैट भी कभी-कभी बाधा बन सकती है। एक मामूली-सी मोच भी बुजुर्गों के लिए लंबे समय की परेशानी का कारण बन सकती है।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि चलते समय पैरों पर नहीं, बल्कि सामने की दिशा पर ध्यान रखें।
  • चलते समय मोबाइल फोन का उपयोग कतई न करें।

घर को बुजुर्ग-अनुकूल बनाना अत्यंत आवश्यक है। यथासंभव वरिष्ठ व्यक्तियों के लिए नीचे के तल पर रहने की व्यवस्था होनी चाहिए। बाथरूम के भीतर आवश्यक प्रबंधों पर पहले भी चर्चा की जा चुकी है। घर की ज़मीन गीली न रहे, और जब सफ़ाई हो रही हो, उस समय बुजुर्गों का एक स्थान पर बैठा रहना ही बेहतर होता है।

वैसे तो किसी भी उम्र का व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो सकता है, पर बुजुर्गों को विशेष ध्यान रखना ही होगा। एक बात जो कई वरिष्ठजनों में देखने को मिलती है, वह यह कि वे यह मानने को तैयार नहीं होते कि अब उनकी उम्र बढ़ चुकी है। भारी सामान उठाने से तो बचना ही चाहिए, हल्का सामान उठाने से भी परहेज करना आवश्यक है, खासकर आगे झुककर। स्लिप-डिस्क या फ्रोजन शोल्डर आजकल आम समस्याएं हो गई हैं। ये ऐसी असुविधाएं हैं जिनके ठीक होने में महीनों लग जाते हैं और दर्द भी काफ़ी होता है। अधिक दर्द निवारक दवाएं लेने से अन्य दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।

मैंने यहां कुछ ऐसी ही छोटी-छोटी सावधानियों का उल्लेख किया है। हम सबके जीवन में ऐसे अनेक अनुभव रहे होंगे, जिनसे दूसरों को सीख मिल सकती है। यदि हम अपने अनुभव साझा करें, तो किसी और की बड़ी दुर्घटना टल सकती है।

आप Never Say Retired की वेबसाइट, फ़ेसबुक पेज या व्हाट्सएप चैनल पर अपने विचार साझा करें। ऐसे और बिंदु बताइए जिनसे अन्य वरिष्ठजन सतर्क हो सकें।

आपका एक अनुभव किसी के लिए सुरक्षा कवच बन सकता है।

वरिष्ठजन – आपकी उपस्थिति स्वयं में एक आशीर्वाद है

जब हम एक नए वर्ष में कदम रखते हैं, तो हमारे मन में कई प्रकार की भावनाएं होती हैं—जीवन के प्रति कृतज्ञता, उन प्रियजनों की स्मृतियां जो अब हमारे साथ नहीं हैं, और आने वाले समय को लेकर स्वाभाविक चिंताएं। उम्र के साथ उत्सव शांत हो जाते हैं, चिंतन गहरा होता जाता है और अपेक्षाएं सरल हो जाती हैं। ऐसे समय में सकारात्मकता वास्तविकता से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि एक सचेत और परिपक्व निर्णय होता है। और वरिष्ठजनों के लिए यही निर्णय सुखद और गरिमामय वृद्धावस्था की नींव बनता है। आइए, इस नए वर्ष की शुरुआत केवल सकारात्मक भावनाओं के साथ करें, क्योंकि हमारे स्वर्णिम वर्षों में सकारात्मकता कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।

आज हम जीवित हैं, उपस्थित हैं—यह स्वयं में एक बड़ा आशीर्वाद है। इस तथ्य को हम अक्सर भूल जाते हैं। आज की दुनिया तेज़ी, लक्ष्य और उपलब्धियों के पीछे भाग रही है। ऐसे वातावरण में वरिष्ठजन संतुलन और स्थिरता प्रदान करते हैं। हमारे बच्चे, पोते-पोतियां और समाज, सभी हमारी उपस्थिति से चुपचाप लाभान्वित होते हैं। यह शांत उपस्थिति अमूल्य है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह परिवारों को भरोसा देती है, भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करती है और जीवन में निरंतरता का भाव बनाए रखती है।

हमारी यह शांत उपस्थिति युवाओं की बेचैनी को भी कम करती है। भले ही वे इसे शब्दों में न कहें, लेकिन वे हमारे अनुभव और स्थिरता से ऊर्जा पाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि हम हर समय सलाह दें या मार्गदर्शन करें। कई बार बिना टोके, बिना जज किए, केवल सुन लेना ही सबसे बड़ा उपहार होता है। सहानुभूति से भरी चुप्पी, अक्सर लंबे भाषणों से अधिक प्रभावी होती है।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हमारे तर्क-वितर्क भी बढ़ने लगते हैं। वर्षों के अनुभव के कारण हमारी राय दृढ़ हो जाती है, कभी-कभी कठोर भी। हमें लगता है कि हमने जीवन बहुत देख लिया है, इसलिए हमारा दृष्टिकोण सही ही होगा। परंतु वास्तविक बुद्धिमत्ता इसमें है कि हर परिस्थिति में प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं होता। हमें तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए और अनावश्यक बहसों से दूरी बनानी चाहिए। हर मुद्दे पर सहमत होना जरूरी नहीं है। कई बार असहमति को स्वीकार करना ही समझदारी होती है।

इस उम्र में संबंधों को बनाए रखना, छोटी-छोटी बहसें जीतने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। तर्क जीतने से इस अवस्था में कोई स्थायी आनंद नहीं मिलता। आप सही हो सकते हैं, लेकिन परिपक्वता इस बात में है कि शांति को प्राथमिकता दी जाए। आज वरिष्ठजन व्हाट्सऐप जैसे माध्यमों पर भी सक्रिय हैं। वहां भी हमें सावधानी बरतनी चाहिए। बेवजह की बहसें, तीखी प्रतिक्रियाएं और अंतहीन चर्चाएं हमारे मानसिक संतुलन को बिगाड़ देती हैं। यहां भी मौन कई बार सबसे बेहतर उत्तर होता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि दूसरों को सुधारना हमारा कर्तव्य नहीं है। हर व्यक्ति की सोच उसके अनुभव, परिवेश और संस्कारों से बनती है। यदि किसी की राय हमसे भिन्न है, तो उसे स्वीकार करना चाहिए। हमें जीवन में इतने विविध लोग मिले हैं कि सभी को एक ही दृष्टि से देखना व्यर्थ है। जीवन हर व्यक्ति को अपने ढंग से और अपने समय पर सिखाता है। अब हमारी भूमिका सिखाने की नहीं, समझने की है।

अक्सर घर में या बाहर, युवा हमारी समझाइश को पक्षपात या हस्तक्षेप मान लेते हैं। भीतर से वे जानते हैं कि बात सही है, लेकिन अहंकार आड़े आ जाता है। ऐसे समय में धैर्य और भावनात्मक दूरी अधिक उपयोगी होती है। अनुभव बताता है कि स्वयं सीखे गए सबक अधिक गहरे उतरते हैं।

इसलिए हमें अनावश्यक विवादों से दूर रहना चाहिए। छोटे-छोटे दुखों को निगलकर आगे बढ़ना सीखना चाहिए, क्योंकि अंततः हम खुश रहना चाहते हैं। विवादों से बचना कमजोरी नहीं, बल्कि एक सजग और गरिमामय निर्णय है। इस उम्र में खुशी अत्यंत मूल्यवान और नाज़ुक होती है। शांति वास्तव में आत्म-देखभाल का सर्वोच्च रूप है।

डॉक्टर भी बार-बार हमें तनाव से बचने की सलाह देते हैं, क्योंकि तनाव का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। मानसिक शांति, दीर्घायु और बेहतर स्वास्थ्य—तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। सभी विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि शांत मन जीवन को लंबा और स्वस्थ बनाता है।
बुज़ुर्ग होना अप्रासंगिक होना नहीं है, बल्कि परिष्कृत होना है। शोर की जगह विवेक लेता है, कठोरता की जगह कोमलता और जल्दबाज़ी की जगह गरिमा।

अंत में, हमें यह याद रखना चाहिए कि वरिष्ठजन न केवल परिवार और समाज के लिए, बल्कि स्वयं अपने लिए भी एक आशीर्वाद हैं। 2026 और उसके आगे भी, हमें अपने अस्तित्व को महत्व देना चाहिए। तब हमारे ये स्वर्णिम वर्ष वास्तव में उद्देश्यपूर्ण, प्रसन्न, स्वस्थ और गरिमामय बनेंगे।

नव वर्ष पर वरिष्ठजनों के संकल्प

एक वर्ष और बीत गया। 2026 के आगमन के लिए हम सब तैयार खड़े हैं। हम सचमुच खुशनसीब हैं कि अपने जीवन का एक और वर्ष पूरा कर पाए। इस यात्रा में हमारे कुछ प्रियजन हमसे बिछुड़ भी गए, जिनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी।

अब हमारा दायित्व है कि जब तक ऊपर से बुलावा न आए, तब तक जीवन को सुचारु, सार्थक और सकारात्मक रूप से जीते रहें। अपनी बुद्धि का सदुपयोग करें, स्वस्थ रहें, खुश रहें, दूसरों को खुश रखें और समाज के लिए कुछ न कुछ करते रहें—यही हमारी जीवन-दृष्टि होनी चाहिए।

नव वर्ष 2026 के अवसर पर हम वरिष्ठजन यदि केवल तीन संकल्प ले लें, तो आने वाले वर्ष सचमुच अर्थपूर्ण बन सकते हैं—

पहला संकल्प:

हम मन में यह दृढ़ विश्वास रखें कि हम वरिष्ठ हैं, बूढ़े नहीं।

दूसरा संकल्प:

हम अपनी सेहत को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे—खुद भी खुश रहेंगे और दूसरों को भी खुश रखेंगे।

तीसरा संकल्प:

हम समाज के प्रति अपने दायित्व को समझेंगे और उसे निभाएंगे।

अब पहले संकल्प पर विचार करें।

उम्र तो प्रतिदिन बढ़ रही है, यह एक स्वाभाविक सत्य है। पर उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हम बूढ़े होते जा रहे हैं। हमें बुढ़ापे और वरिष्ठता के बीच का अंतर समझना होगा। इसी विषय पर मैंने एक वर्ष पहले एक लेख भी लिखा था—“हम वरिष्ठ हैं, बूढ़े नहीं।” हमारी सबसे बड़ी पूंजी यही है कि हमने जीवन भर अनुभव अर्जित किए हैं और आज भी अपने विवेक से जीवन को संवारने की क्षमता रखते हैं।

ध्यान रखिए—

बुढ़ापा सहारे की तलाश करता है, जबकि वरिष्ठता दूसरों को सहारा देती है।

बुढ़ापा अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा करता है, जबकि वरिष्ठता इन अंतिम वर्षों में भी एक नई सुबह की उम्मीद रखती है।

आने वाले वर्षों के लिए हमारा संकल्प यही होना चाहिए कि हम इस अंतर को समझें और जीवन का आनंद पूरे मन से उठाते रहें।

अब दूसरे संकल्प की बात करें।

इस पर अधिक कहने की शायद आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि हम सभी इसके महत्व से भली-भांति परिचित हैं। इस उम्र में अपने शरीर और मन का विशेष ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। जब हम स्वस्थ रहेंगे तभी हम आत्मनिर्भर रह पाएंगे, और तभी दूसरों के काम भी आ सकेंगे। आज ही मन में यह ठान लें—हम अपनी सेहत का ध्यान रखेंगे, इसे प्राथमिकता देंगे, खुश रहेंगे और दूसरों को भी खुश रखेंगे।

अपने मोहल्ले में, अपनी हाउसिंग सोसाइटी में वरिष्ठजनों का एक समूह बनाइए। साथ मिलकर गाइए, नाचिए, योग और व्यायाम कीजिए, हंसी-मजाक और रचनात्मक गतिविधियों में भाग लीजिए। नए-नए प्रयोग करते रहिए। जब आप खुश रहेंगे, तो आपके आसपास का वातावरण भी स्वतः ही खुशहाल हो जाएगा। यही तो जीवन जीने की सच्ची कला है।

अब आते हैं तीसरे और अंतिम संकल्प पर।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि अब समय आ गया है जब हम समाज के प्रति अपने दायित्व को गंभीरता से निभाएं। जीवन भर समाज ने हमें बहुत कुछ दिया है। हम अपनी जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त रहे कि व्यक्तिगत दायरे से बाहर देखने का अवसर ही नहीं मिला।

अब, जबकि हम अपनी सक्रिय पेशेवर जिंदगी से निवृत्त हो चुके हैं, तो यह सही समय है कि हम समाज-सेवा की ओर कदम बढ़ाएं।

अवसरों की कोई कमी नहीं है। हमें केवल यह सोचना है कि हमारा मन किस कार्य में लगता है और किस कार्य से हमें आत्मसंतोष मिलेगा। जब हम अपने विवेक से ऐसा कार्य चुनते हैं, तो उससे समाज का भी भला होता है और हमें भी गहरी संतुष्टि मिलती है।

सामाजिक कार्य का एक बड़ा लाभ यह भी है कि हमें ऐसे लोगों का साथ मिलता है जो सकारात्मक सोच रखते हैं और सेवा-भाव से जुड़े होते हैं।

दूसरों की सेवा से जो आनंद मिलता है, उसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव हमारी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता है। हम अधिक प्रसन्न रहते हैं, घर का वातावरण सुखद बनता है और जीवन के प्रति उत्साह बढ़ता है—जिससे हमारी जीवन-प्रत्याशा भी बढ़ती है।

2026 और उसके बाद के वर्षों के लिए यदि हम यह संकल्प लेकर आगे बढ़ें कि हमें स्वस्थ रहना है, खुश रहना है और दूसरों की सेवा करनी है, तो निश्चय ही हमारा शेष जीवन भी सुंदर और सार्थक होगा। ये संकल्प केवल मन में न रहें—इन्हें जीवन में उतारने का दृढ़ निश्चय आज ही करें।

तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिकों की आबादी

भारत इस समय एक अनोखे जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। आज दुनिया हमें सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश के रूप में जानती है, लेकिन इसी बीच एक अधिक आयु वाले भारत की नींव भी तेजी से बन रही है। 9 दिसंबर को लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय ने जानकारी दी कि देश में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या अभूतपूर्व गति से बढ़ रही है। वर्ष 2011 में 60 वर्ष से ऊपर की आबादी 10.16 करोड़ थी, जो 2036 तक बढ़कर 22.74 करोड़ हो जाएगी। यानी अगले कुछ वर्षों में हमारी जनसंख्या पिरामिड का स्वरूप बहुत बदल जाएगा।

यह परिवर्तन कई अवसरों और चुनौतियों को साथ लाता है। मंत्री ने बताया कि बढ़ती आयु के साथ स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक निर्भरता, डिजिटल सुविधाओं तक पहुंच और भावनात्मक सहारे जैसी चिंताएं भी तेजी से बढ़ती हैं। सरकार यह भी मानती है कि संयुक्त परिवार की पारंपरिक संरचना और रिश्तों की प्रकृति पहले जैसी नहीं रही। रोजगार की तलाश में दूर शहरों या विदेश जाना, छोटे परिवार, और बदलती जीवनशैली—इन सबने वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाला स्वाभाविक सामाजिक व भावनात्मक सहारा कम कर दिया है।

इन्हीं जरूरतों को देखते हुए सरकार ने 1 अप्रैल 2021 से “अटल वयो अभ्युदय योजना” (AVYAY) लागू की है, जिसके माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों को सहायता और सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। साथ ही, “राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक परिषद” का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार करते हैं। यह परिषद वरिष्ठ जनों से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञ सलाह देती है।

इसके बावजूद एक बड़ी सच्चाई यह है कि भारत भले ही आज युवा दिखता हो, लेकिन यह युवा लाभ हमेशा नहीं रहने वाला। विकसित देशों ने पहले से ही वृद्ध आबादी के दबाव को झेला है, और आने वाले दशकों में भारत भी समान परिस्थितियों का सामना करेगा। 2036 तक करीब 15% भारतीय आबादी वरिष्ठ नागरिक होगी—यानी हर सातवां भारतीय वृद्ध होगा।

इस बदलाव का एक स्पष्ट प्रभाव है—अकेले रहने वाले बुजुर्गों की बढ़ती संख्या। कामकाज के कारण बच्चे बाहर चले जाते हैं, और माता-पिता अपनी जड़ों, अपने पड़ोस, अपनी परिचित जीवनशैली से जुड़े रहना पसंद करते हैं। यह दूरी प्रेम की कमी नहीं, बल्कि परिस्थितियों का परिणाम है। विदेशों में अकेलापन अधिक है—जहाँ सैर पर निकले बुजुर्ग को पड़ोसी और दुकानदार सम्मान से अभिवादन करें, ऐसा भारतीय सौहार्द वहां दुर्लभ है। वहीं बच्चों के लंबे कार्य-घंटों के कारण बुजुर्ग दिन भर अकेले पड़ जाते हैं।

इस परिस्थिति ने वरिष्ठ निवासों और वृद्धाश्रमों की मांग बढ़ाई है। जो बात कभी सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं मानी जाती थी, आज व्यावहारिक समाधान बन चुकी है। अब हर श्रेणी के वरिष्ठ निवास उपलब्ध हैं—बुनियादी देखभाल से लेकर प्रीमियम असिस्टेड-लिविंग सुविधाएं तक। रियल एस्टेट क्षेत्र भी तेजी से इस दिशा में सक्रिय हुआ है।

एक और बड़ा कारण है—बढ़ती दीर्घायु। बेहतर जीवनशैली और जागरूकता के कारण 80 वर्ष पार करना अब आश्चर्य की बात नहीं। कुछ दशक पहले सत्तर वर्ष की आयु को ही पूर्ण जीवन माना जाता था, जबकि आज अस्सी-पचासी वर्ष के सक्रिय लोग सहज मिल जाते हैं। यह प्रगति का प्रतीक है, लेकिन इसके साथ वित्तीय चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।

सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन महंगाई की गति के आगे कमजोर पड़ जाते हैं। स्वास्थ्य व्यय सबसे बड़ी चिंता बन गया है। गंभीर बीमारियों के बिना भी नियमित दवाइयां, दंत चिकित्सा, फिजियोथेरेपी, नेत्र देखभाल और श्रवण यंत्र जैसे खर्च सीमित संसाधनों पर भारी पड़ते हैं। कई वरिष्ठ नागरिक आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच कठिन चुनाव करने को मजबूर होते हैं।

एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जीवन के अंतिम कुछ सप्ताहों में होने वाला चिकित्सा खर्च अक्सर पूरे जीवन में हुए खर्च के बराबर होता है—कई परिवारों के लिए यह भावनात्मक और आर्थिक बोझ बन जाता है।
इन सभी बातों से एक स्पष्ट संदेश मिलता है—भारत को अपने वृद्ध भविष्य के लिए सामाजिक, आर्थिक, भावनात्मक और संरचनात्मक रूप से तैयार होना ही होगा। लेकिन तैयारी का अर्थ भय नहीं, बल्कि सशक्तिकरण है। हमारे वरिष्ठ नागरिक बोझ नहीं—बल्कि अनुभव, संस्कृति और धैर्य के जीवंत स्रोत हैं। यदि परिवार, समाज और सरकार मिलकर संवेदनशील ढंग से काम करें, तो हम बढ़ती उम्र को सम्मान और सक्रियता का अवसर बना सकते हैं।

और यही वह उद्देश्य है जिसके लिए “नेवर से रिटायर्ड” जैसी पहलें काम करती हैं। वरिष्ठ नागरिकों को सक्रिय रहने, सीखते रहने, सामाजिक रूप से जुड़े रहने और गरिमा के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित करना—अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। “नेवर से रिटायर्ड” का मिशन यही याद दिलाना है कि उम्र अंत नहीं, बल्कि नए उद्देश्य और सार्थक योगदान का एक नया अध्याय है।

Friday, December 19, 2025

बुजुर्गों की बुद्धि और युवाओं का ज्ञान

ज्ञान और बुद्धिमत्ता—ये दोनों शब्द अक्सर एक साथ बोले जाते हैं, लेकिन दोनों एक नहीं हैं। ज्ञान तथ्य और जानकारी का संग्रह है। बुद्धिमत्ता उस ज्ञान को समझदारी, विवेक और अनुभव के साथ लागू करने की क्षमता है। ज्ञान दिमाग भरता है, पर बुद्धिमत्ता जीवन को दिशा देती है। और जीवन के वरिष्ठ वर्षों में यही बुद्धिमत्ता हमारी सबसे बड़ी ताकत, हमारी सच्ची साथी और समाज के लिए हमारी अनमोल देन बन जाती है।

सोचिए—ट्रैफिक लाइट लाल हो जाती है, यह सभी जानते हैं। यह ज्ञान है। लेकिन सड़क खाली होने पर भी लाल बत्ती पर रुकना – यह बुद्धिमत्ता है। इसी तरह, यह जानना कि व्यायाम फायदेमंद है, ज्ञान है; लेकिन रोज टहलना, व्यायाम करना और अपनी सीमाओं का ध्यान रखना – यह बुद्धिमत्ता है।

उम्र बढ़ने का अनमोल उपहार

उम्र बढ़ने के साथ हमें एक अद्भुत वरदान मिलता है। गति थोड़ी कम हो सकती है, कुछ बातें भूल भी जाएं, लेकिन जीवन को समझने की क्षमता गहरी हो जाती है। हम खुशियों, चुनौतियों, गलतियों, रिश्तों और अनुभवों से गुज़र चुके होते हैं। हर अनुभव एक मोती बन जाता है – और इन मोतियों की माला ही बुद्धिमत्ता है।

  • युवा तेज भागते हैं। वरिष्ठ जानते हैं कि किस दिशा में भागना है।
  • युवा ऊर्जा लाते हैं। वरिष्ठ दृष्टि लाते हैं।

इसीलिए नेवर से रिटायर्ड की भावना इतनी महत्वपूर्ण है। नौकरी से रिटायर होना अनिवार्य है, पर सीखने और मार्गदर्शन देने से रिटायर होना बिल्कुल नहीं। वरिष्ठों के पास वह ख़जाना है जिसकी दुनिया को सबसे ज़्यादा आवश्यकता है – बुद्धिमत्ता।

बुद्धिमत्ता जीवन के छोटे-छोटे क्षणों में

बुद्धिमत्ता बड़े भाषणों में ही नहीं दिखती; यह छोटी-छोटी बातों में अपना प्रकाश बिखेरती है।

  • कब बोलना है और कब चुप रहना है – यह बुद्धिमत्ता है।
  • बहस में जीत से अधिक रिश्ते की गरमाहट – यह बुद्धिमत्ता है।
  • मिठाई पसंद है, पर स्वास्थ्य ज़्यादा ज़रूरी है – यह बुद्धिमत्ता है।
  • जीवन की प्राथमिकताओं को समझना – यही असली बुद्धिमत्ता है।

वरिष्ठ जीवन इन छोटी-छोटी बातों को गहराई से जीने का समय है – क्योंकि अब हमारे पास समय है, दृष्टि है, और अनुभव है।

सीखते रहना ही बुद्धिमत्ता है

बहुत से लोग मानते हैं कि सीखना केवल युवाओं के लिए है। पर सच्चाई यह है कि जीवनभर सीखना ही जीवनभर की बुद्धिमत्ता की नींव है। दुनिया बदल रही है – तकनीक, बैंकिंग, स्वास्थ्य, संवाद – सब कुछ तेज़ी से विकसित हो रहा है। जो वरिष्ठ सीखने की ललक बनाए रखते हैं, वे मानसिक रूप से चुस्त और लचीले बने रहते हैं।

  • बुद्धिमत्ता जिद्दी नहीं होती।
  • वह नहीं कहती – “मुझे सब आता है।”
  • वह कहती है – “मुझे थोड़ा और समझना है।”

UPI सीखना हो, योग सीखना हो, नई किताबें पढ़नी हों – हर नया ज्ञान, बुद्धिमत्ता को गहराई देता है।

बुद्धिमत्ता बांटना – हमारी जिम्मेदारी

वरिष्ठ समाज को जो सबसे बड़ी देन दे सकते हैं, वह है – मार्गदर्शन। आज दुनिया में जानकारी बहुत है, पर दिशा कम है। युवा दबाव और भ्रम का सामना कर रहे हैं। वे शायद हमसे अधिक जानकारी रखते हों, पर जीवन अनुभव डाउनलोड नहीं किया जा सकता।

  • आपके अनुभव, आपकी कहानियां, आपकी सीख – अनमोल हैं।
  • आपकी गलतियां दूसरों को बचाती हैं।
  • आपकी सफलताएं दूसरों को प्रेरित करती हैं।

जब आप अपनी बुद्धिमत्ता साझा करते हैं, तो आप खुद भी सक्रिय, उद्देश्यपूर्ण और उत्साहित रहते हैं।

सरलता की बुद्धिमत्ता

उम्र के साथ हम जान लेते हैं कि जीवन उतना जटिल नहीं है जितना हम बना लेते हैं।
वरिष्ठ जानते हैं:

  • स्वास्थ्य असली दौलत है।
  • रिश्ते सबसे बड़ा सुख हैं।
  • मन की शांति ही असली समृद्धि है।
  • कृतज्ञता से खुशी बढ़ती है।
  • गुस्सा ऊर्जा कम करता है।
  • समय अनमोल है।
    यही सरलता असली बुद्धिमत्ता है।

नेवर से रिटायर्ड – बुद्धिमत्ता जीवित रखें

नेवर से रिटायर्ड अभियान का संदेश स्पष्ट है – वरिष्ठ समाज का बोझ नहीं, बल्कि मार्गदर्शक प्रकाश हैं। हर वरिष्ठ चलता-फिरता ज्ञानकोष है। हर वरिष्ठ के पास जीवन की सीखें हैं जिन्हें दुनिया सुनना चाहती है।

  • ज्ञान किताबों से आता है।
  • बुद्धिमत्ता जीवन से आती है।

और यही आपकी सबसे अनमोल पूंजी है – इसे जिएं, बांटें और जश्न मनाएं। जीवनभर का ज्ञान ही, उम्रभर की बुद्धिमत्ता हैं। ध्यना रहें ज्ञान बहुत है, पर बुद्धिमत्ता दुर्लभ है। सीखते रहिए, समझते रहिए, आगे बढ़ते रहिए – यही हमारा ध्येय होना चाहिए।