We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Wednesday, November 04, 2026

सुनहरी उम्र में कहां रहना पसंद करते हैं वरिष्ठजन?

जैसे-जैसे वरिष्ठजनों की संख्या बढ़ती जा रही है, मीडिया में इस वर्ग से संबंधित समाचारों और लेखों की संख्या भी काफी बढ़ने लगी है। मुझे याद है कि जब मैंने लगभग तीन वर्ष पहले केवल बुजुर्गों से संबंधित विषयों पर लिखना प्रारम्भ किया था, तब ऐसी चर्चा बहुत कम देखने को मिलती थी। लेकिन आज स्थिति बदल रही है।

अब यह जानने के लिए अनेक शोध और सर्वेक्षण होने लगे हैं कि बढ़ती उम्र में वरिष्ठ नागरिकों की आवश्यकताएं क्या हैं, उनकी रुचियां क्या हैं और वे अपना जीवन किस तरह बिताना चाहते हैं। आखिर वे भी समाज का एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग हैं।

पहले बुजुर्गों की चर्चा प्रायः स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं तक सीमित रहती थी, लेकिन अब यह जानने में भी रुचि ली जा रही है कि वे कहां घूमना पसंद करते हैं, उनका खान-पान कैसा है, वे किन सुविधाओं को प्राथमिकता देते हैं और उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताएं क्या हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां इन जानकारियों के आधार पर अपनी उत्पादन और विपणन योजनाएं बना रही हैं। यहां तक कि कई नए स्टार्टअप भी विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर आ गएं हैं।

इसी संदर्भ में कुछ समय पहले रियल एस्टेट क्षेत्र की कंपनी ‘स्क्वायर यार्ड्स’ द्वारा किए गए एक शोध की चर्चा सामने आई। इसके अनुसार, वरिष्ठजन अपनी सुनहरी उम्र में रहने के लिए छोटे शहरों और धार्मिक स्थलों को प्राथमिकता देते हैं। इस निष्कर्ष में काफी हद तक व्यावहारिकता भी दिखाई देती है।

बड़े शहरों से छोटे शहरों की ओर

महानगरों का जीवन अपनी तेज रफ्तार, भागदौड़, ट्रैफिक और महंगी जीवनशैली के लिए जाना जाता है। नौकरी और व्यवसाय के दिनों में ये सुविधाएं और अवसर हमें आकर्षित करते हैं, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद प्राथमिकताएं बदलने लगती हैं। अब अपेक्षाकृत शांत वातावरण, कम खर्च और सरल जीवन अधिक आकर्षक लगने लगता है।

परिचित लोगों से मिलना-जुलना और सामाजिक संबंध बनाए रखना भी आसान हो सकता है। लेकिन यह मान लेना उचित नहीं होगा कि हर छोटा शहर वरिष्ठजनों के लिए बेहतर है। वहां अच्छे अस्पताल, विशेषज्ञ डॉक्टर, सार्वजनिक परिवहन और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है।

धार्मिक स्थलों का आकर्षण

भारतीय समाज में धर्म और आध्यात्मिकता का विशेष स्थान है। उम्र बढ़ने के साथ अनेक लोगों की रुचि पूजा-पाठ, भजन, सत्संग, प्रवचन और आध्यात्मिक चिंतन में बढ़ जाती है। ऐसे में धार्मिक स्थलों के आसपास रहना उन्हें मानसिक शांति और संतोष दे सकता है।

इन स्थानों पर समान रुचि और विचारधारा वाले लोगों से मिलने का अवसर भी मिलता है। सत्संग में भाग लेना, मंदिर जाना या किसी सामाजिक अथवा धार्मिक गतिविधि से जुड़ना दिनचर्या को अर्थपूर्ण बना सकता है।

आजकल कई धार्मिक नगरों में बहुमंजिला इमारतें और आवासीय परिसर विकसित हो रहे हैं, जहां फ्लैट खरीदने के साथ-साथ किराये पर रहने के विकल्प भी उपलब्ध हैं।

सुविधाएं और सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण

रहने के स्थान का चुनाव करते समय अस्पतालों और डॉक्टरों की निकटता, सुरक्षा, परिवहन, बाजार और दैनिक जरूरतों की उपलब्धता को प्राथमिकता देनी चाहिए। आज भले ही हम पूरी तरह स्वस्थ और सक्रिय हों, लेकिन आने वाले वर्षों में हमारी जरूरतें बदल सकती हैं। इसलिए ऐसा स्थान चुनना समझदारी होगी जहां बढ़ती उम्र के साथ भी स्वतंत्रतापूर्वक रहना संभव हो।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई लोकप्रिय धार्मिक नगरों और छोटे शहरों में अब आबादी तेजी से बढ़ रही है। संकरी सड़कें, बढ़ते वाहन, भीड़ और प्रदूषण वहाँ की शांति को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए केवल शहर के नाम या उसकी धार्मिक पहचान से प्रभावित होकर निर्णय लेना उचित नहीं है। वास्तविक स्थिति का आकलन करना जरूरी है।

क्या बच्चों के पास रहना बेहतर है?

कुछ वरिष्ठजन अपने बच्चों के साथ या उनके नजदीक रहना पसंद करते हैं। इससे पारिवारिक जुड़ाव बना रहता है और आवश्यकता पड़ने पर सहायता भी मिल सकती है। वहीं कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अलग घर में रहना चाहते हैं।

हमें यह भी समझना चाहिए कि बच्चों की नौकरी, उनके परिवार और जीवनशैली के कारण वे हमेशा हमारी जरूरतों के अनुसार उपलब्ध नहीं रह सकते। इसलिए अपनी पूरी दिनचर्या और सामाजिक जीवन को केवल बच्चों पर निर्भर रखना उचित नहीं है।

निर्णय सोच-समझकर लें

मेरे विचार में सुनहरी उम्र में रहने के लिए कोई एक आदर्श स्थान नहीं हो सकता। किसी के लिए अपना पुराना घर सबसे अच्छा है, किसी के लिए बच्चों के पास रहना, तो किसी के लिए कोई छोटा शहर या धार्मिक स्थल। महत्वपूर्ण यह है कि हमारा चुना हुआ स्थान हमें सुरक्षा, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य सुविधाएं, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक शांति प्रदान करे।

याद रखिए, सुनहरी उम्र केवल रहने की जगह बदलने का नाम नहीं है। यह जीवन को अपनी पसंद के अनुसार, सक्रियता और संतोष के साथ जीने का समय है। इसलिए फैसला भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों, साधनों और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर कीजिए।

सही जगह वही है, जहां हम केवल रह न रहे हों, बल्कि खुशी से जी भी रहे हों।

दिमागी सेहत पर विशेष ध्यान दें

आज बात करते हैं अपनी दिमागी सेहत की। जब भी स्वास्थ्य की चर्चा होती है, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की बात साथ-साथ होती है। यदि पूछा जाए कि दोनों में से किस पर अधिक ध्यान देना चाहिए, तो मेरा मानना है कि दोनों को समान महत्व देना चाहिए। शरीर स्वस्थ हो, लेकिन मन अशांत हो, तो जीवन का आनंद अधूरा रह जाता है। इसी तरह, मन में उत्साह हो, लेकिन शरीर साथ न दे, तो भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

एक दिलचस्प बात पर गौर कीजिए। जब हम अपनी सेहत सुधारने के बारे में सोचते हैं, तो मन में विचार आता है कि प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए, योग करना चाहिए और सुबह खुली हवा में सैर करनी चाहिए। लेकिन इन सबका विचार भी तो हमारा दिमाग ही करता है! हमारा मस्तिष्क ही हमें निर्णय लेने और उन पर अमल करने के निर्देश देता है। इसलिए अपने मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।

इसके लिए हमें कोई बहुत असाधारण काम करने की अनिवार्यता नहीं है। घर के बड़ों से मिली अच्छी सीख को जीवन में उतारने की अपेक्षा है।

सबसे पहले, लोगों से संवाद बनाए रखें। अपने मन की आवश्यक बातें किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करें। मन में बातें दबाकर रखने से चिंता बढ़ सकती है, जबकि खुलकर बातचीत करने से मन हल्का होता है। इसी से जुड़ी एक और बात है — सच बोलना। यदि हम किसी बात को छिपाते हैं या झूठ बोलते हैं, तो अगली बार उस व्यक्ति से मिलते समय हमें याद रखना पड़ता है कि पिछली बार क्या कहा था। इस अनावश्यक मानसिक दबाव से बचने का सरल उपाय है ईमानदारी और स्पष्टता।

दूसरी बात, तनाव से यथासंभव दूर रहने का प्रयास करें। आप कह सकते हैं कि यह कहना आसान है, लेकिन जीवन में परिवार, रिश्तों, आर्थिक परिस्थितियों और अन्य कारणों से चिंताएं आती ही रहती हैं। तनाव को पूरी तरह समाप्त करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उससे निपटने का तरीका हम सीख सकते हैं। ऐसे समय में अध्यात्म, प्रार्थना, ध्यान और कुछ समय शांत बैठना बहुत सहायक हो सकता है। अपनी आस्था के अनुरूप कोई भी अभ्यास मन को स्थिरता दे सकता है।

जीवन की परिस्थितियों को स्वीकार करना भी सीखें। हर बात हमारे अनुसार नहीं होती और हर व्यक्ति की सोच तथा व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कई बार हम दूसरों के व्यवहार पर तुरंत नाराज हो जाते हैं, जबकि हमें उनकी परिस्थितियों की पूरी जानकारी नहीं होती।

उदाहरण के लिए, ऑटो या टैक्सी में कभी बहुत विनम्र चालक मिलता है और कभी कोई रूखा व्यवहार करता है। संभव है कि उसके साथ पिछले यात्री ने दुर्व्यवहार किया हो या वह किसी निजी परेशानी से गुजर रहा हो। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें गलत व्यवहार सहते रहना चाहिए, बल्कि यह कि हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेकर अपने मन की शांति खराब करना भी उचित नहीं है।

इसी तरह, क्षमा करने की आदत डालें। इसका अर्थ गलत बात को सही मान लेना नहीं है। क्षमा का अर्थ है अपने मन में नाराजगी और कड़वाहट का बोझ अनावश्यक रूप से ढोते न रहना। कई बार हम किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में सोच-सोचकर स्वयं अपना तनाव बढ़ाते रहते हैं। ऐसे में क्षमा करना स्वयं को मानसिक शांति देने का एक अच्छा उपाय बन सकता है।

अब बात करें मस्तिष्क को सक्रिय रखने की। नियमित योगाभ्यास और ध्यान के साथ-साथ पढ़ना, लिखना, नई चीजें सीखना और लोगों से बातचीत करना भी उपयोगी है। अखबारों में आने वाली सुडोकू, शब्द पहेली और क्रॉसवर्ड जैसी गतिविधियों को हल करें। अपने पोते-पोतियों के साथ खेलें। उनसे नई तकनीक और नई चीजें सीखने में संकोच न करें। इससे पीढ़ियों के बीच संवाद भी बढ़ेगा और सीखने की रुचि भी बनी रहेगी।

उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भूलने की समस्या, लगातार उदासी, चिंता या किसी काम में रुचि समाप्त होना जैसे बदलावों को केवल बुढ़ापे का स्वाभाविक हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि ऐसे लक्षण लगातार बने रहें या दैनिक जीवन को प्रभावित करें, तो चिकित्सकीय सलाह अवश्य लें। इसी प्रकार, अचानक अत्यंत तेज सिरदर्द, शरीर के एक ओर कमजोरी या बोलने में परेशानी जैसे लक्षणों में तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

अंत में, मेरा यही कहना है — पढ़ते रहें, लिखते रहें, लोगों से संवाद करते रहें, नई चीजें सीखते रहें और जीवन में प्रसन्नता के अवसर तलाशते रहें। अपनी भावनाओं को समझें, जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद लें और अपने मन पर अनावश्यक बोझ न डालें।

याद रखिए, स्वस्थ जीवन का अर्थ केवल शरीर का स्वस्थ होना नहीं है। मन की शांति, विचारों में सकारात्मकता और जीवन के प्रति उत्साह भी उतने ही आवश्यक हैं। यही आदतें हमारी दूसरी पारी को अधिक सुखद, सक्रिय और सार्थक बना सकती हैं।

दिमाग का ध्यान रखिए, मन को प्रसन्न रखिए और जीवन को भरपूर जीते रहिए। यही तो है — ‘नेवर से रिटायर्ड’ की भावना!

Monday, October 19, 2026

वृद्धावस्था की तैयारी शुरू करने में समझदारी

अगर आपकी उम्र 45–50 वर्ष के आसपास है, या थोड़े बड़े तो यह लेख आपके लिए है। जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा आप जी चुके हैं। जिम्मेदारियों को निभाते हुए, परिवार और करियर को संभालते हुए आपने बहुत कुछ सीखा है। लेकिन एक सच यह भी है कि हर गुजरते दिन के साथ आप अपने जीवन की उस अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे हम वरिष्ठावस्था कहते हैं।

यह सही समय है जब आज के वरिष्ठजन अपने अनुभवों से आपको कुछ ऐसी बातें बताएं, जिन पर समय रहते ध्यान देना आपके आने वाले वर्षों को बेहतर बना सकता है।

आपने अपने माता-पिता को उम्र के इस पड़ाव से गुजरते देखा होगा। उनके जीवन के अंतिम कुछ वर्षों या महीनों को याद कीजिए। क्या आपने कभी गंभीरता से सोचा है कि उस समय उनकी सबसे बड़ी परेशानी क्या थी? क्या आर्थिक संपन्नता, समाज में सम्मान और जीवनभर की उपलब्धियां उनके लिए पर्याप्त थीं? या फिर ऐसी भी परिस्थितियां आईं जब छोटी-छोटी जरूरतों के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर होना पड़ा?

अपने माता-पिता के अनुभवों से बड़ी सीख शायद ही कहीं और मिल सके। आज जो परिस्थितियां आप उनके जीवन में देख रहे हैं, कल उनका सामना आपको भी करना पड़ सकता है।

जरा सोचिए, यदि उम्र बढ़ने के बाद भी आप सुबह अपने बिस्तर से उठकर स्वयं बाथरूम तक जा सकें, अपने जरूरी काम कर सकें और अपनी दिनचर्या बिना किसी की मदद के पूरी कर सकें, तो इससे बड़ी खुशी क्या होगी? इसके विपरीत, यदि व्यक्ति को हर छोटे-बड़े काम के लिए किसी दूसरे का सहारा लेना पड़े, तो उसका जीवन कितना कठिन हो सकता है।

यह भी सच है कि पूरी जिंदगी सुख-सुविधाओं में बिताने वाले, आर्थिक रूप से संपन्न और परिवार तथा समाज में प्रतिष्ठित लोग भी उम्र के इस पड़ाव पर शारीरिक रूप से असहाय हो सकते हैं। पैसा अच्छी सुविधाएं दिला सकता है, लेकिन शरीर की कार्यक्षमता और मन की शांति की गारंटी नहीं दे सकता।

आज के 45–50 वर्ष के लोगों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अभी आपके पास समय है। शरीर की देखभाल, खान-पान में सुधार और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देकर आप अपने भविष्य को बेहतर बनाने की दिशा में कदम उठा सकते हैं।

हम सभी स्वतंत्र रहना चाहते हैं। किसी पर निर्भर होना किसी को अच्छा नहीं लगता। लेकिन जीवन में एक समय ऐसा आ सकता है जब हमें जीवनसाथी, परिवार के सदस्यों या किसी प्रशिक्षित देखभालकर्ता की मदद की जरूरत पड़े। सहायता लेना अपने आप में गलत नहीं है; अपनों का साथ और देखभाल जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। फिर भी, यदि हम अपनी सेहत का ध्यान रखकर उस समय को आगे बढ़ा सकें, जब हमें दूसरों की सहायता की आवश्यकता हो, तो यह हमारे लिए और हमारे परिवार के लिए बहुत बड़ी राहत होगी।

कभी-कभी हम वरिष्ठजनों को यह कहते सुनते हैं कि ऐसी लाचारी भरी जिंदगी से तो मृत्यु बेहतर है। लेकिन जीवन और मृत्यु हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। हमारे हाथ में जो है, वह है आज अपने लिए सही फैसले लेना। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि जीवन के अंतिम वर्षों में भी हम यथासंभव सक्रिय, आत्मनिर्भर और प्रसन्न रह सकें।

इस दिशा में सबसे पहला कदम है अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना। नियमित रूप से टहलना, अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करना, संतुलित भोजन लेना, पर्याप्त नींद लेना और समय-समय पर स्वास्थ्य की जांच करवाना जीवनशैली का हिस्सा बनाइए।

सिर्फ शरीर ही नहीं, मन को संभालना भी उतना ही जरूरी है। उम्र बढ़ने के साथ तनाव, चिंता, गुस्सा और रिश्तों में खिंचाव हमारे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। हर बात पर प्रतिक्रिया देना, दूसरों से अपनी तुलना करना या छोटी-छोटी बातों को मन में पालकर रखना हमारी शांति छीन लेता है। अपने गुस्से पर नियंत्रण रखिए, परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखिए और रिश्तों में संवाद तथा समझदारी को महत्व दीजिए।

अपने वित्तीय भविष्य की योजना बनाना भी आवश्यक है। बच्चों की शिक्षा, परिवार की जरूरतों और दूसरी जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपनी वृद्धावस्था के लिए भी बचत और उचित वित्तीय व्यवस्था कीजिए। यह न मानें कि भविष्य में बच्चे ही आपकी हर जरूरत पूरी कर देंगे। बच्चों से प्रेम और अपेक्षा रखना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक तैयारी करना आपकी जिम्मेदारी है।

एक और महत्वपूर्ण बात — अपने दोस्तों का दबाव, सामाजिक दिखावा या दूसरों की जीवनशैली देखकर अपनी अच्छी आदतों से समझौता मत कीजिए। यदि आपको नियमित व्यायाम करना है, समय पर सोना है या खान-पान में परहेज रखना है, तो दृढ़ रहिए।

याद रखिए, स्वस्थ और खुशहाल वृद्धावस्था की तैयारी वृद्ध होने के बाद नहीं, बल्कि आज से शुरू होती है।

इसलिए मेरी आपसे बस इतनी-सी अपील है — अपने आप को संभालिये। अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह मत बनिए, अपने मन को मजबूत रखिए और जिंदगी को हंसते-हंसते आगे बढ़ाइए। आने वाले वर्षों में आप कितने आत्मनिर्भर और प्रसन्न रहेंगे, यह काफी हद तक आज की आपकी आदतों और फैसलों पर निर्भर करता है।

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वरिष्ठजन, टोकना कम करें — समझाना बढ़ाएं

बार-बार टोकना और दूसरों की हर बात में गलतियां निकालना — पता नहीं क्यों, लेकिन यह छवि धीरे-धीरे वरिष्ठजनों के साथ जुड़ती जा रही है। कई बार हम किसी को सही कारण से भी कोई काम ठीक से न करने के लिए टोकते हैं या उसकी किसी गलती के बारे में उसे आगाह करते हैं, लेकिन सामने से तुरंत जवाब आता है — “बढ़ती उम्र में आपका नेचर ही ऐसा हो गया है।”

सवाल यह है कि क्या वास्तव में उम्र बढ़ने के साथ हमारा स्वभाव ऐसा हो जाता है? शायद पूरी तरह नहीं। इसके पीछे हमारी चिंता, अनुभव और अपने बच्चों के लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा भी होती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अच्छी बात भी अगर बार-बार और गलत तरीके से कही जाए तो सामने वाले को अच्छी नहीं लगती।

समय बदल गया है। हमें अपने बच्चों और उनसे भी आगे की पीढ़ी यानी अपने पोते-पोतियों को भी कुछ इस तरह समझना होगा कि हम अपनी बात कह सकें और उन्हें बुरा भी न लगे।

आज की पीढ़ी का सोचने और काम करने का तरीका हमसे अलग है। धैर्य शायद पहले जितना नहीं रहा। बच्चे और युवा अपने काम में व्यस्त रहते हैं, अपने मित्रों से प्रभावित होते हैं और आधुनिक तकनीक तथा नए तौर-तरीकों के साथ बड़े हुए हैं। किसी काम को करने का उनका तरीका हमारे तरीके से अलग हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि उनका तरीका गलत ही हो।

दूसरी ओर, हम वरिष्ठजनों को अपनी आंखों के सामने कोई गलती होते देखना अच्छा नहीं लगता। आखिर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों का जीवन सुखी हो, उनका भविष्य अच्छा हो और वे गलत फैसलों से बचें। हमारी सलाह के पीछे यही प्रबल इच्छा होती है।

लेकिन यहीं हमें थोड़ा सावधान होने की आवश्यकता है।

हमारी बात सही हो सकती है, लेकिन उसे कहने का तरीका गलत हो सकता है। अगर हम हर छोटी-बड़ी बात पर यह जताने लगें कि “तुम्हें कुछ पता ही नहीं”, “तुम हमेशा गलती करते हो” या “हमसे ज्यादा तुम क्या जानते हो”, तो सामने वाला हमारी सलाह सुनने के बजाय उससे बचने लगेगा।

हमें इसके बजाय अपनी बात समझाने का तरीका बदलना होगा। किसी बात को आदेश की तरह कहने के बजाय अपने अनुभव का उदाहरण दें। कह सकते हैं — “मेरे साथ एक बार ऐसा हुआ था, इसलिए मुझे लगता है कि तुम्हें यह तरीका अपनाना चाहिए।” या फिर पूछ सकते हैं — “क्या तुमने इस विकल्प के बारे में सोचा है?”

जब सलाह बातचीत का हिस्सा बनती है तो उसे स्वीकार करने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन जब वही सलाह आलोचना का रूप ले लेती है तो सामने वाला स्वाभाविक रूप से उसका विरोध करने लगता है।

वह जमाना भी अब नहीं रहा जब हमारे माता-पिता या दादा-दादी कुछ कह देते थे और हम उसे लगभग ब्रह्मवाक्य मानकर तुरंत स्वीकार कर लेते थे। आज की पीढ़ी हर बात के पीछे तर्क ढूंढती है। कुछ हद तक देखें तो यह गलत भी नहीं है। आधुनिक जीवन, नई तकनीक और बदलते सामाजिक तौर-तरीकों ने काम करने के अनेक नए तरीके पैदा किए हैं। जो तरीका हमें सही लगता है, जरूरी नहीं कि वही आज भी सबसे सही हो।

एक और महत्वपूर्ण बात पर हमें विचार करना चाहिए। हर समय किसी को रोकना, उसकी गलतियां ढूंढना और फिर हमारी बात न माने जाने पर अपना मन खराब करना — इसका फायदा किसे है? हम दुखी होते हैं क्योंकि हमने तो अच्छी सलाह दी थी, फिर सामने वाले ने मानी क्यों नहीं। लेकिन हमें यह स्वीकार करना सीखना होगा कि सलाह देना हमारे हाथ में है, उसे मानना सामने वाले के हाथ में।

यह भी याद रखना चाहिए कि भले ही हमने अपने बच्चों को बड़ा किया है, लेकिन उनकी शिक्षा, उनके मित्र, उनका अनुभव, उनका कार्यक्षेत्र और परिस्थितियों ने भी उनके व्यक्तित्व को आकार दिया है। उन्होंने अपनी एक अलग सोच और अपनी दिशा बनाई है।

हमारा प्रयास तो केवल यह होना चाहिए कि हम उन्हें इतना सक्षम बनाये कि वो सही और गलत में अंतर कर सकें, परिस्थितियों को समझ सकें, अपने फैसले स्वयं ले सकें और अपने भविष्य के बारे में सोच सकें। और अगर कभी वे कोई गलती करते भी हैं तो हर गलती पर तुरंत प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं। कुछ गलतियां इंसान को वह सिखा देती हैं जो दस सलाहें नहीं सिखा सकतीं।

वरिष्ठ होने का अर्थ यह नहीं कि हर बात पर अपनी वरिष्ठता साबित की जाए। वरिष्ठ होने का असली अर्थ है — अपने अनुभव का उपयोग दूसरों का जीवन बेहतर बनाने में करना।

हमारे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। उनके बच्चे भी अब बड़े हो रहे हैं और आने वाले समय में वे भी इन्हीं परिस्थितियों का सामना करेंगे। हम उन्हें केवल अपनी बातों से ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से भी शिक्षा दे रहे हैं।

यह शिक्षा किसी पुस्तक में नहीं मिलेगी। वे देखेंगे कि उनके दादा-दादी असहमति होने पर कैसे व्यवहार करते हैं, गलती होने पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और रिश्तों को अपनी बात से अधिक महत्व देते हैं या नहीं।

शायद अब समय है कि हम टोकना थोड़ा कम करें, समझाना थोड़ा बढ़ाएं; गलतियां निकालना कम करें और उदाहरण देकर रास्ता दिखाएं। क्योंकि अंततः हमें यह तय करना है कि हम अपने अनुभव से रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं या हर बात में सही साबित होना।

English version available on website www.neversayretired.in

Wednesday, October 07, 2026

विलुप्त होता परिवार

पिछले दिनों व्हाट्सऐप पर केवल 35 सेकंड का एक वीडियो मिला। समय इतना कम कि शायद उसे देखने में भी हमने ज्यादा नहीं सोचा होगा — लेकिन वीडियो समाप्त होने के बाद एक सवाल मन में अटक गया। पांच तस्वीरें थीं। पहली में एक भरा-पूरा, हंसता-खेलता परिवार था — वैसा परिवार जिसकी तस्वीर कभी हमारे अपने घर की दीवार पर भी हुआ करती थी। हर अगली तस्वीर में चेहरे कम होते गये। और पांचवीं तस्वीर तक आते-आते घर में केवल पति-पत्नी रह गए। 35 सेकंड की यह कहानी शायद किसी एक परिवार की नहीं थी; यह हमारे बदलते समाज का आईना थी।

हमने अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दी। वे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी के योग्य बने। उनकी तनख्वाह भी ऐसी, जिसे हम सफलता का प्रतीक मानते हैं। फिर उनका विवाह हुआ और उनके जीवनसाथी भी अच्छी नौकरी में हैं। दोनों मिलकर कमाते हैं, फिर भी आज की परिस्थितियों में दो या तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाना उन्हें कठिन लगता है।

तब मन में एक सहज प्रश्न उठता है — जिस अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी और अच्छी आय के लिए हमने इतनी मेहनत की, यदि उसी के बावजूद परिवार बढ़ाना संभव नहीं रह गया, तो आखिर उस आर्थिक सफलता का उद्देश्य क्या रह जाता है?

हम वरिष्ठ लोगों को अपने बचपन के दिन याद आते हैं। हमारे दादा-दादी पूरे परिवार के साथ रहते थे। पांच-सात भाई-बहन होना कोई असाधारण बात नहीं थी। घर में चहल-पहल रहती थी। काम बंटा हुआ था। घर का बना भोजन मिलता था और उसमें केवल स्वाद ही नहीं, अपनापन भी होता था। परिवार बड़ा था, लेकिन शायद जिम्मेदारियां भी उसी अनुपात में बांटी हुई थीं। अधिकांश बच्चे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ते थे और आगे चलकर अपनी जीविका कमाने में सक्षम हो जाते थे।

लेकिन केवल अतीत को याद करके वर्तमान को नहीं समझा जा सकता। समय बदल चुका है। आज शिक्षा महंगी है, आवास महंगा है, बच्चों की परवरिश महंगी है और नौकरी तथा जीवन की अनिश्चितताएं भी पहले से अलग हैं।

चलिए, भविष्य की कल्पना भी करें।

हमारे पोते-पोतियां जब 70 वर्ष के होंगे, तब दुनिया कैसी होगी, यह हम शायद कभी जान नहीं पाएंगे। तब तक हम इस दुनिया में होंगे भी नहीं। लेकिन आज जो दिखाई दे रहा है, उससे एक बात पर विचार करना आवश्यक है — यदि परिवार लगातार छोटे होते गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप कैसा होगा?

एक मध्यमवर्गीय परिवार का उदाहरण लें। पति-पत्नी और उनके दो बच्चे — एक बेटा और एक बेटी। बच्चे बड़े हुए और वे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए। लगभग 65 वर्ष की आयु में पति का निधन हो गया और पत्नी अकेली रह गईं। दुर्भाग्य से कुछ समय बाद बेटे का भी बीमारी के कारण कम उम्र में निधन हो गया। बेटी अपने वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों के कारण अपनी मां के साथ रहने लगी। अंततः मां के निधन के बाद उस परिवार की वह पीढ़ी वहीं समाप्त हो गई।

एक अन्य परिचित परिवार में दो बेटे थे। दोनों ने बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त की, योग्य बने और अमेरिका में अच्छी नौकरियां प्राप्त कीं। वे भारत लौटे, यहीं की लड़कियों से विवाह किया और फिर अमेरिका चले गए। जीवन आगे बढ़ता गया। बच्चे हुए, करियर बना, परिवार बढ़े — लेकिन दूसरी ओर माता-पिता बूढ़े होते गए।

बुढ़ापे में जब माता-पिता को सबसे अधिक साथ और सहारे की आवश्यकता होती है, तब वे हजारों किलोमीटर दूर अपने बच्चों की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। और जब पति-पत्नी में से किसी एक का निधन हो जाता है, तब अकेलेपन का भार और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वृद्धाश्रम कई बार एक व्यावहारिक सहारा बन जाता है — भले ही भावनात्मक रूप से वह उस कमी को पूरा न कर सके जिसकी आवश्यकता उस समय सबसे अधिक होती है।

यह किसी व्यक्ति, किसी पीढ़ी या किसी व्यवस्था को दोष देने का विषय नहीं है। समाज बदल रहा है और परिवार भी उसके साथ बदल रहे हैं। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और अब कभी-कभी केवल दंपति तक सीमित परिवार — यह परिवर्तन हमारे सामने है।

शायद हमें यह स्वीकार करना होगा कि समय को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। संयुक्त परिवार लौटेंगे या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं है। परिवार छोटे हो रहे हैं और आगे भी छोटे होते जाएंगे। बच्चे दूर शहरों और देशों में बसेंगे। एक समय ऐसा भी आ सकता है जब एक परिवार में भाई-बहन का रिश्ता ही बहुत कम दिखाई दे, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों से मिलना तो दूर की बात होगी।

यह केवल भावनात्मक चिंता नहीं है। परिवार हमारे सामाजिक जीवन की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण संस्था रहा है। यदि परिवार का आकार लगातार घटता गया, तो इन जिम्मेदारियों को निभाने का तरीका भी बदलना पड़ेगा।

सवाल यह नहीं है कि परिवार क्यों छोटे हो रहे हैं — इसके पीछे आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत अनेक कारण हैं। असली सवाल यह है कि यदि परिवार इसी तरह छोटा होता गया, तो आने वाली पीढ़ियों में परिवार का स्वरूप क्या रह जाएगा?

A video based on this article has been posted on Never Say Retired YouTube channel. The link is https://www.youtube.com/watch?v=hn7Bv3CjINQ

The English version of this article, titled The Vanishing Family, has been posted on our website and the link is
https://neversayretired.in/the-vanishing-family/

Monday, September 28, 2026

एक छोटी सी लापरवाही, बड़ी परेशानी

आज एक बार फिर मैं पैरों की देखभाल और गिरने से बचने के बारे में लिख रहा हूं। मैंने इस विषय पर पहले भी कई बार लिखा है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसे बार-बार याद दिलाना जरूरी है। आखिरकार, एक छोटी सी चूक हमें लंबे समय के लिए बिस्तर पर पहुंचा सकती है।

आजकल हमारे वाट्सएप समूहों में भी ऐसे अनेक वीडियो और संदेश आते रहते हैं, जिनमें बुजुर्गों को चलते समय, सीढ़ियां चढ़ते-उतरते समय और खासकर बाथरूम का उपयोग करते समय बेहद सावधान रहने की सलाह दी जाती है।

कई बार इसका कारण कोई बड़ी गलती नहीं होती। बस थोड़ा सा अति-आत्मविश्वास, चलते समय ध्यान का कहीं और होना या यह सोचना कि “मैं तो रोज यहां से चलता हूं, मुझे क्या होगा?” और फिर वही होता है जिसका हमें डर भी नहीं था।

मेरे कुछ बहुत करीबी मित्रों के उदाहरण हमारे सामने हैं।

एक मित्र अपने ही बेडरूम से लगे बाथरूम में जा रहे थे। बाथरूम के दरवाजे पर एक छोटी सी चटाई रखी थी। पैर उस पर पड़ा, पैर उलझा और वे गिर गए। हम दिन में कई बार अपने बाथरूम का इस्तेमाल करते हैं और हमें लगता है कि हम उस जगह से पूरी तरह परिचित हैं। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ हम पहले की तरह पैर ऊपर नहीं उठा पाते। हमारी चाल में थोड़ा बदलाव आता है और यही छोटी सी बात कभी-कभी बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाती है।

एक दूसरे मित्र अपनी पत्नी को किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए अस्पताल ले जा रहे थे। पत्नी को कार में बैठाने में उनकी मदद करते समय उनका अपना पैर सड़क की असमतल सतह पर पड़ा और वे गिर गए। सड़क और फुटपाथ हमारे लिए रोजमर्रा की जरूरत हैं, लेकिन उनकी असमान सतह, गड्ढे, टूटे हुए हिस्से या अचानक ऊंचा-नीचा होना हमारे लिए खतरा बन सकते हैं। उम्र बढ़ने पर हमें इन चीजों के प्रति पहले से अधिक सजग रहना होगा।

एक और मित्र की घटना तो और भी सीख देने वाली है। उन्होंने अपने पति को गिरते हुए देखा और तुरंत उनकी मदद करने के लिए दौड़ीं। जल्दबाजी में उनका अपना संतुलन बिगड़ा और वे भी गिर गईं। उनके कंधे में हेयरलाइन फ्रैक्चर हो गया। कई सप्ताह तक हाथ स्लिंग में रहा और दर्द लंबे समय तक बना रहा।

ये कोई असाधारण घटनाएं नहीं हैं। हममें से लगभग हर व्यक्ति ऐसे कई उदाहरण अपने परिवार, रिश्तेदारों या मित्रों के बीच देख चुका होगा। दुखद बात यह है कि इन घटनाओं को सुनने के बाद भी कभी-कभी हम स्वयं उसी गलती को दोहरा देते हैं और दूसरों के लिए एक उदाहरण बन जाते हैं।

तो आखिर हम क्या कर सकते हैं?

सबसे पहली बात, चलते समय हमारा पूरा ध्यान चलने पर होना चाहिए। मोबाइल फोन देखते हुए, संदेश पढ़ते हुए या बातचीत में इतना खोकर नहीं चलना चाहिए कि सामने का रास्ता ही दिखाई न दे। मोबाइल कुछ मिनट बाद भी देखा जा सकता है, लेकिन गिरने के बाद होने वाली परेशानी कई सप्ताह या कई महीने चल सकती है।

  1. जहां संभव हो, असमतल सड़क और टूटे-फूटे फुटपाथ से बचें। सुबह की सैर के लिए पार्क या ऐसी जगह चुनें जहां रास्ता समतल और सुरक्षित हो। तेज चलने से ज्यादा महत्वपूर्ण सुरक्षित चलना है।
  2. बाथरूम पर विशेष ध्यान दें। फिसलन वाली सतह, ढीली चटाई, अनावश्यक सामान या खराब रोशनी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। बाथरूम में पकड़ने के लिए हैंडल लगवाएं और फर्श को सूखा रखें। विषेश ध्यान दें कि कपड़े बाथरूप के बाहर आकर बहुत संभल कर पहने।
  3. जरूरत पड़ने पर छड़ी या किसी साथी की मदद लेने में बिल्कुल संकोच न करें। छड़ी का इस्तेमाल कमजोरी का संकेत नहीं है। बल्कि समय पर सहारा लेना समझदारी है।
  4. एक और महत्वपूर्ण बात है — अति-आत्मविश्वास से बचें। हममें से बहुत से लोग कहते हैं, “मैं तो अभी बिल्कुल ठीक हूं, मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं।” हो सकता है आप बिल्कुल ठीक हों, लेकिन उम्र के साथ हमारा संतुलन, प्रतिक्रिया की गति और शरीर पर नियंत्रण पहले जैसा नहीं रहता। इसे स्वीकार करना जरूरी है।
  5. मानसिक रूप से सक्रिय रहना भी मददगार हो सकता है। पहेलियां हल करना, मानसिक खेल खेलना, पढ़ना और ऐसी गतिविधियां करना जिनमें ध्यान और एकाग्रता की जरूरत हो, हमारे दिमाग को सक्रिय रखने में सहायक हो सकता है। शरीर और दिमाग दोनों को सक्रिय रखना हमारी दूसरी पारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

और अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात — गिरने से बचना केवल बुजुर्ग की जिम्मेदारी नहीं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। घर में रहने वाले सभी लोगों को यह देखना चाहिए कि रास्ते में अनावश्यक सामान न हो, कालीन या चटाइयां फिसलने वाली न हों, रोशनी पर्याप्त हो और बाथरूम सुरक्षित हो।

हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ हमारी सक्रियता कम न हो। हमें चलते रहना है, घूमना है, लोगों से मिलना है और अपनी पसंद के काम करते रहना है। लेकिन इसके लिए अपने पैरों और अपने संतुलन की सुरक्षा को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

याद रखिए — एक छोटी सी सावधानी हमें लंबे समय तक सक्रिय रख सकती है, जबकि एक छोटी सी लापरवाही हमारी पूरी दिनचर्या बदल सकती है।

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Wednesday, September 23, 2026

सच्ची खुशी पाने के कुछ मंत्र

मैं आज के अपने लेख में आपको कोई नई बात बताने नहीं जा रहा हूं। हां, एक बार फिर यह प्रयास जरूर रहेगा कि हम सब अपने जीवन के इस पड़ाव पर खुशी बटोरने के अधिक से अधिक अवसर तलाशते रहें।

जिन बातों की आज हम चर्चा करेंगे, उन्हें मैं अपने पिछले लेखों में कई बार उजागर कर चुका हूं। आप सब इतने अनुभवी हैं कि शायद इन विषयों पर मुझे ही बहुत कुछ सिखा सकते हैं। फिर भी मुझे इन्हीं बातों को दुबारा-तिबारा लिखने में कोई झिझक नहीं है। आखिर जिंदगी में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें जानना ही नहीं, बल्कि बार-बार याद करना भी जरूरी होता है।

सबसे पहला मंत्र तो वही पुराना है — अपने रिश्तों को मधुर बनाए रखें। ये रिश्ते दोस्तों के साथ हों या परिवार के साथ। उम्र बढ़ने के साथ इन रिश्तों की बहुमूल्यता शायद पहले से कहीं ज्यादा समझ में आने लगती है।

समय के साथ हम एक-एक करके अपने मित्रों को खोते जाते हैं। परिवार के बड़े भी धीरे-धीरे हमसे विदा लेते जाते हैं। ऐसे में हमारे पास जो रिश्ते बचे हैं, वही हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। इसलिए मन में कोई नाराजगी हो तो उसे बहुत लंबे समय तक न पालें। किसी से बात करनी हो तो आज ही कर लें। किसी को धन्यवाद देना हो तो आज ही दें। और किसी से माफी मांगनी हो तो उसमें भी देर न करें।

अकेलापन शायद जिंदगी के अंतिम वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती है। आजकल तो कुछ प्रोफेशनल सेवाएं भी उपलब्ध हैं। कई स्टार्टअप ऐसे हैं जो जरूरत पड़ने पर किसी व्यक्ति को आपके साथ समय बिताने के लिए उपलब्ध कराते हैं — आपसे बातचीत करने, बाहर टहलने, मंदिर या मॉल जाने तक में साथ देने के लिए। उनका शुल्क अक्सर घंटे के हिसाब से तय होता है। यह बदलते समय की जरूरत का संकेत है। लेकिन पैसे देकर मिलने वाली संगत और अपनेपन से मिलने वाले रिश्तों में फर्क तो रहेगा ही। इसलिए अपने रिश्तों को अभी से मजबूत बनाना जरूरी है।

दूसरा महत्वपूर्ण मंत्र है — अपनी स्थिति को स्वीकार करना।

हर दिन हम थोड़े और उम्रदराज हो रहे हैं। भगवान ने जिंदगी की रचना ही ऐसी की है। इसलिए बढ़ती उम्र से मन ही मन लड़ते रहना कोई समझदारी नहीं है। हम हमेशा जवान नहीं रह सकते। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि उम्र बढ़ने के साथ जिंदगी का आनंद समाप्त हो जाए।

सही जीवनशैली, संतुलित खान-पान, नियमित व्यायाम और सकारात्मक सोच के सहारे हम अपने स्वस्थ और सक्रिय वर्षों को काफी आगे तक ले जा सकते हैं। यही हमारे गोल्डन इयर्स को वास्तव में सुनहरा बना सकता है।

लाइफस्टाइल की बात करें तो रोज व्यायाम करना, योगाभ्यास करना और कुछ समय वॉक के लिए निकालना बहुत जरूरी है। इसके लिए किसी बहुत कठिन कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं। अपनी क्षमता और उम्र के अनुसार नियमित रूप से कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि करते रहना ही काफी महत्वपूर्ण है। शरीर को सक्रिय रखेंगे तो मन भी अधिक सक्रिय और प्रसन्न रहेगा।

इसी तरह खान-पान पर भी अब विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जवानी में हमने स्वाद के पीछे भागते हुए बहुत कुछ बिना सोचे-समझे खाया होगा। ज्यादा मसालेदार खाना, मिठाइयाँ और ऐसी कई चीजें जिनका आनंद उस समय तो खूब लिया, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर उन्हें उसी तरह स्वीकार नहीं करता।

अब स्वाद से ज्यादा स्वास्थ्य को महत्व देना होगा। पेट की जलन और एसिडिटी आज बहुत आम समस्या बन गई है और कई लोगों को इसकी दवाएं नियमित लेनी पड़ती हैं। डायबिटीज भी बहुत सामान्य हो गई है। इसमें थोड़ी सी लापरवाही आगे चलकर शरीर के कई अंगों पर असर डाल सकती है। इसलिए उम्र के इस पड़ाव पर संयम कोई सजा नहीं, बल्कि स्वस्थ और खुशहाल जीवन की कीमत है।

लेकिन खुशी केवल अच्छे स्वास्थ्य से नहीं मिलती। खुश रहने के लिए खुद को व्यस्त और उपयोगी बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। रिटायरमेंट का अर्थ काम से विदाई हो सकता है, जिंदगी से नहीं। अपनी रुचि का कोई काम चुनिए — पढ़िए, लिखिए, संगीत सुनिए, बागवानी कीजिए, यात्रा कीजिए, किसी सामाजिक संस्था से जुड़िए या किसी जरूरतमंद की मदद कीजिए।

और सबसे महत्वपूर्ण — अपनी खुशी को दूसरों पर निर्भर मत कीजिए। बच्चे अपने जीवन में व्यस्त होंगे, मित्र हमेशा उपलब्ध नहीं होंगे और परिस्थितियाँ हमेशा हमारे मन मुताबिक नहीं होंगी। इसलिए छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढने की आदत डालिए।

सुबह की सैर, किसी पुराने मित्र का फोन, परिवार के साथ बैठकर चाय पीना, किसी बच्चे को कुछ सिखाना, किसी की मदद करना या दिन के अंत में यह महसूस करना कि आज का दिन बेकार नहीं गया — ये छोटी बातें ही मिलकर बड़ी खुशी बनाती हैं।

आखिरकार, खुश रहने का सबसे बड़ा मंत्र शायद यही है — जो हमारे पास है, उसकी कद्र करें; जो नहीं है, उसके लिए लगातार दुखी न रहें; और जो समय हमारे पास बचा है, उसे शिकायत में नहीं, मुस्कुराहट में बिताएं।

लक्ष्य हो तो सुनहरी उम्र भी बनेगी खुशहाल

पिछले दिनों मुझे स्वामी गिरीशानंद सरस्वती जी महाराज के पांच दिवसीय श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय पर उनके ओजस्वी प्रवचन सुनने का सौभाग्य मिला। प्रतिदिन वे ऐसे अनेक प्रसंग सुनाते थे, जो दिल और दिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाते थे।

एक दिन उन्होंने कहा कि अपनी जिंदगी को सही मायने में जीने के लिए जीवन में एक लक्ष्य लेकर चलना चाहिए। उन्होंने यह बात सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए कही थी। लेकिन उनके इस विचार ने मुझे विशेष रूप से वरिष्ठजनों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या यह बात हमारे लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है?

हममें से अधिकांश लोग जीवन के चार-पांच दशक किसी न किसी काम में लगा देते हैं। नौकरी, व्यवसाय, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियां — इन सबके बीच हमारा जीवन एक निश्चित दिशा में चलता रहता है। फिर एक दिन हम उस काम से अवकाश ले लेते हैं। नौकरी समाप्त हो जाती है, पद और जिम्मेदारियां पीछे छूट जाती हैं और हम अपने जीवन के एक नए पड़ाव में प्रवेश करते हैं।

लेकिन एक बात नहीं बदलती — जिंदगी चलती रहती है।

सेवानिवृत्ति का अर्थ काम से अवकाश हो सकता है, जिंदगी से नहीं। उम्र के इस पड़ाव पर भी हमारे सामने कई वर्ष हो सकते हैं। फिर क्यों न उन वर्षों को किसी उद्देश्य, किसी लक्ष्य और किसी उत्साह के साथ जिया जाए?

आखिर हममें से कौन चाहता है कि जीवन केवल दिन गिनते हुए बीते? सुबह उठना, नाश्ता करना, अखबार पढ़ना, टीवी देखना, खाना और फिर सो जाना—और अगले दिन यही क्रम दोहराना। यदि जीवन केवल इसी दिनचर्या तक सीमित हो जाए और हम किसी अंतिम पड़ाव की प्रतीक्षा ही करते रहें, तो इसमें जीवन की खुशी कहां रह जाएगी?

कदापि नहीं। हमें लक्ष्य बनाना होगा।

यह लक्ष्य बहुत बड़ा हो, यह जरूरी नहीं। न ही इसका संबंध पैसे या पद से होना चाहिए। लक्ष्य कुछ भी हो सकता है — समाज सेवा करना, बच्चों को पढ़ाना, किसी युवा को मेंटर करना, किसी संस्था के साथ जुड़ना या घर की कोई ऐसी जिम्मेदारी अपने हाथ में लेना जिसे अब तक कोई और संभालता रहा हो।

और लक्ष्य हमेशा गंभीर ही हो, ऐसा भी जरूरी नहीं।

किसी को संगीत पसंद है तो वह तय कर सकता है कि अगले छह महीने में वह गाना सीखकर इतना अच्छा गाएगा कि किसी छोटे मंच पर अपनी कला प्रस्तुत कर सके। फिर वह रोज रियाज करेगा, किसी शिक्षक से सीखेगा, संगीत सुनेगा और अपनी प्रगति को देखेगा। देखते ही देखते उसके दिन में एक नई व्यस्तता आ जाएगी। और यह व्यस्तता बोझ नहीं होगी, बल्कि खुशी देगी।

यही लक्ष्य हमारे शरीर और मन दोनों के लिए अच्छा है। जब हमें किसी काम को पूरा करने की उत्सुकता होती है तो हम सक्रिय रहते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, कुछ नया सीखते हैं, घर से बाहर निकलते हैं और अपने स्वास्थ्य पर भी अधिक ध्यान देने लगते हैं।

एक मोटिवेशनल स्पीकर को सुनते हुए मैंने एक बहुत साधारण लेकिन प्रभावी बात सुनी। उन्होंने कहा कि जब आप सुबह उठें और आपके मन में यह स्पष्ट हो कि “आज मुझे यह काम पूरा करना है,” तो आपका दिन अपने आप बेहतर हो जाता है। आपके पास करने के लिए कुछ है, इसलिए आप सक्रिय रहते हैं। इसीलिए केवल जीवन का कोई बड़ा लक्ष्य ही नहीं, बल्कि हर दिन का भी एक लक्ष्य होना चाहिए।

मेरे परिचित एक सज्जन करीब सत्तर वर्ष के हुए तो उन्होंने अपने लिए एक अनोखा लक्ष्य बनाया। वे वर्षों से प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते थे, लेकिन उन्हें लगा कि वे उसके अर्थ को पूरी तरह नहीं समझते। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे हनुमान चालीसा को गहराई से समझेंगे।

उन्होंने इस विषय पर मिलने वाली पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं। जहां कहीं हनुमानजी की कथा या व्याख्यान होता, वहां जाने का प्रयास करते। इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से भी उन्होंने अध्ययन किया। धीरे-धीरे उनका ज्ञान बढ़ता गया। कुछ वर्षों में वे इस विषय के इतने जानकार हो गए कि अब दूसरे लोग उनसे हनुमान चालीसा का अर्थ और उसकी गहराई सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं।

सोचिए, यदि उन्होंने उस उम्र में यह कहकर छोड़ दिया होता कि “अब मेरी उम्र सीखने की नहीं है,” तो वे इस आनंद से वंचित रह जाते।

यही सोच हमें भी बदलनी होगी। लक्ष्य तय करने की उम्र समाप्त नहीं होती। बल्कि वरिष्ठावस्था में लक्ष्य का महत्व और बढ़ जाता है। जीवन के इस पड़ाव पर हमारे पास अनुभव है, समय है और अपनी पसंद के काम करने की स्वतंत्रता भी अपेक्षाकृत अधिक है।

इसलिए उम्र को लक्ष्य बनाने में बाधा न बनने दें। कोई नया हुनर सीखिए, कुछ पढ़िए, किसी को सिखाइए, समाज के लिए कुछ कीजिए, कोई पुराना सपना पूरा कीजिए या रोज अपने लिए कोई छोटा-सा लक्ष्य तय कीजिए।

जीवन की दूसरी पारी का सबसे बड़ा सुख यही है कि अब हमें किसी और के लक्ष्य पूरे नहीं करने हैं। अब हम अपने लक्ष्य चुन सकते हैं।

और जब जीवन में लक्ष्य रहेगा, तो हर सुबह नई उम्मीद लेकर आएगी, हर दिन कुछ करने की प्रेरणा देगा और हमारी सुनहरी उम्र केवल लंबी नहीं, बल्कि सार्थक, सक्रिय और खुशहाल भी बनेगी।

Till now my 125 articles have been published. All are available in Hindi and English on our website www.neversayretired.in
60 selected articles have been compiled in a book titled "Never Say Retired 60 Not Out", which is available through our website or Amazon.

बदलता घर, बदलता बचपन

अगर आप उन किस्मत वालों में से एक हैं, जो सत्तर वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, तो थोड़ा दिमाग पर जोर देते हुए याद करने का प्रयास कीजिए कि जब आप स्कूल और कॉलेज में पढ़ते थे, तब आपके घर का वातावरण कैसा रहता था। अब उसी वातावरण की तुलना आज के घर से कीजिए, जहां आपके पोते-पोतियां पढ़ाई कर रहे हैं।

हमारे समय में स्कूल से घर लौटने के बाद पढ़ाई जरूर होती थी, लेकिन उसके बाद घर से बाहर निकलकर दोस्तों के साथ खेलना भी हमारी दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा था। गली-मोहल्ले के बच्चे साथ होते थे। खेल के नियम भी हम खुद बनाते थे और झगड़े भी खुद ही सुलझा लेते थे। हारना, जीतना, अपनी बारी का इंतजार करना, दूसरे की बात मानना और कभी-कभी अपनी गलती स्वीकार करना — ये सब जीवन के ऐसे पाठ थे, जो हमें किसी किताब में नहीं पढ़ाए गए।

आज के बच्चों के पास शायद खेलने के लिए समय ही नहीं है। स्कूल से लौटे नहीं कि असाइनमेंट, प्रोजेक्ट और पढ़ाई का दबाव शुरू हो जाता है। इसके बाद म्यूजिक क्लास, डांस, कराटे, स्विमिंग, अबेकस और न जाने कितनी दूसरी गतिविधियां। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा हर क्षेत्र में आगे रहे। वे अपने बच्चे को भविष्य की प्रतियोगिता के लिए तैयार करना चाहते हैं।

लेकिन कभी-कभी यह विचार जरूर आता है कि आखिर हम अपने बच्चों को बनाना क्या चाहते हैं — एक सफल इंसान या एक खुशहाल इंसान?

हमारे समय का एक और बड़ा अंतर परिवार की संरचना का था। हममें से बहुतों के घरों में भाई-बहनों के अलावा चाचा-ताऊ के बच्चे भी आसपास रहते थे। संयुक्त परिवारों में बच्चों की संख्या ज्यादा होती थी। घर में हमेशा किसी न किसी हमउम्र के साथ खेलने और बातचीत करने का अवसर रहता था। आज एकल परिवार सामान्य बात है और कई परिवारों में एक ही बच्चा है।

एक और बात पर ध्यान दीजिए। जब हम पढ़ते थे, तो कितने बच्चों के पास अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग ट्यूशन शिक्षक होते थे? हमारे माता-पिता में से कितने लोग हर विषय के लिए विशेष कोचिंग का खर्च उठा सकते थे? अधिकांश बच्चे स्कूल में जो पढ़ाया जाता था, उसी पर निर्भर रहते थे। जरूरत पड़ने पर किसी बड़े भाई, बहन, पड़ोसी या घर के किसी सदस्य से मदद ले लेते थे।

आज शिक्षा के अवसर निश्चित रूप से बढ़े हैं। तकनीक ने ज्ञान को हमारे घर तक पहुंचा दिया है। लेकिन इसी तकनीक ने घर के वातावरण को भी बदल दिया है।

मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट और इंटरनेट आज लगभग हर घर का हिस्सा हैं। बच्चे इन उपकरणों में व्यस्त हैं तो माता-पिता भी उनसे अछूते नहीं हैं। कभी काम के लिए, कभी सोशल मीडिया के लिए और कभी मनोरंजन के लिए — परिवार के सदस्यों का ध्यान अक्सर एक ही कमरे में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन पर रहता है।

फिर वह समय कब मिलता है जब दादा-दादी, माता-पिता और बच्चे बैठकर आपस में बात करें? कब बच्चे घर के बड़ों से अपने सवाल पूछें? कब उन्हें बातों-बातों में जीवन के छोटे-छोटे अनुभव और जीवन कौशल सीखने का अवसर मिले?

शायद यही एक कारण है कि आज बच्चों में चिड़चिड़ापन और अधीरता कुछ अधिक दिखाई देती है। इसमें बच्चों का दोष कितना है, यह सोचने की जरूरत है। जब बच्चा कोई फरमाइश करता है और माता-पिता तुरंत उसे पूरा कर देते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चे को यह आदत हो सकती है कि हर इच्छा तुरंत पूरी होनी चाहिए।

माता-पिता भी कई बार असमंजस में रहते हैं। बच्चों से कैसे बात करें, कितना समझाएं, कहां अनुशासन रखें और कहां उन्हें स्वतंत्र छोड़ें — इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं। व्यस्त जीवन और कम होते पारिवारिक संवाद ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।

मेरे विचार से समस्या का मूल केवल मोबाइल या ट्यूशन नहीं है। मूल समस्या परिवार के वातावरण में आया बदलाव है।

लेकिन अच्छी बात यह है कि अभी बहुत देर नहीं हुई है। हमें बच्चों को उनके समय से निकालकर अपने समय में वापस नहीं ले जाना है। हमें तकनीक को भी छोड़ना नहीं है और आधुनिक शिक्षा को भी नहीं। जरूरत केवल इतनी है कि आधुनिक सुविधाओं और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाया जाए।

दादा-दादी और नाना-नानी के पास बच्चों को देने के लिए केवल समय ही नहीं, बल्कि अनुभव भी है। वे बच्चों के साथ खेल सकते हैं, उनसे बातें कर सकते हैं, उन्हें अपने बचपन की कहानियां सुना सकते हैं और बिना किसी किताब के जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखा सकते हैं। सबसे बड़ी बात, वे बच्चों को यह एहसास करा सकते हैं कि उनके पास सुनने वाला कोई अपना है।

परिवार को फिर से संवाद का स्थान बनाना होगा। दिन में कुछ समय ऐसा हो जब मोबाइल दूर रखे जाएं और परिवार के लोग आमने-सामने बैठें। सप्ताह में कुछ समय बच्चों के साथ खेला जाए। उनसे उनके स्कूल, दोस्तों और उनकी छोटी-बड़ी चिंताओं के बारे में पूछा जाए।

अगर आज हम इस ओर सचेत हो जाएं, तो अगले 20–25 वर्षों में हम अपने घरों का वातावरण काफी हद तक सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।

बच्चों का भविष्य केवल अच्छी पढ़ाई, अच्छे अंक और अच्छे करियर से नहीं बनेगा। उन्हें एक ऐसा घर भी चाहिए जहां समय हो, संवाद हो, अनुशासन हो, अपनापन हो और सबसे बढ़कर — परिवार हो। शायद यही वह बदलाव है जिसकी शुरुआत हमें आज से ही करनी चाहिए।

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Monday, September 21, 2026

असली और वर्चुअल जिंदगी में बहुत अंतर है

आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां हमारे दोस्त, रिश्तेदार और परिचित केवल हमारे आसपास ही नहीं, हमारे मोबाइल फोन में भी रहते हैं। सुबह उठते ही वाट्सएप के संदेश, फेसबुक की पोस्ट और इंसाटाग्राम के अपडेट हमारा इंतजार कर रहे होते हैं। कई बार तो लगता है कि हम अकेले हैं ही नहीं — हमारे साथ हर समय सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं।

लेकिन जरा ठहरकर सोचिए — क्या सचमुच ऐसा है?

यह बात केवल युवाओं को समझने की जरूरत नहीं है। वरिष्ठ नागरिक भी कभी-कभी इस भ्रम में रहने लगते हैं कि इतने वाट्सएप ग्रुप हैं, फेसबुक पर इतने मित्र हैं और इतने लोगों से रोज बातचीत होती है, तो फिर अकेलापन कैसा?

वास्तविकता थोड़ी अलग है।

किसी व्यक्ति के फेसबुक पर हजारों या लाखों फोलोअर्स हो सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सभी उसके मित्र हैं। बल्कि यह भी जरूरी नहीं कि वे उसके हर पोस्ट को देखते हों। असली बात फोलोअर्स की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि कितने लोग वास्तव में आपकी बात पढ़ते हैं, समझते हैं और उससे जुड़ते हैं।

यही बात वरिष्ठ नागरिकों पर भी लागू होती है। हमें यह देखकर खुश नहीं होना चाहिए कि हमारे वाट्सएप में सैकड़ों कॉनटेक्ट्स हैं या हम कई ग्रुपों के सदस्य हैं। सवाल यह है कि इनमें से कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें हम जरूरत पड़ने पर फोन कर सकते हैं और जो हमारी आवाज सुनकर सचमुच खुश होंगे?

वाट्सएप बुरा नहीं है। बल्कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए तो यह बहुत उपयोगी माध्यम है। परिवार से जुड़े रहने, पुराने परिचितों से संपर्क बनाए रखने, तस्वीरें और शुभकामनाएँ भेजने और समय-समय पर बातचीत करने का यह आसान साधन है। कई बुजुर्गों के लिए यह मनोरंजन और समय बिताने का भी अच्छा माध्यम बन गया है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब वर्चुअल संबंध, वास्तविक संबंधों की जगह लेने लगते हैं।

हममें से अधिकांश ने इसका अनुभव किया होगा। वर्षों बाद कोई पुराना दोस्त अचानक सामने मिल जाए तो बातचीत शुरू होते ही जैसे समय पीछे लौट जाता है। स्कूल-कॉलेज के दिन, नौकरी के शुरुआती वर्ष, पुरानी यात्राएं, साझा मित्र, शरारतें और न जाने कितनी पुरानी बातें याद आने लगती हैं। एक बात से दूसरी बात निकलती जाती है और देखते-देखते घंटों कैसे बीत गए, पता ही नहीं चलता।

वाट्सएप पर ऐसा अनुभव कहां मिलता है? वहां हम संदेश भेजते हैं, सामने वाला पढ़ता है और कभी जवाब देता है, कभी केवल एक ईमोजी भेज देता है। बातचीत चल भी जाए तो उसमें वह गर्माहट कहां होती है जो आमने-सामने बैठकर बात करने में होती है?

एक और महत्वपूर्ण अंतर है—चेहरे के भाव और आवाज का उतार-चढ़ाव। जब हम सामने बैठकर किसी से बात करते हैं तो हमारे चेहरे के भाव, आँखों की चमक, मुस्कान, आवाज का उतार-चढ़ाव और कभी-कभी हमारी चुप्पी भी बहुत कुछ कह देती है। सामने वाला कई ऐसी बातें समझ जाता है जिन्हें हमने शब्दों में कहा ही नहीं।

इसके विपरीत, वाट्सएप पर लिखे गए एक छोटे से संदेश का अर्थ कई बार अलग-अलग निकाला जा सकता है। हम मजाक में कुछ लिखते हैं और सामने वाला उसे गंभीरता से ले लेता है। हम कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन सही शब्द नहीं मिलते। खासकर बड़ी उम्र में यह समस्या और बढ़ सकती है। सामने बैठकर हम शायद अपनी बात अधूरे शब्दों में भी कह दें और सामने वाला हमारे भाव समझ ले, लेकिन लिखे हुए संदेश में वही बात गलत अर्थ दे सकती है।

इसलिए वर्चुअल दुनिया से दूरी बनाने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसकी सीमा समझना बहुत जरूरी है।

युवा हों या वरिष्ठ नागरिक, हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों से जुड़ना अच्छी बात है, लेकिन जीवन में कुछ ऐसे लोग भी होने चाहिए जिनके साथ हम बैठ सकें, हंस सकें, अपनी परेशानी साझा कर सकें और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकें।
आखिरकार, मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे और सामने बैठा अपना इंसान एक जैसे नहीं होते।

वर्चुअल दोस्ती अपनी जगह अच्छी है, लेकिन असली दोस्ती का कोई विकल्प नहीं। इसलिए वाट्सएप चलाइए, फेसबुक देखिए, इंस्टाग्राम पर जाइए, लेकिन कभी-कभी मोबाइल एक तरफ रखकर किसी पुराने दोस्त को फोन भी कीजिए। और उससे भी बेहतर हो तो उससे मिलने जाइए।
क्योंकि जिंदगी केवल ऑनलाइन नहीं है।

कुछ रिश्ते “ऑनलाइन” जुड़े रहते हैं, लेकिन जिंदगी असल में “ऑफलाइन” ही जी जाती है।

दूसरी पारी के बाद भी किसी की जिंदगी बचा सकते हैं हम

13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस मनाया गया। हर साल यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे जाने के बाद भी हम किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी में रोशनी छोड़ सकते हैं। लेकिन अंगदान की बात आते ही एक सवाल खासकर वरिष्ठ नागरिकों के मन में आ सकता है—क्या मेरी उम्र में भी मेरे अंग किसी के काम आ सकते हैं?

इसका जवाब है — हां, उम्र अपने आप में हमेशा बाधा नहीं है।

मृत्यु के बाद अंगदान के लिए कोई निश्चित अधिकतम आयु सीमा नहीं है। मृत्यु के समय डॉक्टर यह तय करते हैं कि कौन-से अंग या ऊतक प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं। इसलिए 60, 70 या 80 वर्ष की उम्र में पहुंच जाना अपने आप में किसी व्यक्ति को अंगदान से बाहर नहीं करता।

यह बात वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हमें खुद ही यह मानकर पीछे नहीं हट जाना चाहिए कि “अब हमारे अंग किस काम के होंगे?” चिकित्सा विज्ञान केवल उम्र नहीं, बल्कि मृत्यु के समय अंगों की वास्तविक स्थिति और उनकी उपयोगिता देखता है। यहां तक कि 70 और 80 वर्ष की उम्र के लोगों की कॉर्निया जैसी ऊतक (tissue) भी किसी की दृष्टि लौटाने में उपयोगी हो सकती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंगदान के महत्व को बहुत सरल शब्दों में कहा है—

एक निर्णय आपका, कई लोगों की जिंदगी बचा सकता है, जीवन दे सकता है।

प्रधानमंत्री ने 2023 में मन की बात में झारखंड की 63 वर्षीय स्नेहलता चौधरी का उदाहरण भी दिया था। उनके अंगदान से चार लोगों को अंग मिले और दो लोगों की आंखों की रोशनी लौटाने में मदद मिली। सोचिए, 63 वर्ष की एक महिला के जाने के बाद कितने लोगों की जिंदगी आगे बढ़ी।

प्रधानमंत्री ने अंगदान की भावना को एक और खूबसूरत वाक्य में व्यक्त किया—

जीवन छोड़ते हुए भी किसी का जीवन बच जाए, यही अंगदान के पीछे की सबसे बड़ी भावना है।

यह विचार वरिष्ठ नागरिकों के लिए खास मायने रखता है।

हमने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा परिवार के लिए दिया है। बच्चों को बड़ा किया, जिम्मेदारियां निभाईं, समाज में योगदान दिया। रिटायरमेंट के बाद भी हम कहते हैं कि जिंदगी की दूसरी पारी में अभी बहुत कुछ करना बाकी है। तो क्या हमारी दूसरी पारी का योगदान हमारी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना जरूरी है?

क्रिकेट के महान खिलाड़ी अनिल कुंबले ने अंगदान को क्रिकेट की भाषा में बहुत खूबसूरती से समझाया है—
“जिस तरह टेस्ट मैच में दूसरी पारी महत्वपूर्ण होती है, उसी तरह जीवन में अंगदान भी महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति की दूसरी पारी किसी जरूरतमंद की पहली पारी को आगे बढ़ा सकती है।”

यानी एक व्यक्ति की दूसरी पारी किसी जरूरतमंद व्यक्ति की पहली पारी को आगे बढ़ा सकती है।

लेकिन अंगदान का निर्णय केवल भावुक होकर नहीं लेना चाहिए। इसके साथ कई मानसिक और पारिवारिक सवाल जुड़े होते हैं।

कुछ वरिष्ठ नागरिकों को मृत्यु के बाद अपने शरीर के बारे में सोचने में ही असहजता महसूस हो सकती है। कुछ को धार्मिक या सामाजिक संकोच हो सकता है। किसी को यह डर हो सकता है कि यदि डॉक्टरों को पता है कि वह अंगदाता है तो कहीं उसके इलाज में कोई कमी न रह जाए। और कई बार परिवार भी इस निर्णय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता।

इन आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अंगदान स्वैच्छिक और पूरी जानकारी के बाद लिया गया व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए। किसी वरिष्ठ नागरिक पर परिवार, समाज या किसी संस्था का दबाव नहीं होना चाहिए।

लेकिन यदि आपने अंगदान का निर्णय लिया है तो एक काम जरूर कीजिए—अपने परिवार को बताइए।

सिर्फ पंजीकरण कराना पर्याप्त नहीं है। अपने बच्चों और निकट संबंधियों से खुलकर बात कीजिए और उन्हें अपनी इच्छा बताइए। मृत्यु के समय परिवार पहले ही भावनात्मक संकट में होता है। यदि उन्हें आपकी इच्छा पहले से पता होगी तो उस कठिन समय में निर्णय लेना उनके लिए आसान होगा।

यह भी समझना जरूरी है कि जीवित रहते हुए अंगदान और मृत्यु के बाद अंगदान अलग-अलग हैं। जीवित अंगदान में अलग चिकित्सा और कानूनी नियम लागू होते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले अधिकृत चिकित्सा संस्थान या NOTTO से सही जानकारी लेना चाहिए।

हम वरिष्ठ नागरिकों से हमेशा कहते हैं—नेवर से रिटायर्ड। रिटायरमेंट का अर्थ योगदान का अंत नहीं है। जीवन की दूसरी पारी में भी समाज के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। अंगदान शायद योगदान की सबसे अंतिम और सबसे अनोखी मिसाल है।

हमारी आंखें किसी को दुनिया दिखा सकती हैं। हमारा कोई अंग किसी दूसरे व्यक्ति को जिंदगी की नई शुरुआत दे सकता है। हमारे जाने के बाद भी किसी मां का बच्चा जीवित रह सकता है, किसी बच्चे को उसके पिता वापस मिल सकते हैं, किसी युवा को जीवन की दूसरी शुरुआत मिल सकती है।

इसलिए अंगदान को केवल मृत्यु के बारे में सोचने के रूप में न देखें। इसे जीवन को आगे बढ़ाने के संकल्प के रूप में देखें।

हमारी दूसरी पारी कब समाप्त होगी, यह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन उसके बाद भी किसी की पहली पारी शुरू हो सके—यह फैसला शायद हमारे हाथ में है।