We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Wednesday, October 07, 2026

विलुप्त होता परिवार

पिछले दिनों व्हाट्सऐप पर केवल 35 सेकंड का एक वीडियो मिला। समय इतना कम कि शायद उसे देखने में भी हमने ज्यादा नहीं सोचा होगा — लेकिन वीडियो समाप्त होने के बाद एक सवाल मन में अटक गया। पांच तस्वीरें थीं। पहली में एक भरा-पूरा, हंसता-खेलता परिवार था — वैसा परिवार जिसकी तस्वीर कभी हमारे अपने घर की दीवार पर भी हुआ करती थी। हर अगली तस्वीर में चेहरे कम होते गये। और पांचवीं तस्वीर तक आते-आते घर में केवल पति-पत्नी रह गए। 35 सेकंड की यह कहानी शायद किसी एक परिवार की नहीं थी; यह हमारे बदलते समाज का आईना थी।

हमने अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दी। वे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी के योग्य बने। उनकी तनख्वाह भी ऐसी, जिसे हम सफलता का प्रतीक मानते हैं। फिर उनका विवाह हुआ और उनके जीवनसाथी भी अच्छी नौकरी में हैं। दोनों मिलकर कमाते हैं, फिर भी आज की परिस्थितियों में दो या तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाना उन्हें कठिन लगता है।

तब मन में एक सहज प्रश्न उठता है — जिस अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी और अच्छी आय के लिए हमने इतनी मेहनत की, यदि उसी के बावजूद परिवार बढ़ाना संभव नहीं रह गया, तो आखिर उस आर्थिक सफलता का उद्देश्य क्या रह जाता है?

हम वरिष्ठ लोगों को अपने बचपन के दिन याद आते हैं। हमारे दादा-दादी पूरे परिवार के साथ रहते थे। पांच-सात भाई-बहन होना कोई असाधारण बात नहीं थी। घर में चहल-पहल रहती थी। काम बंटा हुआ था। घर का बना भोजन मिलता था और उसमें केवल स्वाद ही नहीं, अपनापन भी होता था। परिवार बड़ा था, लेकिन शायद जिम्मेदारियां भी उसी अनुपात में बांटी हुई थीं। अधिकांश बच्चे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ते थे और आगे चलकर अपनी जीविका कमाने में सक्षम हो जाते थे।

लेकिन केवल अतीत को याद करके वर्तमान को नहीं समझा जा सकता। समय बदल चुका है। आज शिक्षा महंगी है, आवास महंगा है, बच्चों की परवरिश महंगी है और नौकरी तथा जीवन की अनिश्चितताएं भी पहले से अलग हैं।

चलिए, भविष्य की कल्पना भी करें।

हमारे पोते-पोतियां जब 70 वर्ष के होंगे, तब दुनिया कैसी होगी, यह हम शायद कभी जान नहीं पाएंगे। तब तक हम इस दुनिया में होंगे भी नहीं। लेकिन आज जो दिखाई दे रहा है, उससे एक बात पर विचार करना आवश्यक है — यदि परिवार लगातार छोटे होते गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप कैसा होगा?

एक मध्यमवर्गीय परिवार का उदाहरण लें। पति-पत्नी और उनके दो बच्चे — एक बेटा और एक बेटी। बच्चे बड़े हुए और वे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए। लगभग 65 वर्ष की आयु में पति का निधन हो गया और पत्नी अकेली रह गईं। दुर्भाग्य से कुछ समय बाद बेटे का भी बीमारी के कारण कम उम्र में निधन हो गया। बेटी अपने वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों के कारण अपनी मां के साथ रहने लगी। अंततः मां के निधन के बाद उस परिवार की वह पीढ़ी वहीं समाप्त हो गई।

एक अन्य परिचित परिवार में दो बेटे थे। दोनों ने बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त की, योग्य बने और अमेरिका में अच्छी नौकरियां प्राप्त कीं। वे भारत लौटे, यहीं की लड़कियों से विवाह किया और फिर अमेरिका चले गए। जीवन आगे बढ़ता गया। बच्चे हुए, करियर बना, परिवार बढ़े — लेकिन दूसरी ओर माता-पिता बूढ़े होते गए।

बुढ़ापे में जब माता-पिता को सबसे अधिक साथ और सहारे की आवश्यकता होती है, तब वे हजारों किलोमीटर दूर अपने बच्चों की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। और जब पति-पत्नी में से किसी एक का निधन हो जाता है, तब अकेलेपन का भार और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वृद्धाश्रम कई बार एक व्यावहारिक सहारा बन जाता है — भले ही भावनात्मक रूप से वह उस कमी को पूरा न कर सके जिसकी आवश्यकता उस समय सबसे अधिक होती है।

यह किसी व्यक्ति, किसी पीढ़ी या किसी व्यवस्था को दोष देने का विषय नहीं है। समाज बदल रहा है और परिवार भी उसके साथ बदल रहे हैं। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और अब कभी-कभी केवल दंपति तक सीमित परिवार — यह परिवर्तन हमारे सामने है।

शायद हमें यह स्वीकार करना होगा कि समय को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। संयुक्त परिवार लौटेंगे या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं है। परिवार छोटे हो रहे हैं और आगे भी छोटे होते जाएंगे। बच्चे दूर शहरों और देशों में बसेंगे। एक समय ऐसा भी आ सकता है जब एक परिवार में भाई-बहन का रिश्ता ही बहुत कम दिखाई दे, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों से मिलना तो दूर की बात होगी।

यह केवल भावनात्मक चिंता नहीं है। परिवार हमारे सामाजिक जीवन की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण संस्था रहा है। यदि परिवार का आकार लगातार घटता गया, तो इन जिम्मेदारियों को निभाने का तरीका भी बदलना पड़ेगा।

सवाल यह नहीं है कि परिवार क्यों छोटे हो रहे हैं — इसके पीछे आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत अनेक कारण हैं। असली सवाल यह है कि यदि परिवार इसी तरह छोटा होता गया, तो आने वाली पीढ़ियों में परिवार का स्वरूप क्या रह जाएगा?

A video based on this article has been posted on Never Say Retired YouTube channel. The link is https://www.youtube.com/watch?v=hn7Bv3CjINQ

The English version of this article, titled The Vanishing Family, has been posted on our website and the link is
https://neversayretired.in/the-vanishing-family/

Monday, September 28, 2026

एक छोटी सी लापरवाही, बड़ी परेशानी

आज एक बार फिर मैं पैरों की देखभाल और गिरने से बचने के बारे में लिख रहा हूं। मैंने इस विषय पर पहले भी कई बार लिखा है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसे बार-बार याद दिलाना जरूरी है। आखिरकार, एक छोटी सी चूक हमें लंबे समय के लिए बिस्तर पर पहुंचा सकती है।

आजकल हमारे वाट्सएप समूहों में भी ऐसे अनेक वीडियो और संदेश आते रहते हैं, जिनमें बुजुर्गों को चलते समय, सीढ़ियां चढ़ते-उतरते समय और खासकर बाथरूम का उपयोग करते समय बेहद सावधान रहने की सलाह दी जाती है।

कई बार इसका कारण कोई बड़ी गलती नहीं होती। बस थोड़ा सा अति-आत्मविश्वास, चलते समय ध्यान का कहीं और होना या यह सोचना कि “मैं तो रोज यहां से चलता हूं, मुझे क्या होगा?” और फिर वही होता है जिसका हमें डर भी नहीं था।

मेरे कुछ बहुत करीबी मित्रों के उदाहरण हमारे सामने हैं।

एक मित्र अपने ही बेडरूम से लगे बाथरूम में जा रहे थे। बाथरूम के दरवाजे पर एक छोटी सी चटाई रखी थी। पैर उस पर पड़ा, पैर उलझा और वे गिर गए। हम दिन में कई बार अपने बाथरूम का इस्तेमाल करते हैं और हमें लगता है कि हम उस जगह से पूरी तरह परिचित हैं। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ हम पहले की तरह पैर ऊपर नहीं उठा पाते। हमारी चाल में थोड़ा बदलाव आता है और यही छोटी सी बात कभी-कभी बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाती है।

एक दूसरे मित्र अपनी पत्नी को किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के लिए अस्पताल ले जा रहे थे। पत्नी को कार में बैठाने में उनकी मदद करते समय उनका अपना पैर सड़क की असमतल सतह पर पड़ा और वे गिर गए। सड़क और फुटपाथ हमारे लिए रोजमर्रा की जरूरत हैं, लेकिन उनकी असमान सतह, गड्ढे, टूटे हुए हिस्से या अचानक ऊंचा-नीचा होना हमारे लिए खतरा बन सकते हैं। उम्र बढ़ने पर हमें इन चीजों के प्रति पहले से अधिक सजग रहना होगा।

एक और मित्र की घटना तो और भी सीख देने वाली है। उन्होंने अपने पति को गिरते हुए देखा और तुरंत उनकी मदद करने के लिए दौड़ीं। जल्दबाजी में उनका अपना संतुलन बिगड़ा और वे भी गिर गईं। उनके कंधे में हेयरलाइन फ्रैक्चर हो गया। कई सप्ताह तक हाथ स्लिंग में रहा और दर्द लंबे समय तक बना रहा।

ये कोई असाधारण घटनाएं नहीं हैं। हममें से लगभग हर व्यक्ति ऐसे कई उदाहरण अपने परिवार, रिश्तेदारों या मित्रों के बीच देख चुका होगा। दुखद बात यह है कि इन घटनाओं को सुनने के बाद भी कभी-कभी हम स्वयं उसी गलती को दोहरा देते हैं और दूसरों के लिए एक उदाहरण बन जाते हैं।

तो आखिर हम क्या कर सकते हैं?

सबसे पहली बात, चलते समय हमारा पूरा ध्यान चलने पर होना चाहिए। मोबाइल फोन देखते हुए, संदेश पढ़ते हुए या बातचीत में इतना खोकर नहीं चलना चाहिए कि सामने का रास्ता ही दिखाई न दे। मोबाइल कुछ मिनट बाद भी देखा जा सकता है, लेकिन गिरने के बाद होने वाली परेशानी कई सप्ताह या कई महीने चल सकती है।

  1. जहां संभव हो, असमतल सड़क और टूटे-फूटे फुटपाथ से बचें। सुबह की सैर के लिए पार्क या ऐसी जगह चुनें जहां रास्ता समतल और सुरक्षित हो। तेज चलने से ज्यादा महत्वपूर्ण सुरक्षित चलना है।
  2. बाथरूम पर विशेष ध्यान दें। फिसलन वाली सतह, ढीली चटाई, अनावश्यक सामान या खराब रोशनी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। बाथरूम में पकड़ने के लिए हैंडल लगवाएं और फर्श को सूखा रखें। विषेश ध्यान दें कि कपड़े बाथरूप के बाहर आकर बहुत संभल कर पहने।
  3. जरूरत पड़ने पर छड़ी या किसी साथी की मदद लेने में बिल्कुल संकोच न करें। छड़ी का इस्तेमाल कमजोरी का संकेत नहीं है। बल्कि समय पर सहारा लेना समझदारी है।
  4. एक और महत्वपूर्ण बात है — अति-आत्मविश्वास से बचें। हममें से बहुत से लोग कहते हैं, “मैं तो अभी बिल्कुल ठीक हूं, मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं।” हो सकता है आप बिल्कुल ठीक हों, लेकिन उम्र के साथ हमारा संतुलन, प्रतिक्रिया की गति और शरीर पर नियंत्रण पहले जैसा नहीं रहता। इसे स्वीकार करना जरूरी है।
  5. मानसिक रूप से सक्रिय रहना भी मददगार हो सकता है। पहेलियां हल करना, मानसिक खेल खेलना, पढ़ना और ऐसी गतिविधियां करना जिनमें ध्यान और एकाग्रता की जरूरत हो, हमारे दिमाग को सक्रिय रखने में सहायक हो सकता है। शरीर और दिमाग दोनों को सक्रिय रखना हमारी दूसरी पारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

और अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात — गिरने से बचना केवल बुजुर्ग की जिम्मेदारी नहीं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। घर में रहने वाले सभी लोगों को यह देखना चाहिए कि रास्ते में अनावश्यक सामान न हो, कालीन या चटाइयां फिसलने वाली न हों, रोशनी पर्याप्त हो और बाथरूम सुरक्षित हो।

हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ हमारी सक्रियता कम न हो। हमें चलते रहना है, घूमना है, लोगों से मिलना है और अपनी पसंद के काम करते रहना है। लेकिन इसके लिए अपने पैरों और अपने संतुलन की सुरक्षा को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।

याद रखिए — एक छोटी सी सावधानी हमें लंबे समय तक सक्रिय रख सकती है, जबकि एक छोटी सी लापरवाही हमारी पूरी दिनचर्या बदल सकती है।

This article in English posted on website: The link is
https://neversayretired.in/a-small-carelessness-can-cause-big-trouble/

Wednesday, September 23, 2026

सच्ची खुशी पाने के कुछ मंत्र

मैं आज के अपने लेख में आपको कोई नई बात बताने नहीं जा रहा हूं। हां, एक बार फिर यह प्रयास जरूर रहेगा कि हम सब अपने जीवन के इस पड़ाव पर खुशी बटोरने के अधिक से अधिक अवसर तलाशते रहें।

जिन बातों की आज हम चर्चा करेंगे, उन्हें मैं अपने पिछले लेखों में कई बार उजागर कर चुका हूं। आप सब इतने अनुभवी हैं कि शायद इन विषयों पर मुझे ही बहुत कुछ सिखा सकते हैं। फिर भी मुझे इन्हीं बातों को दुबारा-तिबारा लिखने में कोई झिझक नहीं है। आखिर जिंदगी में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें जानना ही नहीं, बल्कि बार-बार याद करना भी जरूरी होता है।

सबसे पहला मंत्र तो वही पुराना है — अपने रिश्तों को मधुर बनाए रखें। ये रिश्ते दोस्तों के साथ हों या परिवार के साथ। उम्र बढ़ने के साथ इन रिश्तों की बहुमूल्यता शायद पहले से कहीं ज्यादा समझ में आने लगती है।

समय के साथ हम एक-एक करके अपने मित्रों को खोते जाते हैं। परिवार के बड़े भी धीरे-धीरे हमसे विदा लेते जाते हैं। ऐसे में हमारे पास जो रिश्ते बचे हैं, वही हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। इसलिए मन में कोई नाराजगी हो तो उसे बहुत लंबे समय तक न पालें। किसी से बात करनी हो तो आज ही कर लें। किसी को धन्यवाद देना हो तो आज ही दें। और किसी से माफी मांगनी हो तो उसमें भी देर न करें।

अकेलापन शायद जिंदगी के अंतिम वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती है। आजकल तो कुछ प्रोफेशनल सेवाएं भी उपलब्ध हैं। कई स्टार्टअप ऐसे हैं जो जरूरत पड़ने पर किसी व्यक्ति को आपके साथ समय बिताने के लिए उपलब्ध कराते हैं — आपसे बातचीत करने, बाहर टहलने, मंदिर या मॉल जाने तक में साथ देने के लिए। उनका शुल्क अक्सर घंटे के हिसाब से तय होता है। यह बदलते समय की जरूरत का संकेत है। लेकिन पैसे देकर मिलने वाली संगत और अपनेपन से मिलने वाले रिश्तों में फर्क तो रहेगा ही। इसलिए अपने रिश्तों को अभी से मजबूत बनाना जरूरी है।

दूसरा महत्वपूर्ण मंत्र है — अपनी स्थिति को स्वीकार करना।

हर दिन हम थोड़े और उम्रदराज हो रहे हैं। भगवान ने जिंदगी की रचना ही ऐसी की है। इसलिए बढ़ती उम्र से मन ही मन लड़ते रहना कोई समझदारी नहीं है। हम हमेशा जवान नहीं रह सकते। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि उम्र बढ़ने के साथ जिंदगी का आनंद समाप्त हो जाए।

सही जीवनशैली, संतुलित खान-पान, नियमित व्यायाम और सकारात्मक सोच के सहारे हम अपने स्वस्थ और सक्रिय वर्षों को काफी आगे तक ले जा सकते हैं। यही हमारे गोल्डन इयर्स को वास्तव में सुनहरा बना सकता है।

लाइफस्टाइल की बात करें तो रोज व्यायाम करना, योगाभ्यास करना और कुछ समय वॉक के लिए निकालना बहुत जरूरी है। इसके लिए किसी बहुत कठिन कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं। अपनी क्षमता और उम्र के अनुसार नियमित रूप से कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि करते रहना ही काफी महत्वपूर्ण है। शरीर को सक्रिय रखेंगे तो मन भी अधिक सक्रिय और प्रसन्न रहेगा।

इसी तरह खान-पान पर भी अब विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जवानी में हमने स्वाद के पीछे भागते हुए बहुत कुछ बिना सोचे-समझे खाया होगा। ज्यादा मसालेदार खाना, मिठाइयाँ और ऐसी कई चीजें जिनका आनंद उस समय तो खूब लिया, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर उन्हें उसी तरह स्वीकार नहीं करता।

अब स्वाद से ज्यादा स्वास्थ्य को महत्व देना होगा। पेट की जलन और एसिडिटी आज बहुत आम समस्या बन गई है और कई लोगों को इसकी दवाएं नियमित लेनी पड़ती हैं। डायबिटीज भी बहुत सामान्य हो गई है। इसमें थोड़ी सी लापरवाही आगे चलकर शरीर के कई अंगों पर असर डाल सकती है। इसलिए उम्र के इस पड़ाव पर संयम कोई सजा नहीं, बल्कि स्वस्थ और खुशहाल जीवन की कीमत है।

लेकिन खुशी केवल अच्छे स्वास्थ्य से नहीं मिलती। खुश रहने के लिए खुद को व्यस्त और उपयोगी बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। रिटायरमेंट का अर्थ काम से विदाई हो सकता है, जिंदगी से नहीं। अपनी रुचि का कोई काम चुनिए — पढ़िए, लिखिए, संगीत सुनिए, बागवानी कीजिए, यात्रा कीजिए, किसी सामाजिक संस्था से जुड़िए या किसी जरूरतमंद की मदद कीजिए।

और सबसे महत्वपूर्ण — अपनी खुशी को दूसरों पर निर्भर मत कीजिए। बच्चे अपने जीवन में व्यस्त होंगे, मित्र हमेशा उपलब्ध नहीं होंगे और परिस्थितियाँ हमेशा हमारे मन मुताबिक नहीं होंगी। इसलिए छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढने की आदत डालिए।

सुबह की सैर, किसी पुराने मित्र का फोन, परिवार के साथ बैठकर चाय पीना, किसी बच्चे को कुछ सिखाना, किसी की मदद करना या दिन के अंत में यह महसूस करना कि आज का दिन बेकार नहीं गया — ये छोटी बातें ही मिलकर बड़ी खुशी बनाती हैं।

आखिरकार, खुश रहने का सबसे बड़ा मंत्र शायद यही है — जो हमारे पास है, उसकी कद्र करें; जो नहीं है, उसके लिए लगातार दुखी न रहें; और जो समय हमारे पास बचा है, उसे शिकायत में नहीं, मुस्कुराहट में बिताएं।

लक्ष्य हो तो सुनहरी उम्र भी बनेगी खुशहाल

पिछले दिनों मुझे स्वामी गिरीशानंद सरस्वती जी महाराज के पांच दिवसीय श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय पर उनके ओजस्वी प्रवचन सुनने का सौभाग्य मिला। प्रतिदिन वे ऐसे अनेक प्रसंग सुनाते थे, जो दिल और दिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाते थे।

एक दिन उन्होंने कहा कि अपनी जिंदगी को सही मायने में जीने के लिए जीवन में एक लक्ष्य लेकर चलना चाहिए। उन्होंने यह बात सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए कही थी। लेकिन उनके इस विचार ने मुझे विशेष रूप से वरिष्ठजनों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या यह बात हमारे लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है?

हममें से अधिकांश लोग जीवन के चार-पांच दशक किसी न किसी काम में लगा देते हैं। नौकरी, व्यवसाय, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियां — इन सबके बीच हमारा जीवन एक निश्चित दिशा में चलता रहता है। फिर एक दिन हम उस काम से अवकाश ले लेते हैं। नौकरी समाप्त हो जाती है, पद और जिम्मेदारियां पीछे छूट जाती हैं और हम अपने जीवन के एक नए पड़ाव में प्रवेश करते हैं।

लेकिन एक बात नहीं बदलती — जिंदगी चलती रहती है।

सेवानिवृत्ति का अर्थ काम से अवकाश हो सकता है, जिंदगी से नहीं। उम्र के इस पड़ाव पर भी हमारे सामने कई वर्ष हो सकते हैं। फिर क्यों न उन वर्षों को किसी उद्देश्य, किसी लक्ष्य और किसी उत्साह के साथ जिया जाए?

आखिर हममें से कौन चाहता है कि जीवन केवल दिन गिनते हुए बीते? सुबह उठना, नाश्ता करना, अखबार पढ़ना, टीवी देखना, खाना और फिर सो जाना—और अगले दिन यही क्रम दोहराना। यदि जीवन केवल इसी दिनचर्या तक सीमित हो जाए और हम किसी अंतिम पड़ाव की प्रतीक्षा ही करते रहें, तो इसमें जीवन की खुशी कहां रह जाएगी?

कदापि नहीं। हमें लक्ष्य बनाना होगा।

यह लक्ष्य बहुत बड़ा हो, यह जरूरी नहीं। न ही इसका संबंध पैसे या पद से होना चाहिए। लक्ष्य कुछ भी हो सकता है — समाज सेवा करना, बच्चों को पढ़ाना, किसी युवा को मेंटर करना, किसी संस्था के साथ जुड़ना या घर की कोई ऐसी जिम्मेदारी अपने हाथ में लेना जिसे अब तक कोई और संभालता रहा हो।

और लक्ष्य हमेशा गंभीर ही हो, ऐसा भी जरूरी नहीं।

किसी को संगीत पसंद है तो वह तय कर सकता है कि अगले छह महीने में वह गाना सीखकर इतना अच्छा गाएगा कि किसी छोटे मंच पर अपनी कला प्रस्तुत कर सके। फिर वह रोज रियाज करेगा, किसी शिक्षक से सीखेगा, संगीत सुनेगा और अपनी प्रगति को देखेगा। देखते ही देखते उसके दिन में एक नई व्यस्तता आ जाएगी। और यह व्यस्तता बोझ नहीं होगी, बल्कि खुशी देगी।

यही लक्ष्य हमारे शरीर और मन दोनों के लिए अच्छा है। जब हमें किसी काम को पूरा करने की उत्सुकता होती है तो हम सक्रिय रहते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, कुछ नया सीखते हैं, घर से बाहर निकलते हैं और अपने स्वास्थ्य पर भी अधिक ध्यान देने लगते हैं।

एक मोटिवेशनल स्पीकर को सुनते हुए मैंने एक बहुत साधारण लेकिन प्रभावी बात सुनी। उन्होंने कहा कि जब आप सुबह उठें और आपके मन में यह स्पष्ट हो कि “आज मुझे यह काम पूरा करना है,” तो आपका दिन अपने आप बेहतर हो जाता है। आपके पास करने के लिए कुछ है, इसलिए आप सक्रिय रहते हैं। इसीलिए केवल जीवन का कोई बड़ा लक्ष्य ही नहीं, बल्कि हर दिन का भी एक लक्ष्य होना चाहिए।

मेरे परिचित एक सज्जन करीब सत्तर वर्ष के हुए तो उन्होंने अपने लिए एक अनोखा लक्ष्य बनाया। वे वर्षों से प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते थे, लेकिन उन्हें लगा कि वे उसके अर्थ को पूरी तरह नहीं समझते। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे हनुमान चालीसा को गहराई से समझेंगे।

उन्होंने इस विषय पर मिलने वाली पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं। जहां कहीं हनुमानजी की कथा या व्याख्यान होता, वहां जाने का प्रयास करते। इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से भी उन्होंने अध्ययन किया। धीरे-धीरे उनका ज्ञान बढ़ता गया। कुछ वर्षों में वे इस विषय के इतने जानकार हो गए कि अब दूसरे लोग उनसे हनुमान चालीसा का अर्थ और उसकी गहराई सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं।

सोचिए, यदि उन्होंने उस उम्र में यह कहकर छोड़ दिया होता कि “अब मेरी उम्र सीखने की नहीं है,” तो वे इस आनंद से वंचित रह जाते।

यही सोच हमें भी बदलनी होगी। लक्ष्य तय करने की उम्र समाप्त नहीं होती। बल्कि वरिष्ठावस्था में लक्ष्य का महत्व और बढ़ जाता है। जीवन के इस पड़ाव पर हमारे पास अनुभव है, समय है और अपनी पसंद के काम करने की स्वतंत्रता भी अपेक्षाकृत अधिक है।

इसलिए उम्र को लक्ष्य बनाने में बाधा न बनने दें। कोई नया हुनर सीखिए, कुछ पढ़िए, किसी को सिखाइए, समाज के लिए कुछ कीजिए, कोई पुराना सपना पूरा कीजिए या रोज अपने लिए कोई छोटा-सा लक्ष्य तय कीजिए।

जीवन की दूसरी पारी का सबसे बड़ा सुख यही है कि अब हमें किसी और के लक्ष्य पूरे नहीं करने हैं। अब हम अपने लक्ष्य चुन सकते हैं।

और जब जीवन में लक्ष्य रहेगा, तो हर सुबह नई उम्मीद लेकर आएगी, हर दिन कुछ करने की प्रेरणा देगा और हमारी सुनहरी उम्र केवल लंबी नहीं, बल्कि सार्थक, सक्रिय और खुशहाल भी बनेगी।

Till now my 125 articles have been published. All are available in Hindi and English on our website www.neversayretired.in
60 selected articles have been compiled in a book titled "Never Say Retired 60 Not Out", which is available through our website or Amazon.

बदलता घर, बदलता बचपन

अगर आप उन किस्मत वालों में से एक हैं, जो सत्तर वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, तो थोड़ा दिमाग पर जोर देते हुए याद करने का प्रयास कीजिए कि जब आप स्कूल और कॉलेज में पढ़ते थे, तब आपके घर का वातावरण कैसा रहता था। अब उसी वातावरण की तुलना आज के घर से कीजिए, जहां आपके पोते-पोतियां पढ़ाई कर रहे हैं।

हमारे समय में स्कूल से घर लौटने के बाद पढ़ाई जरूर होती थी, लेकिन उसके बाद घर से बाहर निकलकर दोस्तों के साथ खेलना भी हमारी दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा था। गली-मोहल्ले के बच्चे साथ होते थे। खेल के नियम भी हम खुद बनाते थे और झगड़े भी खुद ही सुलझा लेते थे। हारना, जीतना, अपनी बारी का इंतजार करना, दूसरे की बात मानना और कभी-कभी अपनी गलती स्वीकार करना — ये सब जीवन के ऐसे पाठ थे, जो हमें किसी किताब में नहीं पढ़ाए गए।

आज के बच्चों के पास शायद खेलने के लिए समय ही नहीं है। स्कूल से लौटे नहीं कि असाइनमेंट, प्रोजेक्ट और पढ़ाई का दबाव शुरू हो जाता है। इसके बाद म्यूजिक क्लास, डांस, कराटे, स्विमिंग, अबेकस और न जाने कितनी दूसरी गतिविधियां। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा हर क्षेत्र में आगे रहे। वे अपने बच्चे को भविष्य की प्रतियोगिता के लिए तैयार करना चाहते हैं।

लेकिन कभी-कभी यह विचार जरूर आता है कि आखिर हम अपने बच्चों को बनाना क्या चाहते हैं — एक सफल इंसान या एक खुशहाल इंसान?

हमारे समय का एक और बड़ा अंतर परिवार की संरचना का था। हममें से बहुतों के घरों में भाई-बहनों के अलावा चाचा-ताऊ के बच्चे भी आसपास रहते थे। संयुक्त परिवारों में बच्चों की संख्या ज्यादा होती थी। घर में हमेशा किसी न किसी हमउम्र के साथ खेलने और बातचीत करने का अवसर रहता था। आज एकल परिवार सामान्य बात है और कई परिवारों में एक ही बच्चा है।

एक और बात पर ध्यान दीजिए। जब हम पढ़ते थे, तो कितने बच्चों के पास अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग ट्यूशन शिक्षक होते थे? हमारे माता-पिता में से कितने लोग हर विषय के लिए विशेष कोचिंग का खर्च उठा सकते थे? अधिकांश बच्चे स्कूल में जो पढ़ाया जाता था, उसी पर निर्भर रहते थे। जरूरत पड़ने पर किसी बड़े भाई, बहन, पड़ोसी या घर के किसी सदस्य से मदद ले लेते थे।

आज शिक्षा के अवसर निश्चित रूप से बढ़े हैं। तकनीक ने ज्ञान को हमारे घर तक पहुंचा दिया है। लेकिन इसी तकनीक ने घर के वातावरण को भी बदल दिया है।

मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट और इंटरनेट आज लगभग हर घर का हिस्सा हैं। बच्चे इन उपकरणों में व्यस्त हैं तो माता-पिता भी उनसे अछूते नहीं हैं। कभी काम के लिए, कभी सोशल मीडिया के लिए और कभी मनोरंजन के लिए — परिवार के सदस्यों का ध्यान अक्सर एक ही कमरे में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन पर रहता है।

फिर वह समय कब मिलता है जब दादा-दादी, माता-पिता और बच्चे बैठकर आपस में बात करें? कब बच्चे घर के बड़ों से अपने सवाल पूछें? कब उन्हें बातों-बातों में जीवन के छोटे-छोटे अनुभव और जीवन कौशल सीखने का अवसर मिले?

शायद यही एक कारण है कि आज बच्चों में चिड़चिड़ापन और अधीरता कुछ अधिक दिखाई देती है। इसमें बच्चों का दोष कितना है, यह सोचने की जरूरत है। जब बच्चा कोई फरमाइश करता है और माता-पिता तुरंत उसे पूरा कर देते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चे को यह आदत हो सकती है कि हर इच्छा तुरंत पूरी होनी चाहिए।

माता-पिता भी कई बार असमंजस में रहते हैं। बच्चों से कैसे बात करें, कितना समझाएं, कहां अनुशासन रखें और कहां उन्हें स्वतंत्र छोड़ें — इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं। व्यस्त जीवन और कम होते पारिवारिक संवाद ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।

मेरे विचार से समस्या का मूल केवल मोबाइल या ट्यूशन नहीं है। मूल समस्या परिवार के वातावरण में आया बदलाव है।

लेकिन अच्छी बात यह है कि अभी बहुत देर नहीं हुई है। हमें बच्चों को उनके समय से निकालकर अपने समय में वापस नहीं ले जाना है। हमें तकनीक को भी छोड़ना नहीं है और आधुनिक शिक्षा को भी नहीं। जरूरत केवल इतनी है कि आधुनिक सुविधाओं और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाया जाए।

दादा-दादी और नाना-नानी के पास बच्चों को देने के लिए केवल समय ही नहीं, बल्कि अनुभव भी है। वे बच्चों के साथ खेल सकते हैं, उनसे बातें कर सकते हैं, उन्हें अपने बचपन की कहानियां सुना सकते हैं और बिना किसी किताब के जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखा सकते हैं। सबसे बड़ी बात, वे बच्चों को यह एहसास करा सकते हैं कि उनके पास सुनने वाला कोई अपना है।

परिवार को फिर से संवाद का स्थान बनाना होगा। दिन में कुछ समय ऐसा हो जब मोबाइल दूर रखे जाएं और परिवार के लोग आमने-सामने बैठें। सप्ताह में कुछ समय बच्चों के साथ खेला जाए। उनसे उनके स्कूल, दोस्तों और उनकी छोटी-बड़ी चिंताओं के बारे में पूछा जाए।

अगर आज हम इस ओर सचेत हो जाएं, तो अगले 20–25 वर्षों में हम अपने घरों का वातावरण काफी हद तक सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।

बच्चों का भविष्य केवल अच्छी पढ़ाई, अच्छे अंक और अच्छे करियर से नहीं बनेगा। उन्हें एक ऐसा घर भी चाहिए जहां समय हो, संवाद हो, अनुशासन हो, अपनापन हो और सबसे बढ़कर — परिवार हो। शायद यही वह बदलाव है जिसकी शुरुआत हमें आज से ही करनी चाहिए।

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Monday, September 21, 2026

असली और वर्चुअल जिंदगी में बहुत अंतर है

आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां हमारे दोस्त, रिश्तेदार और परिचित केवल हमारे आसपास ही नहीं, हमारे मोबाइल फोन में भी रहते हैं। सुबह उठते ही वाट्सएप के संदेश, फेसबुक की पोस्ट और इंसाटाग्राम के अपडेट हमारा इंतजार कर रहे होते हैं। कई बार तो लगता है कि हम अकेले हैं ही नहीं — हमारे साथ हर समय सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं।

लेकिन जरा ठहरकर सोचिए — क्या सचमुच ऐसा है?

यह बात केवल युवाओं को समझने की जरूरत नहीं है। वरिष्ठ नागरिक भी कभी-कभी इस भ्रम में रहने लगते हैं कि इतने वाट्सएप ग्रुप हैं, फेसबुक पर इतने मित्र हैं और इतने लोगों से रोज बातचीत होती है, तो फिर अकेलापन कैसा?

वास्तविकता थोड़ी अलग है।

किसी व्यक्ति के फेसबुक पर हजारों या लाखों फोलोअर्स हो सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सभी उसके मित्र हैं। बल्कि यह भी जरूरी नहीं कि वे उसके हर पोस्ट को देखते हों। असली बात फोलोअर्स की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि कितने लोग वास्तव में आपकी बात पढ़ते हैं, समझते हैं और उससे जुड़ते हैं।

यही बात वरिष्ठ नागरिकों पर भी लागू होती है। हमें यह देखकर खुश नहीं होना चाहिए कि हमारे वाट्सएप में सैकड़ों कॉनटेक्ट्स हैं या हम कई ग्रुपों के सदस्य हैं। सवाल यह है कि इनमें से कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें हम जरूरत पड़ने पर फोन कर सकते हैं और जो हमारी आवाज सुनकर सचमुच खुश होंगे?

वाट्सएप बुरा नहीं है। बल्कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए तो यह बहुत उपयोगी माध्यम है। परिवार से जुड़े रहने, पुराने परिचितों से संपर्क बनाए रखने, तस्वीरें और शुभकामनाएँ भेजने और समय-समय पर बातचीत करने का यह आसान साधन है। कई बुजुर्गों के लिए यह मनोरंजन और समय बिताने का भी अच्छा माध्यम बन गया है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब वर्चुअल संबंध, वास्तविक संबंधों की जगह लेने लगते हैं।

हममें से अधिकांश ने इसका अनुभव किया होगा। वर्षों बाद कोई पुराना दोस्त अचानक सामने मिल जाए तो बातचीत शुरू होते ही जैसे समय पीछे लौट जाता है। स्कूल-कॉलेज के दिन, नौकरी के शुरुआती वर्ष, पुरानी यात्राएं, साझा मित्र, शरारतें और न जाने कितनी पुरानी बातें याद आने लगती हैं। एक बात से दूसरी बात निकलती जाती है और देखते-देखते घंटों कैसे बीत गए, पता ही नहीं चलता।

वाट्सएप पर ऐसा अनुभव कहां मिलता है? वहां हम संदेश भेजते हैं, सामने वाला पढ़ता है और कभी जवाब देता है, कभी केवल एक ईमोजी भेज देता है। बातचीत चल भी जाए तो उसमें वह गर्माहट कहां होती है जो आमने-सामने बैठकर बात करने में होती है?

एक और महत्वपूर्ण अंतर है—चेहरे के भाव और आवाज का उतार-चढ़ाव। जब हम सामने बैठकर किसी से बात करते हैं तो हमारे चेहरे के भाव, आँखों की चमक, मुस्कान, आवाज का उतार-चढ़ाव और कभी-कभी हमारी चुप्पी भी बहुत कुछ कह देती है। सामने वाला कई ऐसी बातें समझ जाता है जिन्हें हमने शब्दों में कहा ही नहीं।

इसके विपरीत, वाट्सएप पर लिखे गए एक छोटे से संदेश का अर्थ कई बार अलग-अलग निकाला जा सकता है। हम मजाक में कुछ लिखते हैं और सामने वाला उसे गंभीरता से ले लेता है। हम कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन सही शब्द नहीं मिलते। खासकर बड़ी उम्र में यह समस्या और बढ़ सकती है। सामने बैठकर हम शायद अपनी बात अधूरे शब्दों में भी कह दें और सामने वाला हमारे भाव समझ ले, लेकिन लिखे हुए संदेश में वही बात गलत अर्थ दे सकती है।

इसलिए वर्चुअल दुनिया से दूरी बनाने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसकी सीमा समझना बहुत जरूरी है।

युवा हों या वरिष्ठ नागरिक, हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों से जुड़ना अच्छी बात है, लेकिन जीवन में कुछ ऐसे लोग भी होने चाहिए जिनके साथ हम बैठ सकें, हंस सकें, अपनी परेशानी साझा कर सकें और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकें।
आखिरकार, मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे और सामने बैठा अपना इंसान एक जैसे नहीं होते।

वर्चुअल दोस्ती अपनी जगह अच्छी है, लेकिन असली दोस्ती का कोई विकल्प नहीं। इसलिए वाट्सएप चलाइए, फेसबुक देखिए, इंस्टाग्राम पर जाइए, लेकिन कभी-कभी मोबाइल एक तरफ रखकर किसी पुराने दोस्त को फोन भी कीजिए। और उससे भी बेहतर हो तो उससे मिलने जाइए।
क्योंकि जिंदगी केवल ऑनलाइन नहीं है।

कुछ रिश्ते “ऑनलाइन” जुड़े रहते हैं, लेकिन जिंदगी असल में “ऑफलाइन” ही जी जाती है।

दूसरी पारी के बाद भी किसी की जिंदगी बचा सकते हैं हम

13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस मनाया गया। हर साल यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे जाने के बाद भी हम किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी में रोशनी छोड़ सकते हैं। लेकिन अंगदान की बात आते ही एक सवाल खासकर वरिष्ठ नागरिकों के मन में आ सकता है—क्या मेरी उम्र में भी मेरे अंग किसी के काम आ सकते हैं?

इसका जवाब है — हां, उम्र अपने आप में हमेशा बाधा नहीं है।

मृत्यु के बाद अंगदान के लिए कोई निश्चित अधिकतम आयु सीमा नहीं है। मृत्यु के समय डॉक्टर यह तय करते हैं कि कौन-से अंग या ऊतक प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं। इसलिए 60, 70 या 80 वर्ष की उम्र में पहुंच जाना अपने आप में किसी व्यक्ति को अंगदान से बाहर नहीं करता।

यह बात वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हमें खुद ही यह मानकर पीछे नहीं हट जाना चाहिए कि “अब हमारे अंग किस काम के होंगे?” चिकित्सा विज्ञान केवल उम्र नहीं, बल्कि मृत्यु के समय अंगों की वास्तविक स्थिति और उनकी उपयोगिता देखता है। यहां तक कि 70 और 80 वर्ष की उम्र के लोगों की कॉर्निया जैसी ऊतक (tissue) भी किसी की दृष्टि लौटाने में उपयोगी हो सकती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंगदान के महत्व को बहुत सरल शब्दों में कहा है—

एक निर्णय आपका, कई लोगों की जिंदगी बचा सकता है, जीवन दे सकता है।

प्रधानमंत्री ने 2023 में मन की बात में झारखंड की 63 वर्षीय स्नेहलता चौधरी का उदाहरण भी दिया था। उनके अंगदान से चार लोगों को अंग मिले और दो लोगों की आंखों की रोशनी लौटाने में मदद मिली। सोचिए, 63 वर्ष की एक महिला के जाने के बाद कितने लोगों की जिंदगी आगे बढ़ी।

प्रधानमंत्री ने अंगदान की भावना को एक और खूबसूरत वाक्य में व्यक्त किया—

जीवन छोड़ते हुए भी किसी का जीवन बच जाए, यही अंगदान के पीछे की सबसे बड़ी भावना है।

यह विचार वरिष्ठ नागरिकों के लिए खास मायने रखता है।

हमने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा परिवार के लिए दिया है। बच्चों को बड़ा किया, जिम्मेदारियां निभाईं, समाज में योगदान दिया। रिटायरमेंट के बाद भी हम कहते हैं कि जिंदगी की दूसरी पारी में अभी बहुत कुछ करना बाकी है। तो क्या हमारी दूसरी पारी का योगदान हमारी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना जरूरी है?

क्रिकेट के महान खिलाड़ी अनिल कुंबले ने अंगदान को क्रिकेट की भाषा में बहुत खूबसूरती से समझाया है—
“जिस तरह टेस्ट मैच में दूसरी पारी महत्वपूर्ण होती है, उसी तरह जीवन में अंगदान भी महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति की दूसरी पारी किसी जरूरतमंद की पहली पारी को आगे बढ़ा सकती है।”

यानी एक व्यक्ति की दूसरी पारी किसी जरूरतमंद व्यक्ति की पहली पारी को आगे बढ़ा सकती है।

लेकिन अंगदान का निर्णय केवल भावुक होकर नहीं लेना चाहिए। इसके साथ कई मानसिक और पारिवारिक सवाल जुड़े होते हैं।

कुछ वरिष्ठ नागरिकों को मृत्यु के बाद अपने शरीर के बारे में सोचने में ही असहजता महसूस हो सकती है। कुछ को धार्मिक या सामाजिक संकोच हो सकता है। किसी को यह डर हो सकता है कि यदि डॉक्टरों को पता है कि वह अंगदाता है तो कहीं उसके इलाज में कोई कमी न रह जाए। और कई बार परिवार भी इस निर्णय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता।

इन आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अंगदान स्वैच्छिक और पूरी जानकारी के बाद लिया गया व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए। किसी वरिष्ठ नागरिक पर परिवार, समाज या किसी संस्था का दबाव नहीं होना चाहिए।

लेकिन यदि आपने अंगदान का निर्णय लिया है तो एक काम जरूर कीजिए—अपने परिवार को बताइए।

सिर्फ पंजीकरण कराना पर्याप्त नहीं है। अपने बच्चों और निकट संबंधियों से खुलकर बात कीजिए और उन्हें अपनी इच्छा बताइए। मृत्यु के समय परिवार पहले ही भावनात्मक संकट में होता है। यदि उन्हें आपकी इच्छा पहले से पता होगी तो उस कठिन समय में निर्णय लेना उनके लिए आसान होगा।

यह भी समझना जरूरी है कि जीवित रहते हुए अंगदान और मृत्यु के बाद अंगदान अलग-अलग हैं। जीवित अंगदान में अलग चिकित्सा और कानूनी नियम लागू होते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले अधिकृत चिकित्सा संस्थान या NOTTO से सही जानकारी लेना चाहिए।

हम वरिष्ठ नागरिकों से हमेशा कहते हैं—नेवर से रिटायर्ड। रिटायरमेंट का अर्थ योगदान का अंत नहीं है। जीवन की दूसरी पारी में भी समाज के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। अंगदान शायद योगदान की सबसे अंतिम और सबसे अनोखी मिसाल है।

हमारी आंखें किसी को दुनिया दिखा सकती हैं। हमारा कोई अंग किसी दूसरे व्यक्ति को जिंदगी की नई शुरुआत दे सकता है। हमारे जाने के बाद भी किसी मां का बच्चा जीवित रह सकता है, किसी बच्चे को उसके पिता वापस मिल सकते हैं, किसी युवा को जीवन की दूसरी शुरुआत मिल सकती है।

इसलिए अंगदान को केवल मृत्यु के बारे में सोचने के रूप में न देखें। इसे जीवन को आगे बढ़ाने के संकल्प के रूप में देखें।

हमारी दूसरी पारी कब समाप्त होगी, यह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन उसके बाद भी किसी की पहली पारी शुरू हो सके—यह फैसला शायद हमारे हाथ में है।

Friday, August 21, 2026

जीवनसाथी के बिना जीने की तैयारी

एक ऐसा विषय है, जिसका सामना हर बुजुर्ग दंपती को कभी न कभी करना है, लेकिन इस पर बात करने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं—जब जीवनसाथी नहीं रहेगा, तब मैं कैसे जीऊंगा?

आज के समाज में बुजुर्ग अलग-अलग परिस्थितियों में रह रहे हैं। कुछ दंपती साथ रहते हैं, जबकि उनके बच्चे दूसरे शहरों या देशों में रहे हैं। कुछ भाग्यशाली हैं कि बच्चे और पोते-पोतियां उनके साथ हैं। कुछ पूरी तरह अकेले रहते हैं।

लेकिन एक डर लगभग हर दंपती को भीतर से सताता है—जब हममें से एक इस दुनिया से विदा हो जाएगा, तब दूसरे का क्या होगा?

कौन पहले जाएगा, कोई नहीं जानता।

यह डर स्वाभाविक है। पुरुष और महिला की परिस्थितियां भी अलग हो सकती हैं। बहुत कुछ उनके स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, सामाजिक संबंधों और वर्तमान जीवन-परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

कई बुजुर्ग दंपतियों के लिए जीवनसाथी केवल जीवन का साथी नहीं होता। वह दूसरे की दवाइयों, स्वास्थ्य समस्याओं, खान-पान और यहां तक कि छोटी-छोटी असामान्य बातों को भी समझता है। पेशेवर मदद इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकती है। लेकिन ऐसी मदद न तो आसानी से सस्ती मिलती है और न ही हर जगह उपलब्ध है।

अच्छी बात यह है कि स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। बढ़ती जरूरत और बढ़ती वरिष्ठ आबादी को देखते हुए कई स्टार्ट-अप और संस्थाएं वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के क्षेत्र में आ रही हैं। घर पर देखभाल, आपातकालीन सहायता, असिस्टेड लिविंग और सीनियर कम्युनिटी लिविंग जैसी सुविधाएं बढ़ रही हैं।

कुछ वरिष्ठों के लिए अच्छी तरह संचालित सीनियर कम्युनिटी में रहना अकेले रहने की तुलना में अधिक सुरक्षित और साथीपूर्ण हो सकता है। लेकिन बड़ी संख्या में बुजुर्गों के लिए ऐसी सुविधाएं अभी भी आर्थिक रूप से संभव नहीं हैं।

यहीं हमें अलग तरीके से सोचने की जरूरत है।

जीवनसाथी के बिना जीने की तैयारी का अर्थ मृत्यु की प्रतीक्षा करना नहीं है। इसका अर्थ है आगे के जीवन के लिए तैयार होना।

हर दंपती को धीरे-धीरे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोनों एक-दूसरे के जीवन की जरूरी बातों से परिचित हों।

क्या दोनों को पता है कि महत्वपूर्ण दस्तावेज, बैंक खाते, बीमा पॉलिसियां और निवेश कहां हैं? क्या दोनों दवाइयों का प्रबंधन कर सकते हैं, आपात स्थिति संभाल सकते हैं और जरूरी कामों के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं? क्या दोनों को उन महत्वपूर्ण लोगों के संपर्क नंबर मालूम हैं, जिनकी जरूरत पड़ सकती है?

ये बातें बहुत सामान्य लग सकती हैं, लेकिन जब एक जीवनसाथी अचानक नहीं रहता, तो यही छोटी बातें बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
एक और तैयारी उतनी ही महत्वपूर्ण है—जीवनसाथी के अलावा भी अपना जीवन बनाना।

कई दंपती इतने वर्षों तक साथ रहते हैं कि उनका पूरा सामाजिक संसार भी साझा हो जाता है। यह खूबसूरत है, लेकिन इससे एक तरह की निर्भरता भी पैदा हो सकती है। इसलिए दोनों के अपने मित्र, रुचियां और गतिविधियां भी होनी चाहिए।

जिस व्यक्ति के पास मित्र, रुचियां, सामाजिक संपर्क और जीवन में कोई उद्देश्य होता है, उसके लिए अकेले जीवन का सामना करना अपेक्षाकृत आसान होता है। कुछ पल अध्यात्म से जुड़ कर जीवन के हर क्षण को सहज और सुन्दर बनाया जा सकता है।

बच्चों की भी इसमें भूमिका है। वे दूर रह रहे हों तो भी दूरी का अर्थ संपर्क टूटना नहीं होना चाहिए। माता-पिता को सामाजिक रूप से सक्रिय, आर्थिक रूप से व्यवस्थित और डिजिटल रूप से सक्षम बने रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चों को भी अपने माता-पिता की भावनात्मक जरूरतों के साथ-साथ उनकी व्यावहारिक जरूरतों की जानकारी होनी चाहिए।

परंपरागत पारिवारिक व्यवस्था बदल रही है। बच्चे दूसरे शहरों और देशों में जा रहे हैं और परिवार छोटे होते जा रहे हैं। यह मान लेना कि बच्चे हमेशा बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए उपलब्ध रहेंगे, अब व्यावहारिक नहीं है।

हमें इसके लिए नई पीढ़ी को दोष दिए बिना इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। लेकिन यह भी समझना होगा कि परिवार के सहारे के कमजोर होने की एक कीमत है। समाज को सस्ती वरिष्ठ देखभाल, घर पर सहायता, आपातकालीन सेवाएं, असिस्टेड लिविंग और साथ-संगत उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना होगा।

हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो चर्चा में रहा, जिसमें दो बेटियां अपने पिता के अंतिम संस्कार को स्क्रीन पर दूर से देखती हुई दिखाई देती हैं और ₹5,100 का योगदान करती हैं। परिस्थितियों से सहमत हों या नहीं, ऐसी तस्वीरें आधुनिक जीवन की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती हैं।
इसका समाधान डर में जीना नहीं है। समाधान है—तैयार रहना।

हर बुजुर्ग दंपती को एक ऐसी बातचीत जरूर करनी चाहिए, जो शुरुआत में थोड़ी असहज लग सकती है:

अगर हममें से एक नहीं रहा, तो दूसरा कैसे जीवन बिताएगा?

बात शुरू करना कठिन हो सकता है। लेकिन ऐसी बातचीत व्यावहारिक फैसले लेने, बेहतर वित्तीय योजना बनाने, सामाजिक संबंध मजबूत करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद कर सकती है।और शायद सबसे महत्वपूर्ण तैयारी मानसिक है।

हमें अपने जीवनसाथी से गहरा प्रेम करना चाहिए, एक-दूसरे पर भरोसा करना चाहिए और हर पल को संजोना चाहिए—लेकिन साथ ही अपने पैरों पर खड़े रहने की क्षमता भी बनाए रखनी चाहिए।

इसलिए जब तक हम एक-दूसरे के साथ हैं, आइए एक-दूसरे को इस तरह तैयार करें कि जीवनसाथी के न रहने पर भी दूसरा अच्छी तरह जी सके।

यह मृत्यु के बारे में सोचना नहीं है। यह उस व्यक्ति के जीवन की चिंता करना है, जिससे हम सबसे अधिक प्रेम करते हैं।

जीना सीखें मरने से पहले

हम केवल एक बार मरते हैं, लेकिन तब तक हमें हर दिन जीने का अवसर मिलता है।

वरिष्ठ नागरिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उम्र बढ़ना नहीं है। असली चुनौती है जीवन के अंत की प्रतीक्षा करना छोड़कर वर्तमान को पूरे उत्साह से अपनाना। दुर्भाग्य से अनेक वरिष्ठ नागरिक अनजाने में अपनी सेवानिवृत्ति के वर्षों को केवल प्रतीक्षा का समय बना लेते हैं। जबकि सेवानिवृत्ति किसी प्रतीक्षालय का नाम नहीं, बल्कि जीवन की सार्थक दूसरी पारी की शुरुआत होनी चाहिए।

जीवन कभी भी केवल दिन गिनने का नाम नहीं होना चाहिए। हर सुबह बिस्तर से उठने का एक उद्देश्य होना चाहिए। केवल लंबी आयु का क्या लाभ, यदि उसमें उत्साह और जीवंतता ही न हो। सक्रिय जीवन का अर्थ है नई बातें सीखना, स्वयंसेवा करना, युवाओं का मार्गदर्शन करना, समाज के कार्यों में भाग लेना, पुराने शौक फिर से अपनाना, यात्रा करना, लिखना, पढ़ाना, बागवानी करना या वर्षों पहले जिम्मेदारियों के कारण अधूरा रह गया कोई सपना पूरा करना।

समाज ने भी अनेक वरिष्ठ नागरिकों के मन में यह धारणा बैठा दी है कि अब उन्हें पीछे हट जाना चाहिए और नई पीढ़ी को आगे आने देना चाहिए। नई पीढ़ी को अवसर देना आवश्यक है, लेकिन इसका अर्थ स्वयं जीवन से किनारा कर लेना नहीं है। अनुभव बहुत मूल्यवान होता है। हर वरिष्ठ नागरिक अपने साथ दशकों का अनुभव, सफलताएं, असफलताएं और जीवन के अनमोल सबक लेकर चलता है। परिवार, समाज और देश इन अनुभवों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। इस अमूल्य धरोहर को यूं ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

यदि हम ईमानदारी से अपनी दिनचर्या का आकलन करें तो पता चल जाएगा कि हम वास्तव में जी रहे हैं या केवल समय काट रहे हैं। यह आकलन केवल मन में नहीं, बल्कि लिखकर करना चाहिए। जैसे ही हम लिखना शुरू करते हैं, हमारे विचार अधिक स्पष्ट होने लगते हैं और नए-नए विचार सामने आने लगते हैं। तब हम स्वयं को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं।

अपने आप से कुछ सरल प्रश्न पूछिए—

  • क्या मैं कल का उत्साहपूर्वक इंतजार करता हूं?
  • क्या मैंने पिछले एक महीने में कुछ नया सीखा है?
  • इस सप्ताह मैंने किसकी मदद की?
  • मैं आख़िरी बार दिल खोलकर कब हंसा था?
  • मैं अधिक समय चिंता में बिताता हूं या कुछ नया करने में?
  • यदि आज मेरा जीवन का अंतिम दिन हो, तो क्या मुझे लगेगा कि मैंने कल सचमुच जीवन जिया था?

इन प्रश्नों के उत्तर आपको स्वयं चौंका सकते हैं।

इन विषयों पर अपने विश्वसनीय मित्रों या परिवार के सदस्यों से भी चर्चा कीजिए। कभी-कभी दूसरे लोग हमारी उन संभावनाओं को पहचान लेते हैं जिन्हें हम स्वयं नहीं देख पाते। आवश्यकता पड़े तो विशेषज्ञ की सलाह लेने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार हम शारीरिक स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर की सहायता लेते हैं, उसी प्रकार जीवन को नए उद्देश्य के साथ जीने के लिए मार्गदर्शन लेना भी समझदारी है।

यह आत्ममूल्यांकन पूरी ईमानदारी से होना चाहिए। इसका उद्देश्य स्वयं की प्रशंसा करना या स्वयं को भ्रम में रखना नहीं है। केवल एक प्रश्न का सच्चा उत्तर खोजिए—क्या मैं उद्देश्यपूर्ण जीवन जी रहा हूं, या केवल समय बिता रहा हूं?

जिंदा रहने और जीवन जीने में बहुत अंतर होता है। जिंदा रहने का प्रमाण हमारी धड़कन है, जबकि जीवन जीने का प्रमाण हमारा उत्साह, जिज्ञासा और समाज के प्रति योगदान है।

अधिकांश लोग सेवानिवृत्ति के लिए आर्थिक तैयारी तो करते हैं, लेकिन भावनात्मक तैयारी बहुत कम लोग करते हैं। जबकि वास्तव में यही भावनात्मक तैयारी तय करती है कि सेवानिवृत्ति जीवन का सबसे सुखद अध्याय बनेगी या सबसे अकेला।

भावनात्मक स्वास्थ्य का सीधा संबंध शारीरिक स्वास्थ्य से भी है। सकारात्मक सोच हमें नियमित व्यायाम, संतुलित भोजन, सामाजिक मेलजोल और तनाव पर नियंत्रण की ओर प्रेरित करती है। उम्र बढ़ने की चुनौतियों को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता, लेकिन मानसिक दृढ़ता हमें उनका सामना अधिक आत्मविश्वास और सकारात्मकता के साथ करने की शक्ति देती है। इसलिए सेवानिवृत्ति की तैयारी केवल बैंक बैलेंस बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि मन को भी तैयार करना उतना ही आवश्यक है।

आर्थिक सुरक्षा जीवन में वर्षों को बढ़ाने में सहयोग कर सकती है, लेकिन भावनात्मक तैयारी उन वर्षों में जीवन का संचार करती है।

याद रखिए, उम्र हमें जीने से नहीं रोकती। हमें रोकती है जिज्ञासा का समाप्त हो जाना। जिज्ञासु मन कभी सेवानिवृत्त नहीं होता। वह हमेशा सीखता है, सिखाता है, साझा करता है और आगे बढ़ता रहता है।

‘नेवर से रिटायर्ड’ मिशन एक सरल विश्वास पर आधारित है—वरिष्ठ नागरिक समाज पर बोझ नहीं हैं, बल्कि देश की सबसे बड़ी अप्रयुक्त संपदा हैं। जिस दिन हम प्रतीक्षा छोड़कर फिर से सक्रिय योगदान देना शुरू कर देंगे, उसी दिन हमारे जीवन के साथ-साथ समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन शुरू हो जाएगा।

इसलिए जीवन समाप्त होने से पहले सचमुच जीना शुरू कीजिए। आखिर हम केवल एक बार मरते हैं, लेकिन तब तक हमें हर दिन उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का एक नया अवसर मिलता है।

English version of this article can be read on www.neversayretired.in

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वरिष्ठ नागरिकों की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं

उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत का हर पांचवां व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का होगा। आज हर नौवां भारतीय वरिष्ठ नागरिक है और वर्ष 2035 तक यह संख्या बढ़कर हर सातवें व्यक्ति तक पहुंच जाएगी। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इस बात का संकेत हैं कि देश को तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी के लिए अभी से तैयार होना होगा।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार हैं? और क्या यह पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार की है, या समाज को भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी?

हम आम नागरिक सरकार को लेकर लंबी-लंबी बहस कर सकते हैं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन केवल चर्चा से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। बेहतर होगा कि हम व्यावहारिक सुझाव तैयार करें और उन्हें अपने विधायक तथा सांसदों तक पहुंचाएँ, ताकि वे उचित मंचों पर इन मुद्दों को उठा सकें।

साथ ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम स्वयं क्या कर सकते हैं।

आज महानगरों की अनेक आवासीय सोसायटियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) में वरिष्ठ नागरिकों के अलग समूह सक्रिय हैं। सुबह पार्कों में योग, व्यायाम, सैर और हंसी-मजाक करते वरिष्ठजन सहज ही दिखाई देते हैं। ऐसे समूह केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मित्रता, भावनात्मक सहयोग, मार्गदर्शन और अपनापन भी प्रदान करते हैं। जीवन की दूसरी पारी में यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रांची के माहेश्वरी समाज का एक प्रेरक उदाहरण उल्लेखनीय है। लगभग चार वर्ष पहले उन्होंने 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए ‘चौपाल’ की शुरुआत की। प्रत्येक माह होने वाली बैठकों, उपयोगी गतिविधियों और आपसी सहयोग ने इसे अत्यंत सफल बना दिया। इसकी सफलता से प्रेरित होकर अन्य शहरों में भी ऐसी चौपालें प्रारंभ हुई हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज स्वयं भी वरिष्ठों के लिए प्रभावी सहयोग व्यवस्था विकसित कर सकता है।

भारत सरकार, विशेषकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनेक योजनाएं और कार्यक्रम चला रहा है। इन प्रयासों की सराहना होनी चाहिए। केवल आलोचना करने के बजाय समाज और स्वयंसेवी संस्थाओं को रचनात्मक सुझाव देने चाहिए तथा सरकार के साथ मिलकर समाधान खोजने चाहिए। सकारात्मक सहयोग हमेशा अधिक परिणाम देता है।

सबसे कठिन स्थिति उन वरिष्ठ नागरिकों की होती है जिनके पास परिवार का सहारा नहीं है। हाल ही में मैंने सोशल मीडिया पर एक समाजसेवी द्वारा लद्दाख की लगभग अस्सी वर्षीय एक अकेली महिला की सहायता का मार्मिक उदाहरण देखा। ऐसे अनेक लोग हमारे आसपास हैं जिन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए समाज के सहयोग की आवश्यकता है।

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा स्वरोजगार से जुड़े वरिष्ठ नागरिकों का है। कुछ छोटे व्यापारियों की बैठक में एक सज्जन ने कहा, “सरकारी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन मिलती है, लेकिन छोटे दुकानदारों और स्वरोजगार करने वालों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।” यह विचार गंभीरता से सोचने योग्य है। सरकार उनकी आयकर या अन्य योगदान के आधार पर किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा योजना पर विचार कर सकती है।

बदलते पारिवारिक ढांचे और बढ़ती आयु के कारण अच्छे वृद्धाश्रमों तथा सहायक आवासों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। सरकार यदि इस क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को कर रियायत, प्रोत्साहन और सरल नियम उपलब्ध कराए, तो समाज की भागीदारी और बढ़ सकती है।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में निश्चित रूप से सुधार हुआ है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विशेषकर अकेले रहने वाले वरिष्ठों के लिए घर पर चिकित्सा सुविधा, मानसिक स्वास्थ्य, फिजियोथेरेपी और आपातकालीन सहायता की उपलब्धता बढ़ाने की आवश्यकता है। अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रही हैं, परंतु समस्या इतनी व्यापक है कि कहीं अधिक सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
वरिष्ठ नागरिक केवल कल्याण योजनाओं के लाभार्थी नहीं हैं। वे अनुभव, ज्ञान और जीवन मूल्यों की अमूल्य धरोहर हैं। यदि उन्हें सक्रिय और सम्मानजनक अवसर दिए जाएं, तो वे समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों के बेहतर भविष्य की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं हो सकती। इसके लिए सरकार, समाज, स्वयंसेवी संस्थाएं, परिवार और प्रत्येक नागरिक को मिलकर काम करना होगा। तभी हम अपने वरिष्ठों को केवल लंबा जीवन ही नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण, सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण जीवन भी दे सकेंगे।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों का कितना सम्मान करता है और उन्हें कितना सशक्त बनाता है।

This article in English on www.neversayretired.in

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Saturday, August 01, 2026

The Importance of Good Health in the Second Innings

Good health is the greatest blessing as we grow older. It keeps us away from illness, fills us with energy, and gives us the confidence to live independently. We can truly enjoy our second innings only when both our body and mind continue to support us.

Every individual is different. Our age, body, lifestyle, and health conditions are unique. Therefore, in this phase of life, we should live according to our own circumstances instead of trying to imitate others. What works well for a friend may not necessarily be right for us. The key is to understand our own body’s needs and shape our lifestyle accordingly.

Many of the health problems we face today have their roots in habits developed during our younger years—irregular routines, unhealthy eating, stress, lack of exercise, and, in some cases, addictions such as tobacco or pan masala. As these habits catch up with us, we often wish we had taken better care of ourselves earlier.

But we cannot turn the clock back. There is little value in regretting the past. What matters is what we choose to do today. A good decision taken now can make the coming years healthier and happier.

I have seen some of my friends consume pan masala for decades. Even after health problems have appeared, they find it extremely difficult to quit. Addiction has such a strong hold that many manage to reduce the habit but cannot give it up completely. The earlier we adopt healthy habits, the greater the rewards in later life.

The encouraging news is that even in our senior years, much remains within our control. A balanced diet, regular exercise, and a disciplined daily routine can significantly reduce the risk of joint pain, weakness, and many chronic illnesses. Good health depends not only on medicines but also on the choices we make every single day.

Here are a few simple habits worth adopting:

  1. Eat a balanced and nutritious diet
  2. Stay physically active
  3. Take care of your mental and emotional well-being
  4. Make regular health check-ups a habit

Eat a balanced and nutritious diet

As we age, our digestive system slows down. Choose foods that are easy to digest yet rich in nutrients. Include plenty of green vegetables, seasonal fruits, whole grains, and adequate protein in your meals. Pulses, sprouts, low-fat dairy products, calcium, and Vitamin D help maintain healthy bones and muscles.

Stay physically active

An active lifestyle is one of the greatest gifts we can give ourselves. Health experts recommend at least 150 minutes of moderate physical activity each week, such as brisk walking, swimming, or cycling. Light strength and balance exercises are equally important as they help prevent falls and keep bones and muscles strong.

Take care of your mental and emotional well-being

A healthy mind is as important as a healthy body. Reading, solving puzzles or Sudoku, learning something new, or pursuing a hobby keeps the brain active. Staying connected with family, friends, and the community reduces loneliness and stress. Equally important is getting seven to nine hours of quality sleep every night.

Make regular health check-ups a habit

Many serious illnesses develop silently. Regular medical check-ups help detect problems early, when treatment is most effective. Keep your blood pressure, blood sugar, cholesterol, and other health parameters under regular review.

Remember, retirement and ageing are not the real challenges. Neglecting our health is. If our body remains healthy, there is no age limit for dreaming, learning, contributing to society, and enjoying life to the fullest.

The strongest foundation for a meaningful, active, and joyful second innings is good health. Make it your priority. It is the greatest investment you can make—not only for yourself but also for your family’s happiness and your own independence.