We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Wednesday, March 25, 2026

सौवां लेख — 100 लेखों से 100 वर्षों की प्रेरणा

मुझे स्वयं भी आश्चर्य होता है कि मैं अपने मिशन नेवर से रिटायर्ड के केवल एक ही विषय पर इतने अधिक लेख कैसे लिख पाया। इस मिशन का मूल विचार है—वरिष्ठ नागरिकों को सक्रिय, संलग्न और सम्मानित बने रहने के लिए प्रेरित करना।

मुझे याद है, एक वर्ष से भी अधिक पहले मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा था कि मैं हर सप्ताह केवल वरिष्ठ नागरिकों पर लिखने के लिए नए विषय कैसे खोज पाऊंगा।

परंतु वास्तव में मेरे मित्रों के ही सुझाव और सहयोग ने मुझे इस पड़ाव तक पहुंचने में सहयोग किया है, और मैं यथासंभव आगे भी लिखता रहूंगा। नेवर से रिटायर्ड मिशन की सराहना करने वाले मित्र अब उन विषयों में भी महत्वपूर्ण योगदान देने लगे हैं जिन्हें मैं अपने लेखों में उठाता हूं। मुझे इस विषय से जुड़े दर्जनों संदेश प्राप्त होते हैं—कभी वीडियो के रूप में, कभी छोटे संदेशों के रूप में—जो उन्हें अपने विभिन्न समूहों में प्राप्त हुए होते हैं।

मुझे तो लगता है कि यदि समय हो और उन्हें पढ़ने वाले लोग मिलते रहें, तो प्रतिदिन भी एक लेख लिखा जा सकता है। यह सौवां लेख अपने आप में निरंतरता, समर्पण और प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

मैंने विभिन्न विषयों पर लिखा है, और कुछ विशेष विषयों पर एक से अधिक लेख भी लिखे हैं। कई महत्वपूर्ण विषयों पर पाठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं भी मिलीं। उदाहरण के लिए—जो वरिष्ठ मानसिक रूप से सक्रिय रहते हैं, वे अधिक प्रसन्न रहते हैं; सामाजिक सहभागिता अकेलेपन को दूर करती है; जीवन का उद्देश्य हमारी ऊर्जा को जीवित रखता है; और छोटी-छोटी दैनिक आदतें भी आगे के वर्षों में बड़ा अंतर ला सकती हैं – इन लेख पर औसतन प्रतिक्रियाएं काफी आई।

इस सौवें लेख को लिखते समय मुझे फरवरी 2025 में लिखा अपना एक लेख याद आता है, जिसका शीर्षक था—“वरिष्ठजन, सेंचुरी लगाने के लिए अनुशासित बनिए।” आज एक बार फिर यह विषय लिखने के लिए बहुत उपयुक्त प्रतीत होता है। इसलिए यह मेरा सौवां लेख है, जिसे मैं अपने मित्रों को समर्पित करते हुए उनसे आग्रह करता हूं कि वे ऐसा जीवन जिएं जिससे वे भी इस जादुई आंकड़े तक पहुंच सकें।

कुछ दिन पहले मैंने हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की एक छोटी-सी वीडियो रील देखी। उसमें वे बता रहे थे कि उनके जन्मदिन 17 सितंबर के अवसर पर एक नेता ने उन्हें फोन कर कहा कि अब तो वे 75 वर्ष के हो गए हैं। इस पर मोदी जी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया—“अभी 25 साल बाकी हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि वे बीते हुए वर्षों की गिनती नहीं करते, बल्कि आगे बचे हुए वर्षों को गिनते हैं। अर्थात जीवन में जो बीत गया है, उसकी गिनती में समय नष्ट करने के बजाय जो शेष है उसे सार्थक ढंग से जीने के बारे में सोचना चाहिए। यह कितनी सकारात्मक सोच है—और शायद यही उनके स्वस्थ रहने और देश के लिए निरंतर कार्य करते रहने का रहस्य भी है।

सनातन धर्म और वेदों में मनुष्य की आदर्श आयु 100 वर्ष (शतायु) मानी गई है। वेदों, उपनिषदों और अन्य धर्मग्रंथों में लंबी और स्वस्थ आयु के लिए “शतं वर्षाणि” अर्थात सौ वर्षों तक जीने की कामना और प्रार्थनाएं मिलती हैं।

सनातन शास्त्रों में 100 वर्ष की आयु से संबंधित कुछ प्रमुख उल्लेख इस प्रकार हैं—

  1. वेदों में ‘शतायुः पुरुषः’ का उल्लेख: यजुर्वेद और अथर्ववेद में मनुष्य के लिए सौ वर्षों की आयु की कल्पना की गई है—
शतायुः पुरुषः शतेन्द्रियः।

(अर्थ : मनुष्य शतायु हो, और उसकी सभी शक्तियाँ पूर्ण रूप से सक्रिय रहें।)

  1. ईशावास्य उपनिषद का संदेश: ईशावास्य उपनिषद (श्लोक 2) में कहा गया है कि मनुष्य को सौ वर्षों तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी चाहिए—
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
  1. अथर्ववेद की प्रार्थना: अथर्ववेद में एक सुंदर प्रार्थना है जिसमें सौ वर्षों तक देखने, सुनने और जीवन जीने की कामना की गई है—
पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्,
बुध्येम शरदः शतम्, रोहेम शरदः शतम्,
पुषेम शरदः शतम्, भवेम शरदः शतम्।

अर्थात हम सौ वर्षों तक देखें, सौ वर्षों तक जीवित रहें, सौ वर्षों तक समझते-सीखते रहें और सौ वर्षों तक उन्नति करते रहें।

हर वरिष्ठ व्यक्ति छोटे-छोटे अनुशासित कदमों के माध्यम से सार्थक और स्वस्थ सौ वर्षों की ओर बढ़ सकता है। उम्र जीवन से पीछे हटने का संकेत नहीं है—यह तो जीवन को और अधिक समझदारी और अनुभव के साथ जीने का एक आमंत्रण है।

आप सभी का स्नेह और आशीर्वाद ही मुझे इस मंज़िल तक पहुंचा पाया है। आप सभी का हृदय से धन्यवाद। मुझे विश्वास है कि आगे की इस यात्रा में भी आपका साथ मिलता रहेगा और हम सब मिलकर वरिष्ठजनों के जीवन में नई रोशनी लाने तथा उनके स्वर्णिम वर्षों को अधिक प्रसन्न, सक्रिय और स्वस्थ बनाने के इस प्रयास को सफल बनाएंगे।

वरिष्ठजन, वसीयत बनाने में देर न करें

हम सभी जीवन भर मेहनत करके संपत्ति बनाते हैं—घर, जमीन, बैंक बैलेंस, निवेश और कई प्रकार की व्यक्तिगत वस्तुएं। विशेषकर वरिष्ठजन तो वर्षों की मेहनत, अनुशासन और दूरदर्शिता से यह सब अर्जित करते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है—हमारे बाद इन सबका क्या होगा और यह किसके हिस्से में किस प्रकार आएगा? इसी प्रश्न का सबसे सरल और स्पष्ट उत्तर है—वसीयत

आज भी ऐसे बहुत से वरिष्ठजन होंगे जिन्होंने अभी तक अपनी वसीयत नहीं बनाई है। हमारे समाज में एक ऐसी मनोवृत्ति बन गई है कि घर में जब भी वसीयत की बात होती है तो उसे कुछ नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। कई लोगों के मन में यह विचार आ जाता है कि वसीयत तो तभी बनाई जाती है जब जीवन का अंतिम समय बहुत निकट आ गया हो।

लेकिन ज़रा सोचिए—क्या हमें यह पता है कि ईश्वर का संदेश हमें कब आ जाए? जीवन अनिश्चित है। इसलिए इस विषय से जुड़ा अनावश्यक भय मन से निकाल देना ही समझदारी है। सच तो यह है कि वसीयत बनाना किसी भी तरह से अशुभ या नकारात्मक बात नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदार और दूरदर्शी निर्णय है।

एक और बात जो लोगों को समझनी चाहिए, वह यह है कि वसीयत एक बार बन जाने के बाद स्थायी रूप से पत्थर की लकीर नहीं होती। परिस्थितियों के अनुसार इसे बदला भी जा सकता है। आप जीवन में कितनी ही बार अपनी वसीयत संशोधित कर सकते हैं। हां, अंतिम रूप से जो वसीयत बनाई जाती है वही मान्य होती है। केवल इतना ध्यान रखना होता है कि नई वसीयत में पहले की वसीयत को निरस्त करने का स्पष्ट उल्लेख किया जाए।

वसीयत में सामान्यतः अपनी संपत्ति, बैंक खाते, निवेश, अचल संपत्ति, व्यक्तिगत वस्तुएं और अन्य महत्वपूर्ण मामलों के बारे में स्पष्ट निर्देश लिखे जाते हैं। इससे आपके जाने के बाद आपके परिवार के लोगों को किसी प्रकार की उलझन का सामना नहीं करना पड़ता।

पिछले सप्ताह मुझे रांची में इसी विषय पर आयोजित एक कार्यशाला में भाग लेने का अवसर मिला। इस कार्यशाला का आयोजन माहेश्वरी समाज की चौपाल इकाई ने किया था। चौपाल, माहेश्वरी समाज का ही एक अंग है, जो केवल वरिष्ठ नागरिकों को सदस्यता देता है और उन्हीं से जुड़े विषयों पर विचार करता है। यह पहल मुझे हमारे नेवर से रिटायर्ड मिशन की भावना से भी बहुत मेल खाती हुई लगी।

इस कार्यशाला में समाज के कुछ युवा अधिवक्ताओं ने वसीयत से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं और महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में बहुत सरल और स्पष्ट जानकारी दी। इस आयोजन से मुझे यह भी लगा कि ऐसी कार्यशालाएं अन्य सामाजिक संस्थाओं, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों से जुड़ी संस्थाओं द्वारा भी आयोजित की जानी चाहिए। इससे लोगों में जागरूकता बढ़ेगी और वे समय रहते सही निर्णय ले सकेंगे।

वसीयत क्यों बनानी चाहिए?

  1. अपनी इच्छा के अनुसार संपत्ति का वितरण: वसीयत के माध्यम से आप स्पष्ट रूप से तय कर सकते हैं कि आपकी संपत्ति किसे और किस अनुपात में मिलेगी। इससे आपकी इच्छा का सम्मान होता है और बाद में किसी प्रकार का भ्रम नहीं रहता।
  2. परिवार में विवाद से बचाव: अक्सर संपत्ति के बंटवारे को लेकर परिवारों में मतभेद या विवाद हो जाते हैं। लिखित वसीयत होने से ऐसी स्थितियों की संभावना बहुत कम हो जाती है।
  3. कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाना: यदि वसीयत नहीं होती, तो संपत्ति के बंटवारे के लिए कानून के सामान्य नियम लागू होते हैं, जिससे प्रक्रिया कभी-कभी लंबी और जटिल हो जाती है। वसीयत होने से यह प्रक्रिया काफी सरल हो जाती है।
  4. विशेष जिम्मेदारियों की व्यवस्था: यदि परिवार में कोई सदस्य विशेष देखभाल की आवश्यकता वाला है—जैसे कोई दिव्यांग संतान या पूर्णतः निर्भर व्यक्ति—तो वसीयत में उसके लिए अलग से प्रावधान किया जा सकता है।
  5. सामाजिक या परोपकारी कार्य: यदि आप अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा किसी सामाजिक संस्था, ट्रस्ट या परोपकारी कार्य के लिए देना चाहते हैं, तो वसीयत में इसका स्पष्ट उल्लेख किया जा सकता है।
  6. मन की शांति: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब व्यक्ति को यह संतोष होता है कि उसके जाने के बाद भी सब कुछ व्यवस्थित रहेगा, तो उसे मानसिक शांति मिलती है।

कार्यशाला में एक और दिलचस्प और महत्वपूर्ण बात बताई गई। आज के डिजिटल युग में केवल चल और अचल संपत्ति ही नहीं, बल्कि डिजिटल संपत्ति भी महत्वपूर्ण हो गई है। यदि आपकी सोशल मीडिया पर अच्छी उपस्थिति है, यूट्यूब चैनल है, ब्लॉग है या कोई ऑनलाइन आय का स्रोत है, तो उसे भी अपनी संपत्ति का हिस्सा मानकर वसीयत में उल्लेख करना चाहिए। आजकल बहुत से लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं।

निष्कर्ष

अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि वसीयत बनाना मृत्यु की चिंता का विषय नहीं, बल्कि जीवन की जिम्मेदार योजना का एक महत्वपूर्ण कदम है। यह केवल संपत्ति के बंटवारे का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्रति आपकी संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का प्रतीक है।किसी अनुभवी अधिवक्ता से सलाह लीजिए, अपनी सभी संपत्तियों की सूची बनाइए और यह स्पष्ट कीजिए कि आप उन्हें किस प्रकार वितरित करना चाहते हैं।

याद रखिए—एक सुविचारित वसीयत आपके बाद भी परिवार में व्यवस्था, सम्मान और सद्भाव बनाए रखने का माध्यम बन सकती है। और शायद यही किसी भी जिम्मेदार जीवन की सबसे बड़ी विरासत होती है।

(अगले सप्ताह मेरा 100 वां लेख होगा)

Monday, March 09, 2026

बुजुर्गों को “थ्रो अवे” कल्चर नहीं भाता

आज थोड़ा विमर्श पर्यावरण संरक्षण पर। इस विषय पर लेखों की कमी नहीं है, सेमिनार और वर्कशॉप्स भी लगातार होते रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में युवा भाग लेते हैं। मंचों पर पर्यावरण बचाने की बातें होती हैं, संकल्प लिए जाते हैं। लेकिन जब व्यवहार पर नजर डालें, तो एक विरोधाभास साफ दिखता है। वही युवा वर्ग अनजाने में “थ्रो अवे कल्चर” को सबसे अधिक बढ़ावा भी दे रहा है।

आज की प्रवृत्ति यह बन गई है कि किसी भी वस्तु में जरा-सी खराबी आई नहीं कि उसे रिपेयर करवाने के बजाय तुरंत डिस्पोज कर दिया जाता है और नई वस्तु खरीद ली जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं, पर एक बड़ा कारण यह भी है कि हम स्वयं कुछ करने की मेहनत नहीं करना चाहते।

एक छोटा-सा उदाहरण लें। मान लीजिए आपके घर का टोस्टर खराब हो गया। उसकी कीमत लगभग ₹1500 रही होगी। सामान्यतः हम उसे रिपेयर कराने के बजाय नया टोस्टर खरीदने का विचार करते हैं। हो सकता है कोई एक्सचेंज स्कीम मिल जाए और पुराने टोस्टर के बदले 200–300 रुपये भी मिल जाएं। लेकिन यदि उसी टोस्टर को रिपेयर कराया जाए, तो संभव है कि मात्र 200–300 रुपये में वह फिर से पूरी तरह उपयोग योग्य बन जाए। प्रश्न यह है—क्या हम यह विकल्प सोचते भी हैं?

इसका एक दूसरा पहलू भी है। आज रिपेयरिंग की दुकानें तेजी से कम होती जा रही हैं। कारण साफ है—जब लोग रिपेयर करवाने ही नहीं आते, तो दुकानदार इस पेशे में क्यों टिके रहें? दूसरी ओर, ऑनलाइन ऑर्डर का चलन बढ़ गया है। नया सामान तो ऑनलाइन एक क्लिक पर मिल जाता है, लेकिन रिपेयरिंग की सेवाएं इस डिजिटल दुनिया में लगभग गायब हैं।

अब जरा यह भी सोचिए कि नया टोस्टर खरीदने के बाद पुराना टोस्टर कहां जाता है। बहुत कम मामलों में उसे कोई रिपेयर करके दोबारा बेचता होगा, पर अधिकांशतः वह कबाड़ बनकर रह जाता है। इस कबाड़ को निपटाने की प्रक्रिया में पर्यावरण को कितना नुकसान होता है, इस पर हम शायद ही कभी गंभीरता से विचार करते हैं।

आज स्थिति यह है कि इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं बहुत तेजी से ई-वेस्ट में बदल रही हैं। इससे मैन्युफैक्चरर्स को तो लाभ हो रहा है, क्योंकि बिक्री बढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर ई-वेस्ट का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है।

ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर में लगभग 62 मिलियन मेट्रिक टन ई-वेस्ट पैदा हुआ, जिसमें से एक चौथाई से भी कम हिस्सा ही रीसायकल हो सका। अधिकांश उपकरण मामूली-सी खराबी के कारण ही फेंक दिए जाते हैं। यूरोपीय एनवायरनमेंटल ब्यूरो के एक शोध के अनुसार, यदि हम अपने स्मार्टफोन को केवल एक वर्ष अधिक उपयोग में लें, तो उसके कार्बन फुटप्रिंट में लगभग 30% तक की कमी लाई जा सकती है। यह आंकड़ा अपने आप में सोचने पर मजबूर करता है।

यदि हमें वास्तव में पर्यावरण बचाना है, तो रिपेयरिंग की संस्कृति को फिर से जीवित करना ही होगा। इसके लिए सरकार को भी आने वाली पीढ़ियों के हित में ठोस कदम उठाने होंगे। साथ ही, हम सभी को अपनी मानसिकता बदलनी होगी।

एक ओर हमारे देश के युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं, और दूसरी ओर रिपेयरिंग जैसे हुनर वाले पेशों में लोगों की भारी कमी है। क्यों न हम एक ऐसी मुहिम शुरू करें, जिसमें बेरोजगार युवाओं को रिपेयरिंग की स्किल सिखाई जाए, ताकि अधिक से अधिक वस्तुओं को दोबारा उपयोग में लाया जा सके। स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में पहल कर सकती हैं और सरकार भी प्रशिक्षण, प्रोत्साहन व संसाधनों के माध्यम से बड़ा योगदान दे सकती है।

कुछ यूरोपीय देशों के उदाहरण इस संदर्भ में प्रेरक हैं। स्वीडन में रिपेयरिंग सेवाओं पर वैट कम कर दिया गया, ताकि लोग रिपेयर को प्राथमिकता दें। रवांडा में कम्युनिटी रिपेयर हब्स बनाए गए, जिससे ई-वेस्ट के आयात में कमी आई। कुछ देशों में तो रिपेयरिंग पर सीधी सब्सिडी भी दी जा रही है।

सच तो यह है कि बुजुर्गों को “थ्रो अवे” कल्चर कभी रास ही नहीं आया। आज भी किसी बुजुर्ग से बात कर लीजिए—चाहे कपड़े हों या घरेलू उपकरण—उनका पहला सवाल यही होता है, “इसे रिपेयर क्यों नहीं कर लेते?” यह सोच केवल बचत की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की सोच है।

यदि सरकार, समाज और आम नागरिक मिलकर उन युवाओं को प्रोत्साहन दें जो इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हम एक बड़ा कदम उठा सकते हैं। हर शहर में छोटे-छोटे उद्यम खड़े हो सकते हैं, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

हो सकता है कि बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को इससे कुछ असुविधा हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण की रक्षा आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

वरिष्ठ नागरिक और एआई: ज्ञान को डिजिटल शक्ति में बदलना

हाल ही में भारत में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन ने पूरे देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के भविष्य को लेकर चर्चा छेड़ दी है। जहां एक ओर स्टार्टअप्स, टेक्नोलॉजी लैब्स और युवा नवाचारकर्ताओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, वहीं एक वर्ग ऐसा है जिसकी भूमिका अक्सर अनदेखी की जाती है — वरिष्ठ नागरिक।

समय, अनुभव और ज्ञान से परिपूर्ण हमारे बुजुर्ग एआई को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और साथ ही मानसिक रूप से सक्रिय और सामाजिक रूप से जुड़े रह सकते हैं।

एआई केवल कोडिंग और एल्गोरिदम तक सीमित नहीं है; यह संदर्भ, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के बारे में भी है। दशकों के अनुभव के साथ, वरिष्ठ नागरिक इन तीनों को एआई में ला सकते हैं। उनकी भागीदारी एआई को एक ठंडे, डेटा-आधारित टूल से बदलकर एक ऐसी तकनीक बना सकती है जो मानवीय ज्ञान को दर्शाती है।

एआई में वरिष्ठ नागरिक क्यों महत्वपूर्ण हैं

एआई सिस्टम उतने ही अच्छे होते हैं जितना डेटा और संदर्भ उन्हें दिया जाता है। वरिष्ठ नागरिक लाते हैं:

  • जीवन का अनुभव: स्वास्थ्य, वित्त, संस्कृति और सामुदायिक जीवन में दशकों का ज्ञान।
  • नैतिक निर्णय: जीवन भर के निर्णय लेने का अनुभव एआई को निष्पक्ष और जिम्मेदार बनाने में मदद करता है।
  • सांस्कृतिक स्मृति: बुजुर्ग भाषाओं, परंपराओं और स्थानीय ज्ञान को एआई डेटासेट में संरक्षित करने में मदद कर सकते हैं।

भारत जैसे देश में, जहां परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चलते हैं, वरिष्ठ नागरिक एआई सिस्टम को नवाचार और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, एआई आधारित स्वास्थ्य ऐप्स मरीजों के व्यवहार पर बुजुर्गों की अंतर्दृष्टि से लाभ उठा सकते हैं, जबकि वित्तीय एआई टूल्स उनके धन प्रबंधन अनुभव से सीख सकते हैं।

दैनिक व्यवहार के प्रत्येक क्षेत्र में एआई का प्रयोग बढ़ रहा है। इससे डरने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है इसे समझने की, अपने अनुरूप उपयोग में लाने की।

वरिष्ठ नागरिकों की संभावित भूमिकाएं

  1. ज्ञान सलाहकार: वरिष्ठ नागरिक एआई टीमों के साथ काम कर सकते हैं और अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता साझा कर सकते हैं। एक सेवानिवृत्त डॉक्टर स्वास्थ्य एआई को प्रशिक्षित करने में मदद कर सकता है, एक पूर्व बैंकर वित्तीय एआई का मार्गदर्शन कर सकता है, और एक शिक्षक शिक्षा एआई को समृद्ध कर सकता है।
  2. परीक्षक और उपयोगिता सलाहकार: कई एआई टूल्स बुजुर्गों के लिए उपयोगकर्ता-अनुकूल नहीं होते। वरिष्ठ नागरिक ऐप्स, वॉइस असिस्टेंट और स्वास्थ्य उपकरणों का परीक्षण कर सकते हैं, जिससे वे सभी उम्र के लिए सुलभ बन सकें।
  3. कहानीकार और डेटा योगदानकर्ता: अपनी कहानियों, मौखिक इतिहास और सांस्कृतिक ज्ञान को साझा करके, वरिष्ठ नागरिक एआई को मानवीय संदर्भ प्रदान कर सकते हैं। कल्पना कीजिए, एआई सिस्टम जो लोक कथाओं, स्थानीय भाषाओं और परंपराओं को संरक्षित करते हैं — यह सब बुजुर्गों के योगदान से संभव है।
  4. आजीवन शिक्षार्थी: एआई टूल्स के साथ जुड़ने से दिमाग तेज रहता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और उद्देश्य की भावना मिलती है। एआई का उपयोग सीखना सशक्त बनाने वाला हो सकता है और वरिष्ठ नागरिकों को परिवार, समाज और नवाचार से जुड़े रहने में सहयोग करता है।
  5. समुदाय सेतु: वरिष्ठ नागरिक अपने समुदायों में जागरूकता फैला सकते हैं, तकनीकी डर को कम कर सकते हैं और पीढ़ियों के बीच सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। वे एआई साक्षरता के राजदूत बन सकते हैं।

समाज के लिए जीत-जीत

जब वरिष्ठ नागरिक एआई से जुड़ते हैं, तो वे न केवल सक्रिय और सम्मानित रहते हैं, बल्कि एक ऐसी तकनीक बनाने में मदद करते हैं जो समावेशी, नैतिक और मानव-केंद्रित हो। यह नेवर से रिटायर्ड मिशन के साथ पूरी तरह मेल खाता है: बुजुर्गों को सक्रिय, उद्देश्यपूर्ण और सम्मानित बनाए रखना।

एआई, जब बुजुर्गों द्वारा निर्देशित होता है, तो पीढ़ियों के बीच एक सेतु बन सकता है — अतीत को संरक्षित करते हुए, वर्तमान को सुधारते हुए और भविष्य को आकार देते हुए।

आह्वान

आइए एआई को केवल युवाओं का खेल न समझें। इसके बजाय, ऐसे मंच बनाएं जहां वरिष्ठ नागरिक मार्गदर्शन, परीक्षण और योगदान कर सकें। समुदाय, एनजीओ और टेक कंपनियों को बुजुर्गों को शामिल करना चाहिए — क्योंकि एआई के भविष्य को केवल कोड नहीं, ज्ञान की भी आवश्यकता है।

वरिष्ठ नागरिकों को शामिल करके, हम यह सुनिश्चित करते हैं कि एआई सहानुभूति, जिम्मेदारी और सांस्कृतिक गहराई के साथ विकसित हो। और हमारे बुजुर्गों के लिए, यह तेजी से बदलती दुनिया में सक्रिय, संलग्न और सम्मानित बने रहने का एक अवसर है।