We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Monday, March 09, 2026

बुजुर्गों को “थ्रो अवे” कल्चर नहीं भाता

आज थोड़ा विमर्श पर्यावरण संरक्षण पर। इस विषय पर लेखों की कमी नहीं है, सेमिनार और वर्कशॉप्स भी लगातार होते रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में युवा भाग लेते हैं। मंचों पर पर्यावरण बचाने की बातें होती हैं, संकल्प लिए जाते हैं। लेकिन जब व्यवहार पर नजर डालें, तो एक विरोधाभास साफ दिखता है। वही युवा वर्ग अनजाने में “थ्रो अवे कल्चर” को सबसे अधिक बढ़ावा भी दे रहा है।

आज की प्रवृत्ति यह बन गई है कि किसी भी वस्तु में जरा-सी खराबी आई नहीं कि उसे रिपेयर करवाने के बजाय तुरंत डिस्पोज कर दिया जाता है और नई वस्तु खरीद ली जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं, पर एक बड़ा कारण यह भी है कि हम स्वयं कुछ करने की मेहनत नहीं करना चाहते।

एक छोटा-सा उदाहरण लें। मान लीजिए आपके घर का टोस्टर खराब हो गया। उसकी कीमत लगभग ₹1500 रही होगी। सामान्यतः हम उसे रिपेयर कराने के बजाय नया टोस्टर खरीदने का विचार करते हैं। हो सकता है कोई एक्सचेंज स्कीम मिल जाए और पुराने टोस्टर के बदले 200–300 रुपये भी मिल जाएं। लेकिन यदि उसी टोस्टर को रिपेयर कराया जाए, तो संभव है कि मात्र 200–300 रुपये में वह फिर से पूरी तरह उपयोग योग्य बन जाए। प्रश्न यह है—क्या हम यह विकल्प सोचते भी हैं?

इसका एक दूसरा पहलू भी है। आज रिपेयरिंग की दुकानें तेजी से कम होती जा रही हैं। कारण साफ है—जब लोग रिपेयर करवाने ही नहीं आते, तो दुकानदार इस पेशे में क्यों टिके रहें? दूसरी ओर, ऑनलाइन ऑर्डर का चलन बढ़ गया है। नया सामान तो ऑनलाइन एक क्लिक पर मिल जाता है, लेकिन रिपेयरिंग की सेवाएं इस डिजिटल दुनिया में लगभग गायब हैं।

अब जरा यह भी सोचिए कि नया टोस्टर खरीदने के बाद पुराना टोस्टर कहां जाता है। बहुत कम मामलों में उसे कोई रिपेयर करके दोबारा बेचता होगा, पर अधिकांशतः वह कबाड़ बनकर रह जाता है। इस कबाड़ को निपटाने की प्रक्रिया में पर्यावरण को कितना नुकसान होता है, इस पर हम शायद ही कभी गंभीरता से विचार करते हैं।

आज स्थिति यह है कि इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं बहुत तेजी से ई-वेस्ट में बदल रही हैं। इससे मैन्युफैक्चरर्स को तो लाभ हो रहा है, क्योंकि बिक्री बढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर ई-वेस्ट का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है।

ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर में लगभग 62 मिलियन मेट्रिक टन ई-वेस्ट पैदा हुआ, जिसमें से एक चौथाई से भी कम हिस्सा ही रीसायकल हो सका। अधिकांश उपकरण मामूली-सी खराबी के कारण ही फेंक दिए जाते हैं। यूरोपीय एनवायरनमेंटल ब्यूरो के एक शोध के अनुसार, यदि हम अपने स्मार्टफोन को केवल एक वर्ष अधिक उपयोग में लें, तो उसके कार्बन फुटप्रिंट में लगभग 30% तक की कमी लाई जा सकती है। यह आंकड़ा अपने आप में सोचने पर मजबूर करता है।

यदि हमें वास्तव में पर्यावरण बचाना है, तो रिपेयरिंग की संस्कृति को फिर से जीवित करना ही होगा। इसके लिए सरकार को भी आने वाली पीढ़ियों के हित में ठोस कदम उठाने होंगे। साथ ही, हम सभी को अपनी मानसिकता बदलनी होगी।

एक ओर हमारे देश के युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं, और दूसरी ओर रिपेयरिंग जैसे हुनर वाले पेशों में लोगों की भारी कमी है। क्यों न हम एक ऐसी मुहिम शुरू करें, जिसमें बेरोजगार युवाओं को रिपेयरिंग की स्किल सिखाई जाए, ताकि अधिक से अधिक वस्तुओं को दोबारा उपयोग में लाया जा सके। स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में पहल कर सकती हैं और सरकार भी प्रशिक्षण, प्रोत्साहन व संसाधनों के माध्यम से बड़ा योगदान दे सकती है।

कुछ यूरोपीय देशों के उदाहरण इस संदर्भ में प्रेरक हैं। स्वीडन में रिपेयरिंग सेवाओं पर वैट कम कर दिया गया, ताकि लोग रिपेयर को प्राथमिकता दें। रवांडा में कम्युनिटी रिपेयर हब्स बनाए गए, जिससे ई-वेस्ट के आयात में कमी आई। कुछ देशों में तो रिपेयरिंग पर सीधी सब्सिडी भी दी जा रही है।

सच तो यह है कि बुजुर्गों को “थ्रो अवे” कल्चर कभी रास ही नहीं आया। आज भी किसी बुजुर्ग से बात कर लीजिए—चाहे कपड़े हों या घरेलू उपकरण—उनका पहला सवाल यही होता है, “इसे रिपेयर क्यों नहीं कर लेते?” यह सोच केवल बचत की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की सोच है।

यदि सरकार, समाज और आम नागरिक मिलकर उन युवाओं को प्रोत्साहन दें जो इस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हम एक बड़ा कदम उठा सकते हैं। हर शहर में छोटे-छोटे उद्यम खड़े हो सकते हैं, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

हो सकता है कि बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को इससे कुछ असुविधा हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण की रक्षा आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

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