We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Thursday, November 13, 2025

कभी हम क्लासरूम में एक साथ बैठते थे!

याद है वो दिन—कोई पचास-साठ वर्ष पहले—जब हम सब एक ही क्लासरूम में बैठते थे। लकड़ी की बेंचें, ब्लैकबोर्ड, चॉक की हल्की सी धूल और घंटी की आवाज़ — बस यही तो था हमारा संसार। हमारे क्लासरूम में कोई चालीस बच्चे होते थे। आज के जमाने में तो शिक्षा विभाग नियम बनाता है कि एक कक्षा में इतने से अधिक विद्यार्थी नहीं होने चाहिए, वरना स्कूल की मान्यता ही खतरे में पड़ जाएगी। पर तब किसी को इन बातों की परवाह नहीं थी। शायद आज के मापदंड से ज्यादा बच्चे थे क्लासरूम में, पर अपनापन भी उतना ही था। और हां, उन दिनों ज्यादातर लड़को और लड़कियों के लिए अलग अलग स्कूल होती थी।

हम सब एक जैसी यूनिफॉर्म पहनते थे — खाकी पैंट और सफेद शर्ट। लंच ब्रेक में टिफिन बॉक्स खुलते ही पूरा क्लासरूम खुशबू से भर जाता। किसी के डिब्बे में पराठा, किसी के में इडली या पूरी-सब्जी। एक-दूसरे का खाना चखना, मजाक में डिब्बा छिपाना — यही तो हमारी दोस्ती की मिठास थी। और फिर, छुट्टी की घंटी बजते ही सब अपने-अपने घर की ओर निकल जाते, लेकिन जाते-जाते “कल मिलते हैं!” जरूर कहते।

उस वक्त किसे मालूम था कि यह “कल” धीरे-धीरे कितने सालों के फासले में बदल जाएगा!

वो क्लासरूम जहां लकड़ी की बेंचें थीं, चॉक की खुशबू थी और दोस्ती की सादगी। वक्त बदला, पर वो अपनापन आज भी दिल में है। कभी हम सब उसी एक ही क्लासरूम में बैठते थे — अब बस तस्वीरों में वो पल मुस्कुराते हैं। क्लासरूम ने सिखाया था — साथ चलना ही असली सफलता है। वही सीख आज भी जीवन का आधार है।

वो बच्चे, जो एक साथ बेंच पर बैठकर एक ही शिक्षक से पढ़ाई करते थे, आज जिंदगी के अलग-अलग मोड़ों पर हैं। कोई डॉक्टर बना, कोई इंजीनियर, कोई सरकारी अफसर, कोई व्यापारी। कुछ ने अपने घर-परिवार के लिए संघर्ष किया, कुछ ने ऊंचे पद हासिल किए। और कुछ को जीवन ने ऐसी चुनौतियों के सामने ला खड़ा किया जिनका सामना करना आसान नहीं था।

कभी-कभी सोचता हूं — एक ही किताबें पढ़ीं, एक ही सवालों के जवाब लिखे, एक ही स्कूल की दीवारों के भीतर बड़े हुए — फिर भी जिंदगी ने सबको इतनी अलग राहों पर क्यों भेज दिया? क्या यह केवल भाग्य का खेल था? या फिर सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता ने हमें अलग-अलग मंजिलों तक पहुंचाया? सच तो यह है कि जीवन एक परीक्षा-कक्ष ही है — बस फर्क इतना है कि इसमें न कोई निर्धारित सिलेबस है, न कोई तय तारीख। यहां हर व्यक्ति का प्रश्नपत्र अलग है। और यहां पास या फेल होने की परिभाषा भी हर किसी की अपनी होती है। किसी के लिए सफलता एक बड़ा पद है, तो किसी के लिए एक सुसंस्कृत परिवार या संतोषपूर्ण मन।

आज जब पुराने सहपाठियों की बातें होती हैं — किसी रीयूनियन में, या सोशल मीडिया पर मिलने पर — तो एक अजीब सी अनुभूति होती है। कुछ चेहरे पहचान में आ जाते हैं, कुछ बदले हुए दिखते हैं। कोई अब भी वही चंचल मुस्कान लिए बैठा है, तो कोई जीवन के अनुभवों से गहराई लिए हुए।

हम सब समय के सांचे में ढलकर अब वरिष्ठ जनों की श्रेणी में पहुंच चुके हैं — सफ़ेद बालों और झुर्रियों के साथ, पर मन अब भी वही बालपन ढूंढ़ता है। कभी-कभी मन करता है कि फिर एक दिन वही क्लासरूम मिले। वही बेंचें, वही ब्लैकबोर्ड, और वही दोस्त। पर अब यह संभव नहीं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया है — स्कूल भी, शहर भी, और हम भी। फिर भी यादें हैं कि मिटती नहीं। वे ही तो हमारी पूंजी हैं।

आज के बच्चे शायद कभी न समझ पाएं कि उस दौर की सादगी में कितनी मिठास थी। न मोबाइल थे, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया — फिर भी हर खबर, हर दोस्ती, हर भावनात्मक जुड़ाव एकदम असली था। आज हम सब जीवन के अनुभवों से भरे हुए हैं। शायद यही उचित समय है कि उन बचपन के दिनों से मिली सीख को, उस सादगी और मिलनसारिता को, अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।

क्लासरूम में बैठने की उस एकता ने हमें यह सिखाया था कि समाज भी एक बड़ा क्लासरूम है — जहां हर किसी को साथ लेकर चलना ज़रूरी है। किसी को पीछे छोड़ देने से सफलता अधूरी रह जाती है। और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा पाठ है — जो उस पुराने स्कूल की दीवारों ने हमें बिना बताए सिखा दिया।

आज, जब कभी पुराने सहपाठियों की तस्वीरें देखता हूं या किसी का संदेश आता है — तो मन कह उठता है, “कभी हम क्लासरूम में एक साथ बैठते थे!” वो साथ अब नहीं है, पर वो अपनापन, वो यादें, वो मासूमियत — आज भी हमारे भीतर जिंदा हैं। और शायद इसी को कहते हैं — वक्त बदल जाता है, पर बचपन कहीं नहीं जाता।

न डॉक्टर, न इंजीनियर — मुझे तो दादा बनना है

हाल ही में एक बेहद दिलचस्प व्हाट्सएप संदेश देखा। एक छोटे बच्चे से पूछा गया कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। जवाब चौंकाने वाला था —

मैं न डॉक्टर बनना चाहता हूं, न इंजीनियर, न अफसर और न मंत्री… मुझे तो दादा बनना है!

और उसके पास इसके पीछे ठोस कारण भी थे। उसने बताया कि दादा जी जब चाहें तब उठते हैं, जब चाहें तब सो जाते हैं। टीवी देखना हो तो किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ती। उन्हें स्कूल नहीं जाना पड़ता, न होमवर्क करना पड़ता है। बस या ट्रेन में भी उन्हें विशेष सहूलियत मिलती है। वे जो चाहें कर सकते हैं, कोई रोक-टोक नहीं!

मैसेज की भाषा और उदाहरणों से लगता था कि यह किसी पश्चिमी देश — अमेरिका या यूरोप — की सोच पर आधारित है। परंतु यह सवाल मन में आया कि क्या भारतीय परिवेश में भी ऐसा ही उत्तर कोई बच्चा दे सकता है? संभवतः बहुत कम बच्चे ऐसा कहेंगे, लेकिन अगर कहें भी, तो उनके कारण कुछ भिन्न होंगे। आखिर बच्चे वही देखते और सीखते हैं जो वे अपने घर में, अपने बड़ों के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।

हमारे आचरण से बनती है अगली पीढ़ी की सोच

हम बुजुर्ग अपने घर के बच्चों के सामने कैसे रहते हैं, कैसी दिनचर्या अपनाते हैं, दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं — यह सब बच्चों पर गहरा प्रभाव डालता है। बच्चे केवल स्कूल की किताबों से नहीं सीखते; बहुत कुछ वे हमें देखकर, हमारे आचरण से सीखते हैं। हमारे शब्दों से ज़्यादा असर हमारे व्यवहार का होता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी संस्कारवान, अनुशासित और जीवन का आनंद लेने वाली बने — तो हमें वह जीवन स्वयं जीना होगा।

बिना उपदेश दिए भी सिखाने का एक तरीका

यह हमारे लिए एक अद्भुत अवसर है कि हम अपने आचरण के माध्यम से बच्चों में जीवन मूल्यों के बीज बो सकें — बिना सीधे उपदेश दिए। अगर हम रोज सुबह टहलने जाते हैं, व्यायाम करते हैं और कभी-कभी सहजता से बच्चों से यह साझा करते हैं कि “हमारा स्वस्थ रहना इसी नियमितता का परिणाम है,” तो हमें उन्हें अलग से समझाने की ज़रूरत नहीं। वे सब देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं।

यह संदेश उनके मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाता है। हो सकता है कि वे तुरंत इस पर अमल न करें, लेकिन समय आने पर वही संस्कार उनके जीवन का हिस्सा बन जाएंगे।

पूजा, पाठ और आध्यात्मिकता की सहज छाप

इसी तरह जब हम नित्यकर्म के बाद भगवान के सामने शांत भाव से बैठते हैं, प्रार्थना करते हैं या रामायण–महाभारत की कथा सुनाते हैं, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। यह वही समय है जब हम उन्हें कहानियों के माध्यम से धर्म, कर्तव्य, साहस और त्याग जैसे गुणों की सहज सीख दे सकते हैं। यह पाठ्यक्रम से नहीं, वातावरण से सिखाने की प्रक्रिया है — और यह सबसे प्रभावशाली है।

ज्ञान और जिज्ञासा की साझी खिड़की

हर सुबह जब हम अख़बार पढ़ते हैं, तो किसी विशेष समाचार पर बच्चों से चर्चा करना उपयोगी हो सकता है। इससे उनका सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, और साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि दुनिया को समझने के लिए केवल सोशल मीडिया पर्याप्त नहीं। उन्हें यह समझाना कि “पढ़ने की आदत” केवल ज्ञान ही नहीं, भाषा और सोच को भी निखारती है — यह भी एक मूल्यवान सीख है।

संस्कार जो बोलते नहीं, दिखते हैं

घर में जब कोई अतिथि आते हैं, तो बच्चों को बुलाकर उनका अभिवादन कराना, पैर छूकर आशीर्वाद लेना सिखाना — ये सब बातें धीरे-धीरे उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं। थोड़े समय में उन्हें बताने की आवश्यकता ही नहीं रहती; वे अपने आप ऐसा करने लगते हैं।

यही तो संस्कार हैं — जो शब्दों से नहीं, व्यवहार से संप्रेषित होते हैं।

दादा-दादी की भूमिका — अमूल्य और अपूरणीय

आज के तेज रफ्तार युग में जहां माता-पिता अक्सर व्यस्त रहते हैं, वहां दादा-दादी बच्चों के लिए सबसे स्थिर, धैर्यवान और स्नेहमय उपस्थिति होते हैं। उनके पास अनुभव है, समय है और वह आत्मिक शांति है जो बच्चों को सुरक्षा का अहसास कराती है। उनकी मुस्कान, उनका सान्निध्य, और उनका प्यार — ये सब मिलकर बच्चों के व्यक्तित्व की नींव तैयार करते हैं।

शायद इसी कारण वह बच्चा कहता है — “मुझे तो दादा बनना है।” क्योंकि उसे दादा में आजादी दिखती है, स्नेह दिखता है, और सबसे बढ़कर, एक संतुलित जीवन जीने की कला दिखती है। वह जानता है कि डॉक्टर और इंजीनियर बनना भी सम्मानजनक है, पर दादा बनना — यानी जीवन के उस मुकाम पर पहुंचना जहां ज्ञान, अनुभव और प्रेम एक साथ झरते हैं — यह तो सर्वोच्च सम्मान है।

कहने का सार यही है —

बच्चे वही बनते हैं जो वे देखते हैं। हमारे चेहरे पर मुस्कान, हमारे आचरण में शांति, और हमारे जीवन में अनुशासन — यही उनकी सबसे बड़ी शिक्षा है। अगर हम सचमुच चाहते हैं कि अगली पीढ़ी हमें देखकर कहे “मुझे भी दादा बनना है”, तो हमें वैसा दादा बनना होगा — जो प्रेरणा दे, जो प्रेम दे, और जो जीवन को सुंदर ढंग से जीना सिखाए।

All my articles in English are also posted on website www.neversayretired.in

छोटों के सामने अपने जमाने की बात कम ही करें

हम उम्र के लोगों के साथ बैठने का एक अपना ही आनंद होता है। पुरानी यादें, भूले-बिसरे किस्से, साझा अनुभव — सब एक बार फिर से जीवंत हो उठते हैं। उन पलों में जैसे ज़िंदगी फिर से अपने सुनहरे पन्ने पलटने लगती है। अपने-अपने दौर की बातें सुनाते हुए जब हंसी के ठहाके गूंजते हैं, तो लगता है जैसे समय थम गया हो।

ऐसी बैठकों में बस इतना ध्यान रखना जरूरी है कि बातचीत एकतरफा न हो जाए। ग्रुप में सभी को अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी अभिव्यक्ति की शैली होती है — कोई खुलकर बोल देता है, कोई भीतर ही भीतर संकोच में रह जाता है। अगर हम लगातार बोलते ही चले जाएं, तो कई लोग मन की बात कहने से चूक जाते हैं।

यह भी सच है कि इस उम्र में आकर हममें से बहुत से लोग बातें दोहराने लगते हैं। कोई कम, कोई ज़्यादा — पर यह स्वाभाविक है। इसके पीछे कई कारण हैं। एक तो स्मृति का थोड़ा कमजोर होना, और दूसरा यह कि हमें यकीन नहीं होता कि हमारी कही बात सामने वाले ने सचमुच सुनी या समझी भी है या नहीं। इसलिए कभी-कभी वही बात फिर कह देते हैं।

लेकिन जब हम अपने परिवार के युवा सदस्यों या अन्य छोटों के बीच होते हैं, तो वहां यह स्वाभाविकता थोड़ी सावधानी मांगती है। आज की पीढ़ी की सोच तेज, अभिव्यक्ति मुखर और समय सीमित है। उनमें उतनी सहनशीलता नहीं है कि वे बार-बार दोहराई गई बातें धैर्य से सुनें। यदि आपने एक ही बात दो बार कह दी, तो वे तुरंत टोक देंगे — “आप यह पहले भी बता चुके हैं!” उन्हें यह नहीं सूझता कि दोहराना किसी हठ का नहीं, बल्कि उम्र का स्वाभाविक असर है।

छोटों के साथ बैठते समय एक और बात याद रखनी चाहिए — “हमारे ज़माने में ऐसा होता था” जैसी बातें ज्यादा न कहें। यह वाक्य अक्सर हमारे मुंह से सहज ही निकल जाता है, पर यह युवा मन को दूरी का एहसास कराता है। जब वे अपनी कोई नई बात या अनुभव साझा करते हैं और हम तुरंत अपने दौर की तुलना करने लगते हैं, तो उन्हें लगता है कि हम उनकी बात को कमतर आंक रहे हैं। वे भले कुछ कहें नहीं, पर भीतर से चिढ़ जरूर जाते हैं।

दरअसल, पूरी बात ‘कैसे’ कही जाती है, यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि ‘क्या’ कहा जा रहा है। टोन का ही तो सारा खेल है। वही बात अगर हम सहज, स्नेहपूर्ण लहजे में कहें, तो सामने वाला सहर्ष स्वीकार कर लेता है। लेकिन जरा-सा भी आदेशात्मक या ऊंचे स्वर में कहा गया वाक्य, मन पर चोट कर जाता है।

घर के भीतर तो यह और भी ज्यादा मायने रखता है। कई बार हम भावनाओं में बहकर कह बैठते हैं — “मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ किया, और आज…” या “मैं बड़ा हूं, इसलिए मुझे ज़्यादा पता है।” हमें लगता है कि हम सच्चाई कह रहे हैं, पर सुनने वाले को यह ताना या दोषारोपण जैसा लगता है। बच्चे तब चुप हो जाते हैं, पर दिल से दूरी बढ़ जाती है।

यह भी जरूरी है कि हम हर वक्त उन्हें सीख देने या सुधारने की कोशिश न करें। सुझाव देना अच्छी बात है, पर यह उम्मीद न रखें कि हर सुझाव को तुरंत माना जाएगा। अगर कोई नहीं भी माने, तो बुरा मानने की जरूरत नहीं है। आखिर आज के बच्चे अपनी दुनिया अपने ढंग से बना रहे हैं, जैसे हमने अपने समय में की थी। हमारा अनुभव उनके लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन यह उन पर थोपना नहीं चाहिए।

यह संतुलन ही रिश्तों की मिठास बनाए रखता है। हमें अपने जीवन के अनुभवों का बोझ नहीं, बल्कि प्रकाश बांटना है। युवाओं के सामने हमारी भूमिका एक समझदार मार्गदर्शक की होनी चाहिए, न कि ‘हमेशा सही रहने वाले’ बुजुर्ग की।

एक और बात — चाहे हालात जैसे भी हों, हमें अपने मन में किसी प्रकार की ग्लानि नहीं रखनी चाहिए। यह भावना कि “अब मेरी बात की किसी को आवश्यकता नहीं” या “अब मेरी अहमियत कम हो गई है” — यह मन को कमजोर करती है। उम्र बढ़ने के साथ आत्मसम्मान और सकारात्मक दृष्टि बनाए रखना सबसे बड़ी बात है।

विशेषज्ञ भी कहते हैं कि बुजुर्गों को बातचीत करते रहना चाहिए। बातें करना मन को हल्का रखता है, स्मृति को सक्रिय रखता है, और सामाजिक जुड़ाव बनाए रखता है। पर साथ ही, यह भी ध्यान रखना है कि बातचीत में मिठास, मर्यादा और लचीलापन बना रहे।

हर पीढ़ी की अपनी गति और दृष्टि होती है। हमारी पीढ़ी ने जो देखा और जिया, वह उनके लिए इतिहास है; और जो वे देख रहे हैं, वह हमारे लिए नया अनुभव है। अगर दोनों एक-दूसरे को सुनें, समझें और सम्मान दें, तो अनुभव और उत्साह का सुंदर संगम बन सकता है।

अंततः यही संतुलन हमें रिश्तों को सहेजने और खुद को भीतर से संतुलित रखने में मदद करता है:

बातें करें, पर ध्यान से; साझा करें, पर थोपें नहीं; और सबसे बढ़कर, सुनना न छोड़ें।

सभी लेख वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। अंग्रेजी मैं भी सारे लेख वेबसाइट पर पोस्ट किये गये हैं।
www.neversayretired.in

 

Monday, October 20, 2025

Does Time Drag or Fly in Old Age? The Choice Is Ours

As age advances, a question often arises – does time drag on endlessly, or is there no time left at all? This dilemma is present in some form in nearly every senior citizen’s life. Interestingly, the answer depends entirely on one’s mindset and lifestyle.

Some seniors organize their daily routines so well that they remain occupied throughout the day. Their schedule leaves no room for idleness. From the moment they wake up until they go to bed, they stay active. The focus of these activities is not just themselves, but also the desire to contribute to family, friends, and society. This positive outlook keeps them busy and cheerful at every moment.

I have a friend who will soon turn 78. What is remarkable about him is that his calendar is already filled with engagements for the next three months, most of which are dedicated to social service. By the grace of God, he is financially secure and has now resolved to devote the rest of his life, as much as possible, to serving society. This busyness, this spirit of service, is the secret of his good health and mental vitality.

Such examples not only inspire but also prove that even in old age, life can be made meaningful and energetic. If we nurture the belief within ourselves that age is just a number, and that every day we must find ways to be useful, then we experience a shortage of time, not a sense of emptiness.

But there is another side to the picture. In society we also find seniors who are often heard saying, “Time just doesn’t pass.” Their days seem long and tiresome. Usually, such people confine their world to a very narrow circle. Their thoughts revolve constantly around their own difficulties, their own past, and their own needs. Gradually, their perspective becomes limited. Whenever such individuals experience even a slight discomfort or illness, their entire attention becomes centered on it. As a result, they start to feel the illness even more intensely.

Many doctors also say that the more one focuses on an ailment, the more troubling it becomes. In contrast, if persons keep themselves engaged in some positive activity, minor ailments often fade into the background.

This raises an important question – why is there such a stark difference between the two types of seniors? The answer is simple: outlook and mindset.

Those who have a goal view their age as an opportunity. They believe that every stage of life brings something new with it. If the post-retirement years are seen as a time of “emptiness,” it feels burdensome. But if that same time is spent in social service, hobbies, interaction with friends, and guiding the family, it becomes golden.

Seniors also often have the unique opportunity to act as mentors for the younger generation. In today’s fast-paced, technology-driven world, the youth sometimes lack patience and experience. In such times, seniors can share their wisdom to help them find balance and perspective. This role makes their presence even more valuable.

On the other hand, if a senior isolates themselves, distances from society, or becomes absorbed only in their ailments, life becomes difficult not only for them but also for their family and friends.

That is why it is essential that as we grow older, we also broaden our outlook. We must ask ourselves: “Did I bring a smile to someone’s face today? Did I use my experience to guide someone?” Such questions help keep us active and enthusiastic throughout the day.

Staying engaged is not merely a physical act; it is also the foundation of mental and emotional well-being. When a person is busy, self-confidence grows, negativity does not take root, and a sense of satisfaction toward life emerges.

This golden phase of life should not be seen as a burden, but as a blessing. Whatever opportunities come our way, we must make the best use of them. Remember – time never stands still, it keeps flowing. The only difference lies in how we choose to see it – as emptiness or as opportunity.

Good Footpaths Can Give Better Health to Seniors

 Footpaths are not just stretches of stone or concrete. They are, in fact, pathways to health, independence, and dignity. For senior citizens especially, they can make the difference between an active lifestyle and one confined indoors. If our cities had good, safe, and well-illuminated footpaths, with occasional benches to rest, the health of citizens—particularly the elderly—would improve remarkably. The quality of life in their golden years would be more secure, graceful, and fulfilling. In short, we need to completely redesign the way we look at ageing and the spaces in which our seniors live.

I recently came across a report on Singapore that illustrates this point beautifully. Authorities there introduced several measures to encourage elders to walk. The results were outstanding. Today, an average Singaporean walks more than 10,000 steps a day. This is not accidental—it is the outcome of thoughtful urban planning that gives importance to pedestrian comfort and safety. Contrast this with India, where sadly, even youngsters walk very little. The difference lies not in motivation but in the environment that is created. If you provide safe, shaded, and pleasant spaces, people will naturally walk.

Doctors often tell us that “walking is the best exercise.” But many seniors tend to believe that when they walk slowly, or when their legs feel weak, it is due to paralysis or some serious illness. The reality is different. In most cases, it is muscle degeneration caused by inactivity. Medicines may help, but they are not the complete solution. The true remedy is movement—consistent, gentle, daily walking. For this, well-maintained footpaths are critical. They act as free, open-air gyms for all, and especially for elders who may not be able to afford or access fitness clubs.

Whenever we see movies shot abroad, we notice the wide, clean, and inviting footpaths. People stroll comfortably, children run freely, and the elderly walk with dignity. Such scenes evoke a silent longing—why can’t our cities be like that? Walking in such environments is not a chore but a pleasure. In fact, one often ends up walking more than planned, simply because the surroundings encourage it.

There are examples in India that point the way. In Puducherry, for instance, one of the main beach roads is closed to vehicles during morning and evening hours. During these times, hundreds of people take to walking—young, old, tourists, locals. The joy of walking without the fear of traffic is visible on their faces. Some cities have developed riverfronts or lakefronts for similar purposes. These are welcome initiatives, but the truth remains that the majority of Indian cities lack such pedestrian-friendly spaces. Parks exist in some localities, but not all. For most people, the humble footpath is the only accessible and practical walking area.

Morning and evening walks are frequently recommended for elders by doctors, and we receive countless WhatsApp forwards praising their benefits. Yet, how realistic is this advice without safe spaces to walk? An uneven, encroached, or unlit footpath can turn a healthy habit into a dangerous risk. On the other hand, a well-designed footpath allows an elder to step out confidently—not just for exercise, but even for small errands. Walking to the local market for vegetables or to meet a neighbor eliminates the need for auto-rickshaws or personal vehicles. Such simple acts add movement to daily life, helping keep muscles strong and spirits high.

Of course, the responsibility does not rest with the government alone. Civic sense among citizens is equally important. How many of us take the trouble to complain when a footpath is broken, when a streetlight is not working, or when a footpath is encroached by shopkeepers? How often do we collectively raise such issues with municipal authorities? A lone complaint may not achieve much, but when a Resident Welfare Association or a housing society submits a joint representation, action usually follows. Community effort has power, but it needs awareness and initiative.

Equally, citizens must use footpaths responsibly. Shopkeepers must not encroach upon them. Pedestrians must not throw trash or spill construction debris on them. Even when dustbins are provided, many of us ignore them. The irony is that we expect international standards but neglect the basics of civic discipline. If we want world-class infrastructure, our behavior must match it too.

This is where leadership matters. Just as Prime Minister Narendra Modi’s clarion call for Swachhata Abhiyan transformed the way Indians looked at cleanliness, a similar nationwide movement can be launched for walkable, safe, and illuminated footpaths. A prime ministerial appeal carries weight—it can influence municipal bodies, local governments, and also awaken public consciousness. A national campaign around footpaths could easily become a campaign for health, dignity, and longevity, especially for our elders.

Good footpaths are not a luxury; they are a necessity. They are the simplest and most democratic form of health infrastructure available to all. They require investment, yes, but far less than the medical costs of treating diseases caused by inactivity. A senior who can walk daily is less likely to develop lifestyle diseases, less dependent on family members, and more mentally and socially engaged. The benefits ripple outwards—to families, to communities, and to the nation.

India is ageing. By 2050, more than 300 million Indians will be over 60. If we do not redesign our cities with seniors in mind today, we will face an unhealthy, isolated, and immobile elderly population tomorrow. But if we act now—creating cities where footpaths are broad, clean, shaded, and safe—we will gift our elders years of health, dignity, and joy.

Good footpaths, then, are not just about urban design. They are about creating a society that values its seniors, respects their needs, and allows them to live their golden years with pride. Let us begin with something as simple as a walk.

मित्रता, वरिष्ठजन की सबसे बड़ी पूंजी

पिछले दो वर्षों में मैंने मित्रता और वृद्धावस्था में उसकी अनिवार्यता पर दो लेख लिखे हैं। आज एक बार फिर उसी विषय पर लिखने की प्रेरणा मिली। इस बार कारण बनी एक खबर, जिसे मैंने एक व्हाट्सऐप ग्रुप में पढ़ा। एक प्रतिष्ठित अमेरिकी बिज़नेस पत्रिका ने बताया कि 1990 की तुलना में आज चार गुना अधिक अमेरिकी वयस्क ऐसे हैं, जो कहते हैं कि उनके कोई घनिष्ठ मित्र नहीं हैं। वहीं, जिन लोगों के दस से अधिक मित्र थे, उनकी संख्या भी तेज़ी से घट रही है।

ये आंकड़े भले अमेरिका के हों, लेकिन सच्चाई भारत में भी अलग नहीं है। अगर हम अपने आसपास नजर डालें तो यही तस्वीर धीरे-धीरे हमारे समाज में भी दिखने लगेगी। कभी जीवनभर साथ निभाने वाली दोस्ती, जो विश्वास, अनुभव और सहयोग पर टिकी होती थी, अब अक्सर केवल सुविधा और लाभ का साधन बनती जा रही है।

आधुनिक समय की दोस्ती

आज की युवा पीढ़ी में कई रिस्ते अक्सर किसी न किसी लेन-देन पर आधारित दिखते हैं। कोई पार्टी में साथ देने वाला है, कोई व्यापार में सहायक, तो कोई नौकरी से जुड़े फायदे का कारण। ये रिश्ते थोड़े समय तक साथ देते हैं, लेकिन जीवन की लंबी यात्रा में टिके रहना कठिन होता है।

सोशल मीडिया ने नए दोस्त बनाने को आसान ज़रूर कर दिया है, परंतु यह आसान तरीका गहराई से रहित भी है। हर दिन नए “फ्रेंड” बन सकते हैं, लेकिन ज़रूरी यह है कि कितने लोग कठिन समय में कंधा देने को तैयार होंगे? सूची में दर्ज सैकड़ों नामों से कहीं अधिक मायने उस एक पुराने मित्र के हैं, जो बरसों से हमारे सुख-दुःख में साथ रहा हो।

यह सवाल हम सभी से है: आज भी कितने लोग अपने बचपन या कॉलेज के दोस्तों से जुड़े हुए हैं? क्या हम समय-समय पर उनका हालचाल लेते हैं, या धीरे-धीरे इन पुराने रिश्तों को भूल चुके हैं?

पुरानी दोस्ती की खूबसूरती

वरिष्ठ पीढ़ी की दोस्ती आज भी अलग ही नज़र आती है। कितने ही लोग ऐसे मिल जाते हैं जिनकी मित्रता बचपन से लेकर सात-आठ दशक तक निभी आ रही है। यह रिश्ता समय के साथ परिपक्व होता है और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में स्थिर रहता है।

कभी मतभेद हुए होंगे, कोई दूर भी चला गया होगा, लेकिन धैर्य, क्षमा और जुड़ाव की इच्छा ने इस बंधन को जीवित रखा। ऐसे रिश्ते केवल तब टूटते हैं जब कोई मित्र इस दुनिया को छोड़कर चला जाए।

बुजुर्गों के लिए यही मित्र जीवन का सहारा बनते हैं। परिवार छोटा हो रहा है, बच्चे दूर रहते हैं, तब यही पुराने साथी हंसी के पल बांटते हैं, दुख के समय दिलासा देते हैं और जीवन की लंबी कहानियों को फिर से जीवंत करते हैं।

सिमटता परिवार, बढ़ती जरूरत

आज परिवार का ढांचा बदल रहा है। संयुक्त परिवार अब दुर्लभ हैं। ऐसे में बुढ़ापे के वर्ष अक्सर एकाकीपन से भर जाते हैं।

यहीं मित्रता की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। मित्र परिवार का विकल्प नहीं, लेकिन सहारा ज़रूर बनते हैं। वे बिना किसी अपेक्षा के साथ खड़े रहते हैं, बिना किसी दबाव के सुनते हैं और बिना किसी शर्त के हँसाते हैं।

युवाओं के लिए संदेश

यह समझना बेहद ज़रूरी है कि सच्ची मित्रता एक दिन में नहीं बनती, न ही अचानक गहरी हो जाती है। इसे सींचना पड़ता है—धैर्य से, सहानुभूति से, क्षमा और अपनत्व से।

जब कोई वृद्धावस्था में पहुंचता है, तब नई गहरी मित्रता बनाना लगभग असंभव हो जाता है। हर व्यक्ति अपनी आदतों और जीवन-शैली में ढल चुका होता है, नए रिश्तों में सामंजस्य बैठाना कठिन हो जाता है।

इसलिए युवाओं से मेरा आग्रह है: अच्छे मित्र आज ही बनाइए। उन्हें समय दीजिए। व्यस्तताओं के बावजूद संपर्क बनाए रखिए। केवल उत्सव ही नहीं, कठिनाई में भी साथ खड़े रहिए। नए मित्र बनाइए, परंतु पुराने मित्रों को संजोकर रखिए। यही दोस्त आपके सुनहरे वर्षों की असली पूंजी होंगे।

शायद इसी सत्य को ध्याम में रखकर कहा गया हैं कि “हमें बूढ़े होने में सहायता के लिए पुराने मित्रों की आवश्यकता होती है और जवान बने रहने में सहायता के लिए नए मित्रों की।

Monday, September 22, 2025

वरिष्ठ जन की चिंता – सिकुड़ता परिवार

 हाल ही में व्हाट्सएप पर एक मजेदार, लेकिन सोचने पर मजबूर कर देने वाला वीडियो देखने को मिला। वीडियो को हास्य के रूप में प्रस्तुत किया गया था, परंतु इसके भीतर छिपा संदेश हमारे समाज की गंभीर समस्या को उजागर करता है। इसमें दिखाया गया कि एक देवी जी ने दुकान खोली है, जहां पीछे बैनर लगा है – “यहां रिश्तेदार भाड़े पर मिलते हैं।”

एक कपल जिनके घर में बेटे की शादी होने वाली है, को अपने समारोह को सफल बनाने के लिए रिश्तेदार चाहिए, लेकिन उनके पास वास्तविक रिश्तेदार नहीं हैं, और वो पहुंच जाते है इस दुकान पर। देवी जी की इस दुकान में हर प्रकार के रिश्तेदार उपलब्ध हैं – फूफा, मासी, बुआ, चाचा – सभी किराए पर, और सबकी अपनी-अपनी दरें।

पहली नजर में यह दृश्य हंसी पैदा करता है, लेकिन जब गहराई से देखें तो यह हमारे परिवारिक ढांचे की बदलती हकीकत को सामने लाता है। कभी भारतीय समाज में संयुक्त परिवार उसकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करते थे।

परिवार केवल माता-पिता और बच्चों तक सीमित नहीं था, बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची, मामा-मामी, बुआ-मासी और उनके बच्चों तक फैला हुआ होता था। इन रिश्तों की मिठास ही परिवारों की असली पूंजी थी। लेकिन समय के साथ हमने “हम दो, हमारे दो” को अपनाया और धीरे-धीरे परिवार छोटे होते चले गए।

आज की स्थिति यह है कि बच्चे यह भी पूछने लगे हैं कि मासी या बुआ होती कौन है। क्योंकि घर में उन्हें ये रिश्ते देखने को ही नहीं मिलते। चचेरे और ममेरे भाई-बहनों की परंपरा लगभग समाप्ति की ओर है। अगली पीढ़ी के लिए यह रिश्ते किताबों या फिल्मों में ही रह जाएंगे।

इसका एक कारण बदलती जीवनशैली और सोच भी है। आज के युवा देर से विवाह करना पसंद करते हैं। करियर और आर्थिक स्थिरता पाने की होड़ में विवाह टलते-टलते तीस की उम्र पार कर जाते हैं। फिर जब शादी होती भी है, तो बच्चे पैदा करने में भी संकोच रहता है। “एक ही काफी है, और न भी हुआ तो भी चलेगा” – यह सोच बहुत आम हो गई है।

इसके पीछे कई कारण हैं:

  1. नौकरी प्रधान मानसिकता – पहले परिवार के लोग कृषि या व्यवसाय से जुड़े रहते थे, जहां परिवार बड़ा होना सहायक सिद्ध होता था। लेकिन अब अधिकतर लोग नौकरी पर आश्रित हैं। नौकरी में समय और अवसर सीमित रहते हैं, जिससे बड़े परिवार की कल्पना ही कठिन हो जाती है।
  2. शिक्षा और खर्च का दबाव – आज की शिक्षा बेहद महंगी है। एक बच्चे की पढ़ाई का खर्च ही माता-पिता की कमाई का बड़ा हिस्सा ले लेता है। ऐसे में दूसरा बच्चा पालना आर्थिक जोखिम जैसा लगता है।
  3. स्वास्थ्य पर असर – देर से विवाह करने और मातृत्व-पितृत्व टालने से स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं। फर्टिलिटी की समस्याएं अब युवाओं में भी आम होती जा रही हैं। यही वजह है कि गंभीर बीमारियां भी जल्दी आ घेरती हैं।

इन सब कारणों से परिवार छोटा ही नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी सिकुड़ता जा रहा है। रिश्तों की गर्माहट, सामूहिकता की शक्ति और पारिवारिक सहयोग – ये सब धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। पहले शादी-ब्याह, त्यौहार या संकट के समय पूरा परिवार साथ खड़ा होता था। अब कई घरों में यह जिम्मेदारी केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित रह गई है। बुजुर्ग माता-पिता अकेलापन महसूस करने लगे हैं, क्योंकि उनके आसपास अब वही भीड़भाड़ वाला परिवार नहीं रहा।

इसका समाधान क्या हो सकता है? क्या हम इस प्रवृत्ति को बदल सकते हैं?

समाजशास्त्री और चिंतक मानते हैं कि हमें फिर से परिवार की अहमियत समझनी होगी। संयुक्त परिवार भले ही आज के दौर में कठिन हो, लेकिन कम से कम रिश्तों को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि रिश्ते केवल खून के नहीं, बल्कि भावनाओं के बंधन से भी जुड़े होते हैं। त्योहारों पर रिश्तेदारों से मिलने जाना, बच्चों को दादी-नानी की कहानियां सुनाना, पारिवारिक आयोजनों में सबको शामिल करना – यह छोटी-छोटी बातें बड़े बदलाव ला सकती हैं।

साथ ही, सरकार और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। अगर शिक्षा और स्वास्थ्य का बोझ कम किया जाए तो लोग परिवार बढ़ाने के लिए अधिक सहज होंगे। धार्मिक और सामाजिक संगठन भी विवाह और परिवार की पवित्रता को लेकर जागरूकता फैला सकते हैं। मीडिया का दायित्व भी है कि वह परिवार के मूल्यों को हास्य या बोझ के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के आधार के रूप में प्रस्तुत करे।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह विशेष चिंता का विषय है। वे ही वह पीढ़ी हैं जिन्होंने बड़े परिवारों की रौनक देखी है। आज जब वे अपने बच्चों और पोते-पोतियों के बीच अकेले पड़ते जा रहे हैं, तो उन्हें सबसे अधिक पीड़ा होती है। इसलिए यह चर्चा केवल समाजशास्त्र या अर्थशास्त्र की नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की भी है।

यदि हमने समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए तो वह दिन दूर नहीं जब रिश्तेदार किराए पर मिलने की यह कॉमेडी वीडियो, हकीकत में बदल जाएगी। आने वाली पीढ़ियां पारिवारिक मूल्यों से वंचित हो जाएंगी और सामाजिक ढांचा और अधिक कमजोर हो जाएगा। इसलिए आज जरूरत है कि हम सब मिलकर परिवार के महत्व को पुनर्जीवित करें और रिश्तों की डोर को मजबूत बनाएं। यही हमारे समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।

बुजुर्गों को सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करें

मेरी एक भतीजी अक्सर मुझे सलाह देती है कि अब मुझे गाड़ी नहीं चलानी चाहिए। कहती है, “अब आप 78 साल के हो गए हैं, आपको ड्राइवर रखना चाहिए या Uber से चलना चाहिए।” दूर रहने वाली एक नातिन को जब पता चला कि मैं अब भी गाड़ी खुद चलाता हूं, तो वह हैरान रह गई।

हाल ही में फेसबुक पर एक पोस्ट देखी—92 साल के एक बुज़ुर्ग आत्मविश्वास से बता रहे थे कि वे आज भी गाड़ी चलाते हैं। मुझे खुशी हुई। क्योंकि मैं मानता हूं कि गाड़ी चलाना सिर्फ एक यात्रा का माध्यम नहीं है, बल्कि एक बेहतरीन मानसिक व्यायाम भी है। यह हमें सतर्क रखता है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है और सबसे बड़ी बात—स्वतंत्रता का अनुभव कराता है।

अक्सर हम देखते हैं कि घर में बच्चों या युवाओं की ओर से बुज़ुर्गों को कुछ न करने की सलाह दी जाती है—“ये मत उठाइए, ज्यादा मत चलिए, थक जाएंगे, गिर जाएंगे।” इरादे नेक होते हैं, पर असर उल्टा हो सकता है। ज़रूरत से ज़्यादा सावधानी बुज़ुर्गों को निर्भर बना देती है।

यदि बुज़ुर्ग कोई काम नहीं करेंगे, तो उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होता जाएगा। शरीर कमज़ोर पड़ने लगेगा, और मन भी सुस्त हो जाएगा। इसलिए ज़रूरी है कि उन्हें रोजमर्रा के कामों में शामिल किया जाए।

हर काम शारीरिक मेहनत वाला नहीं होता। कपड़े तह करना, पौधों को पानी देना, किसी कॉल का जवाब देना, खाना बनाने में मदद करना—ये छोटे-छोटे काम शरीर और मन दोनों को सक्रिय रखते हैं।

मैंने देखा है कि कई माता-पिता अपने पोते-पोतियों को स्कूल बस स्टॉप तक ले जाते हैं, या पार्क में घुमाने जाते हैं। कभी-कभी बाज़ार से कुछ सामान भी ले आते हैं। ये छोटी यात्राएं बहुत मायने रखती हैं—चलने का अभ्यास होता है, लोगों से मिलने का मौका मिलता है, और दुनिया के साथ जुड़ाव बना रहता है।

जब हम किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं और हमारे साथ माता-पिता होते हैं, तो ज़्यादातर समय हम उनके लिए ऑर्डर करते हैं। अगर हम उन्हें मेन्यू थमा दें और कहें, “आज आप सबके लिए ऑर्डर कीजिए,” तो उनका चेहरा खिल उठेगा। यह छोटा सा बदलाव उन्हें एक नई ऊर्जा देता है। जब वे सक्रिय और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं, तो उनकी प्रशंसा करें और उन्हें और प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करें।

सक्रिय उम्रदराज़ी (active aging) का मतलब यह नहीं कि बुजुर्ग जवान होने का दिखावा करें। इसका मतलब है कि वो अपनी उम्र को स्वीकार करते हुए भी जीवन के हर पहलू में सक्रिय रहें। उम्र बढ़ने से व्यक्ति रुक नहीं जाते — वो सिर्फ धीमे होते हैं।

बुजुर्ग व्यक्तियों को उनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बनाए रखने और समाज में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्हें नियमित व्यायाम करने, स्वस्थ आहार लेने, सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने, अपना व्यक्तिगत रूप-रंग बनाए रखने और अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए, एक सहायक और सम्मानजनक वातावरण बनाना ज़रूरी है, जहां उनकी ज़रूरतों को समझा जाए और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने का अवसर मिले।

तो आइए, हम अपने बुज़ुर्गों को ये याद दिलाना बंद करें कि वे बूढ़े हो गए हैं। इसके बजाय, उन्हें यह एहसास दिलाएं कि वे अब भी महत्वपूर्ण हैं, अब भी सक्षम हैं, और अब भी हमारे जीवन का एक मजबूत स्तंभ हैं।

सफेद बाल है
अनुभव की पहचान,
झुर्रीयों में छिपा है
जीवन का गान,
वरिष्ठ नागरिक
हमारे गौरव और सम्मान।

बुढ़ापा सभी को एक आम इंसान बना देता है

आप एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के सीईओ रहे हों, या एक प्रसिद्ध चिकित्सक जिनसे अपॉइंटमेंट लेना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था, या फिर किसी देश के प्रमुख पद पर रहे हों — आपके जीवन के स्वर्णिम दिनों में आपका सम्मान, प्रभाव और पहचान सर्वोच्च रही होगी। परंतु जैसे-जैसे उम्र ढलती है, समय और बुढ़ापा धीरे-धीरे सबको साधारण बना देता है।

आपने चाहे कितनी भी डिग्रियाँ ली हों, कितने भी पुरस्कार जीते हों, कितने ही बड़े मंचों से भाषण दिए हों — पर बुढ़ापे की दहलीज़ पर कदम रखते ही वह सब पीछे छूट जाता है। यह उम्र वह पड़ाव है जहां सब कुछ एक समान हो जाता है। यहां तक कि जो कभी शिक्षा से वंचित रहा, वह भी आज आपकी ही तरह एक समान ज़िंदगी जी रहा है।

जिन अधीनस्थों को आप आदेश देते थे, वे तो आपकी सेवा-निवृत्ति के साथ ही चले गए। अब आपके मिलने के लिए कोई प्रतीक्षा नहीं करता। कोई खास कार्यक्रम या मीटिंग नहीं होती। पहले जो व्यस्तता और भागदौड़ थी, वह अब एक शांत जीवन में बदल चुकी है।

लेकिन यह बदलाव अनोखा नहीं है, और इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह जीवन की सामान्य प्रक्रिया है, जिससे हर व्यक्ति को होकर गुजरना होता है।

हमें धीरे-धीरे इस नई स्थिति से सामंजस्य बैठाना सीखना होगा। अकेले रहना भी एक कला है, जिसे हमें सीखना होता है। हमारे बुजुर्गों में से बहुत कम लोग हमारे साथ होंगे। और एक दिन हमारा जीवनसाथी भी हमें छोड़कर चला जाएगा। ईश्वर ने हर व्यक्ति के लिए एक निश्चित समय तय किया है जब उसे इस दुनिया से विदा लेनी है। शायद ही कभी ऐसा होता है कि पति-पत्नी एक साथ या बहुत कम अंतर में इस संसार से विदा लें।

इसलिए अपने बढ़ते वर्षों में हमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए हमारे रिश्ते निभाने में, चाहे वह हमारे परिवार के सदस्यों के साथ हों या देखभाल करने वाले सहायक के साथ। इस उम्र में हमें रिश्तों को समझदारी और संवेदनशीलता से निभाना होता है।

बुढ़ापा केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी बदलाव लाता है। एक समय था जब आपका कैलेंडर मीटिंग्स और यात्राओं से भरा होता था, आज वही कैलेंडर खाली रहता है। फोन की घंटी अब कम बजती है, और सामाजिक दायरा सिमटने लगता है।

परंतु यह समय हमारे अस्तित्व के लिए कोई खतरा नहीं है। यह समय है खुद को एक नए दृष्टिकोण से देखने का। अब आपकी पहचान केवल आपकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उस जीवन से है जिसे आपने जिया है, जिन मूल्यों को आपने अपनाया है और जिन लोगों को आपने छुआ है।

इस जीवन के अंतिम चरण में, हम जो अकेलापन अनुभव करते हैं, उससे बचना मुश्किल है। लेकिन यदि हमने जीवनभर अच्छे संबंध बनाए हैं, तो कुछ लोग हमारे साथ रहेंगे — परिवार के सदस्य, मित्र या देखभाल करने वाले। लेकिन इनसे संबंध रखते समय सतर्कता भी ज़रूरी है। उम्र बढ़ने के साथ हमारी निर्भरता बढ़ती है, और इसी कारण हमें अपने आसपास के लोगों को समझदारी से चुनना चाहिए।

यह समय केवल सावधानी का नहीं, यह हमारे लिए नई परिस्थितियों, विचारों या परिवर्तनों के अनुकूल ढलने की क्षमता को बढ़ाने का है। हमें अपने विचारों और व्यवहार को अनिश्चितता अथवा विभिन्न व्यक्तियों के अनुसार अधिक प्रभावी करना होगा, जिससे बेहतर परिणाम दिखाई दे। आप नई चीजें सीख सकते हैं, नए शौक अपना सकते हैं, और नए रिश्ते बना सकते हैं। जीवन का यह “साधारण” दौर भी बहुत सुंदर हो सकता है — यदि हम इसे अपनाना सीखें।

इन सुनहरे वर्षों में, हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी पहचान किसी पद या पुरस्कार से नहीं होती, बल्कि उस शांति से होती है जो हमारे भीतर होती है, उन रिश्तों से होती है जो हम निभाते हैं, और उस अनुभव से होती है जो हम आने वाली पीढ़ियों को सौंपते हैं।

अंत में, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम गरिमा के साथ जिएं, बदलाव को स्वीकार करें और जीवन की इस साधारण सुंदरता को पूरी तरह महसूस करें। यह मान कर चले कि इस स्थिति में हम अकेले नहीं हैं। हम सब एक आम इंसान हैं इस पड़ाव पर पहूंच कर।

Wednesday, September 03, 2025

Artificial Intelligence – An Opportunity and a Challenge for Senior Citizens

These days, Artificial Intelligence (AI) is being discussed everywhere. It almost feels as if, in the near future, we won’t be able to do anything without it. But what exactly is AI? If we look closely, we have actually been using it for decades—be it a simple calculator or the early computers we worked with. The difference is that today’s AI is far more powerful, versatile, and deeply integrated into our daily lives.

The real concern, however, is that if we stop using our brains actively and begin to rely on AI for every little task, it may weaken our mental agility. Today, even for writing a simple letter or preparing a speech, people turn to ChatGPT. Experts warn that such over-dependence might make us mentally lazy. A video that recently went viral demonstrated the difference between the brain activity of AI users and that of non-users.

When the thought came to me to write my next article on this subject, I shared a short questionnaire with a few groups and also posted it on Facebook. My aim was to understand how much senior citizens (70+) knew about AI and whether they were keen to learn about it. The responses were eye-opening. Most seniors had very little knowledge of AI, yet they expressed great curiosity—especially about how it could be useful in daily life. At the same time, a few elderly individuals were already using AI.

When ChatGPT was launched on 30 November 2022, it took the world by storm. I first read about it in newspapers, and my curiosity grew stronger. In March 2023, I wrote an article titled “From Google to ChatGPT – What’s In It For Senior Citizens?”. Before writing that piece, I had discussed ChatGPT with some of my friends, and to my surprise, none of them had even heard of it. Even today, ChatGPT remains the most talked-about AI tool, but now so many new AI platforms are emerging that it has become difficult to decide which one is truly useful. There is a kind of race—whose AI can do more and better.

There is no doubt that AI is immensely useful, and the future of the world will be shaped by it. India, like other developed nations, is also moving forward in this field. IITs and other institutions are actively teaching and researching AI. Even our Prime Minister frequently refers to AI in his addresses, encouraging young people to advance further in this area.

Negative Aspects of Artificial Intelligence

At the same time, the negative aspects of AI cannot be ignored. Deepfake videos, for instance, have become a major threat, where anyone’s face can be manipulated to spread misleading messages. This makes it increasingly difficult to trust what we see on screen. Recently, I read about a tragic case where a man relied on AI to choose his medicines, which unfortunately led to his death. Although this may be an extreme example, it serves as a cautionary tale. On the other hand, AI has also proved to be a boon in the medical field. One widely shared story on social media told of a rare disease that AI was able to diagnose when even experienced doctors could not.

Therefore, it is essential that senior citizens too become aware of this technology. We possess enough wisdom and life experience to discern what is right and what is misleading, and to decide wisely how and how much to use AI. As part of the Never Say Retired mission, we aim to soon organize a workshop on AI, to help senior citizens understand how they can use it in the right way.

The initiative of the Kerala government in this regard is truly inspiring. Through its program DigiKeralaM, it set out to make every citizen digitally literate. The results were remarkable—even a 105-year-old became digitally literate under this initiative.

One of my 82-year-old acquaintances summed it up beautifully with his comment:

“I disagree with the term Artificial Intelligence. After all, it is nothing but a byproduct of human intelligence—otherwise, how could it have been created? I would rather call it Managed Intelligence.”

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) – वरिष्ठ जनों के लिए अवसर और चुनौती

 आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) की चर्चा चारों ओर हो रही है। ऐसा लगता है मानो आने वाले समय में इसके बिना कोई काम ही नहीं हो सकेगा। लेकिन ए.आई. वास्तव में है क्या? अगर ध्यान से देखें तो दशकों पहले भी हम इसका उपयोग करते थे—चाहे वह एक छोटा-सा कैलकुलेटर हो या शुरुआती कंप्यूटर। अंतर बस इतना है कि आज की ए.आई. कहीं अधिक सक्षम, व्यापक और हमारे रोजमर्रा के जीवन में गहराई से जुड़ चुकी है।

चिंता की बात यह है कि यदि हम अपने मस्तिष्क का उपयोग कम करने लगें और हर छोटे-बड़े काम के लिए केवल ए.आई. पर निर्भर हो जाएं, तो कहीं यह हमारी मानसिक सक्रियता को कमजोर न कर दे। आज स्थिति यह है कि एक साधारण पत्र लिखने से लेकर भाषण तैयार करने तक लोग चैटजीपीटी का सहारा लेने लगे हैं। इसी कारण कुछ विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अत्यधिक निर्भरता हमें सुस्त बना सकती है। हाल ही में एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें ए.आई. उपयोगकर्ताओं और सामान्य व्यक्तियों के मस्तिष्क की सक्रियता का अंतर दर्शाया गया।

जब मेरे मन में यह विचार आया कि अगला लेख इसी विषय पर लिखूं, तो मैंने अपने कुछ समूहों और फेसबुक पर वरिष्ठ नागरिकों (70+) से जुड़े लोगों के बीच एक प्रश्नावली साझा की। उद्देश्य था यह समझना कि उन्हें ए.आई. के बारे में कितनी जानकारी है और क्या वे इसे सीखने में रुचि रखते हैं। प्रतिक्रियाएं चौंकाने वाली रहीं। अधिकांश वरिष्ठ जनों को ए.आई. के बारे में कम जानकारी थी, लेकिन सभी जानना चाहते थे कि यह रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह उपयोगी हो सकता है। वहीं, कुछ वरिष्ठ ऐसे भी निकले जो पहले से इसका प्रयोग कर रहे थे।

30 नवंबर 2022 को जब चैटजीपीटी सामने आया, तो इसने दुनिया को चौंका दिया। मैंने जब इसके बारे में अखबारों में पढ़ा, तो जिज्ञासा जागी और मार्च 2023 में मैंने इस पर एक लेख लिखा—“From Google to ChatGPT – What’s In It For Senior Citizens?”। उस समय अपने मित्रों से चर्चा की, तो आश्चर्य हुआ कि किसी को इसके बारे में पता ही नहीं था। आज भी सबसे ज़्यादा प्रचलन चैटजीपीटी का ही है, लेकिन अब तो हर रोज नए-नए ए.आई. प्लेटफॉर्म सामने आ रहे हैं। यह तय करना कठिन हो गया है कि किसका उपयोग सबसे उपयुक्त होगा। कंपनियों के बीच होड़ लगी है—कौन-सा ए.आई. कितना कर सकता है।

निस्संदेह, ए.आई. के फायदे अपार हैं और भविष्य की दुनिया इसी पर आधारित होगी। भारत भी इस दिशा में पीछे नहीं है। आई.आई.टी. जैसे संस्थानों में इस विषय पर शोध और शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री स्वयं भी समय-समय पर ए.आई. की महत्ता पर बोलते हैं और युवाओं को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कुछ नकारात्मक पहलू

ए.आई. के कुछ नकारात्मक पहलू भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। आजकल डीपफेक वीडियो एक बड़ी समस्या बन चुके हैं, जिनमें किसी भी चेहरे को बदलकर गलत संदेश फैलाया जा सकता है। इससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि जो हम देख रहे हैं, वह असली है या नकली। हाल ही में एक खबर आई कि एक व्यक्ति ने ए.आई. से दवाइयां सुझवाईं और दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो गई। यह भले ही एक चरम उदाहरण हो, लेकिन चेतावनी अवश्य है। दूसरी ओर, यही ए.आई. मेडिकल फील्ड में कई बार वरदान भी साबित हो रही है—एक जटिल बीमारी का निदान ए.आई. ने सुझाया, जिसे कई विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं पहचान पाए थे।

इसलिए ज़रूरी है कि वरिष्ठ नागरिक भी इस तकनीक से परिचित हों। हमारे पास इतनी जीवनानुभव शक्ति अवश्य है कि हम सही-गलत का अंतर समझ सकें और विवेकपूर्ण ढंग से तय कर सकें कि कितना और किस रूप में इसका उपयोग करना है। नेवर से रिटायर्ड अभियान की ओर से हमारा प्रयास रहेगा कि जल्द ही इस विषय पर कार्यशाला आयोजित की जाए, ताकि वरिष्ठ जन ए.आई. का सही उपयोग सीख सकें।

इस दिशा में केरल सरकार का डिजिकेरेलम कार्यक्रम अनुकरणीय है। इसका उद्देश्य था सभी नागरिकों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना। परिणाम यह रहा कि एक 105 वर्षीय बुज़ुर्ग भी इस पहल के माध्यम से डिजिटल साक्षर बने।

मेरे एक 82 वर्षीय परिचित ने इस पर एक अनोखी टिप्पणी की—

“मैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) शब्द से असहमत हूं। यह मूलतः मानव बुद्धि का ही उपोत्पाद है, अन्यथा इसकी खोज ही कैसे संभव होती? मेरा सुझाव है कि इसे ‘प्रबंधित बुद्धिमत्ता’ कहा जाए।”

Seniors Must Make the Second Innings Easier

On the cricket field, once the first innings ends, a very important discussion takes place in the dressing room. The team reflects on how to play the second innings. If the first innings went well and the team is in a winning position, then the second innings is played more carefully to ensure victory. But if there were mistakes in the first innings, then the team corrects itself, makes a new strategy, and tries its best to win through the second innings.

Similarly, senior citizens are now moving on to the second inning of their lives referring to those years of life when they have got a break from job, business or regular work. It is in our hands to make this inning easy and enjoyable. We have to understand the importance of our lives. We have to live the moments of life in a simple and beautiful way, in a playful way.

Learning from the First Innings

Today’s youth must understand that the second innings of the future will be beautiful only if the first innings is played thoughtfully. Paying attention to health, living a balanced life, saving and investing, nurturing relationships—these are precautions to be included in daily life from now itself. If we adopt this discipline early, the challenges of the second innings will be far fewer. “The future is safeguarded only by the one who is alert in the present.”

Preparation for Seniors

As far as we elders are concerned, our second innings will be golden only when we learn to take care of ourselves. This is not just a time to pass, but a time to truly live. Growing older does not mean becoming tired. Rather, it is an opportunity to share experiences, refine ourselves, and contribute meaningfully to society. “Age is not weakness, it is the strength of experience.”

Health is the Real Wealth

The first and foremost need in the second innings is health. If body and mind are fit, the joy of life doubles. A little walk, regular exercise, yoga, pranayam, and balanced food—these simple habits give immense strength. Instead of depending on medicines, it is better to adopt prevention. “Wealth may be valuable, but health is priceless.”

Change in Mindset

The biggest challenge in the second innings is mental. After retirement, one suddenly feels separated from the world of work, no longer valued as before. This can bring emptiness and sadness. But if we change our perspective and realize that now we have the opportunity to do what we truly love, that emptiness transforms into enthusiasm.

Adopting new hobbies—music, writing, painting, gardening, or social service—keeps the mind joyful. Learning new technology and staying connected with the digital world also builds confidence. “Change your thinking, and life will change on its own.”

The Strength of Relationships

In the second innings, relationships become the real support. Spending time with family, interacting with children and grandchildren makes life meaningful. Friendships too must be nurtured. True friends stand by us in difficult times and lighten the journey of life. “Relationships are the wealth that only grow richer with time.”

Giving Back to Society

Our experience and knowledge are priceless for society. If we share them with the younger generation, they can avoid many mistakes. Helping the needy, joining an organization in service, teaching children, planting trees—these small acts bring immense satisfaction. “The true joy of life lies in giving, not in receiving.”

The “Never Say Retired” Approach

This philosophy teaches us that retirement is only from a job, not from life. No matter what the age, a person can always remain active. If we awaken within ourselves the belief that “we are never retired,” then every day will feel like a new opportunity. “One retires from work, not from life.”

Conclusion

The second innings will be easy and joyful only if we make it so through our thoughts and actions. If the first innings was played well, then this is the chance to play even better. And if there were shortcomings in the first innings, then the second innings is the opportunity to correct them and move towards victory.

In this phase of life, we must depend less on others and become capable enough to support those in need. That is the true beauty of life—living fully ourselves and showing others the way to live. “The real victory of life is when you make someone else’s life easier.”

दूसरी पारी को वरिष्ठ जन आसान खुद बनाएं

क्रिकेट के मैदान में पहली पारी समाप्त होने के बाद ड्रेसिंग रूम में बहुत अहम बैठक की जाती है। उसमें विचार होता है कि अब दूसरी पारी कैसे खेली जाए। यदि पहली पारी में बहुत अच्छा प्रदर्शन हुआ है और जीत की स्थिति में हैं, तो दूसरी पारी का खेल और सधा हुआ होगा, ताकि जीत सुनिश्चित की जा सके। लेकिन यदि पहली पारी में चूक हुई है, तो टीम अपने आप को सुधारकर, नई रणनीति बनाकर मैदान में उतरती है और पूरी कोशिश करती है कि दूसरी पारी से जीत हासिल की जाए।

इसी तरह वरिष्ठ व्यक्तियों की जिंदगी की पहली पारी से आगे अब दूसरी पारी चल रही है और इस दूसरी पारी का अर्थ है जीवन के वे वर्ष जब नौकरी, व्यापार या नियमित कार्य से विराम मिल चुका है। यह पारी आसान और आनंद में बने, यह हमारे ही हाथ में है। हमें अपनी जिंदगी की अहमियत को समझना होगा। जिंदगी के पलों को खेल-खेल में कुछ सरल और सुंदर तरीके से जीना होगा।

पहली पारी से सीखना

आज के नौजवानों को यह समझना चाहिए कि भविष्य की दूसरी पारी तभी सुंदर बनेगी जब पहली पारी में सोच-समझकर खेला जाए। सेहत पर ध्यान देना, संतुलित जीवन जीना, बचत और निवेश करना, रिश्तों को निभाना – ये सब वही सावधानियां हैं जो आज से ही अपनी दिनचर्या में शामिल करनी होंगी। अगर हम शुरू से यह अनुशासन अपना लें, तो दूसरी पारी की चुनौतियां बहुत कम हो जाएंगी। “भविष्य वही संभाल सकता है, जो वर्तमान में सजग रहता है।”

बुजुर्गों की तैयारी

जहां तक हम बुजुर्गों का सवाल है, हमारी दूसरी पारी तभी सुनहरी बनेगी जब हम स्वयं को संभालना सीखेंगे। यह समय केवल गुजारने का नहीं, बल्कि जीने का है। उम्र बढ़ने का अर्थ थक जाना नहीं होता। बल्कि यह अवसर है अनुभवों को साझा करने का, खुद को निखारने का और समाज में सार्थक योगदान देने का। “उम्र कमजोरी नहीं, अनुभव की ताकत होती है।”

स्वास्थ्य ही असली पूंजी

दूसरी पारी में सबसे पहली ज़रूरत है – स्वास्थ्य की। यदि शरीर और मन स्वस्थ हैं, तो जीवन का आनंद दोगुना हो जाता है। थोड़ी-सी सैर, नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम, और संतुलित भोजन – ये साधारण-सी आदतें हमें बहुत बड़ी ताक़त देती हैं। दवाइयों पर निर्भर होने से बेहतर है कि हम रोकथाम की आदत डालें। “धन से बढ़कर स्वास्थ्य है, और स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं।”

मानसिकता का बदलाव

जीवन की दूसरी पारी को लेकर सबसे बड़ी चुनौती मानसिक होती है। सेवानिवृत्ति के बाद अचानक लगता है कि काम की दुनिया से अलग हो गए, लोग हमें पहले जैसा महत्व नहीं दे रहे। ऐसे में मन में खालीपन और उदासी घर कर सकती है। लेकिन अगर हम दृष्टिकोण बदलें और सोचें कि अब हमारे पास “अपनी पसंद का करने” का अवसर है, तो वही खालीपन उत्साह में बदल जाएगा।

नई रुचियां अपनाना – संगीत, लेखन, पेंटिंग, बागवानी या सामाजिक सेवा – मन को प्रसन्न रखती हैं। नई तकनीक सीखना, डिजिटल दुनिया से जुड़ना भी आत्मविश्वास को बढ़ाता है। “सोच बदलो, जीवन अपने आप बदल जाएगा।”

रिश्तों की ताकत

दूसरी पारी में रिश्ते ही असली सहारा बनते हैं। परिवार के साथ समय बिताना, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ संवाद करना, जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है। दोस्ती का दायरा भी बनाए रखना चाहिए। सच्चे मित्र कठिन समय में संबल देते हैं और जीवन के सफर को हल्का कर देते हैं। “रिश्ते वह पूंजी हैं, जो समय के साथ और अमीर बना देती है।”

समाज को लौटाना

हमारे अनुभव और ज्ञान समाज के लिए अनमोल हैं। यदि हम इन्हें युवा पीढ़ी के साथ साझा करें तो वे कई गलतियों से बच सकते हैं। किसी जरूरतमंद की मदद करना, किसी संस्था से जुड़कर सेवा करना, बच्चों को पढ़ाना, पेड़ लगाना – ये छोटे-छोटे कार्य जीवन को बड़ी संतुष्टि देते हैं। “जीवन का सच्चा सुख, देने में है – न कि पाने में।”

‘नेवर से रिटायर्ड’ का दृष्टिकोण

जीवन का यह दर्शन हमें बताता है कि रिटायरमेंट केवल नौकरी से होता है, जीवन से नहीं। उम्र चाहे कितनी भी हो, मनुष्य हमेशा सक्रिय रह सकता है। यदि हम अपने भीतर यह विश्वास जगा लें कि “हम कभी रिटायर्ड नहीं होंगे”, तो हर दिन एक नया अवसर लगेगा। “रिटायरमेंट काम से हो सकता है, जीवन से नहीं।”

निष्कर्ष

दूसरी पारी आसान और आनंदमयी तभी होगी जब हम इसे अपनी सोच और कर्म से आसान बनाएं। अगर पहली पारी में अच्छा खेल चुके हैं तो यह अवसर है कि और बेहतर खेल दिखाएं। और यदि पहली पारी में कुछ कमियां रह गई हों, तो दूसरी पारी में उन्हें सुधारकर जीत की ओर बढ़ें।

जीवन की इस पारी में हमें दूसरों पर निर्भर कम रहना है, बल्कि इतना सक्षम बनना है कि हम जरूरतमंदों को सहारा दे सकें। यही जीवन का असली सौंदर्य है – खुद जीना और दूसरों को जीने की राह दिखाना। “जीवन की जीत वह है, जब आप दूसरों की जिंदगी आसान बना दें।”