We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Wednesday, October 07, 2026

विलुप्त होता परिवार

पिछले दिनों व्हाट्सऐप पर केवल 35 सेकंड का एक वीडियो मिला। समय इतना कम कि शायद उसे देखने में भी हमने ज्यादा नहीं सोचा होगा — लेकिन वीडियो समाप्त होने के बाद एक सवाल मन में अटक गया। पांच तस्वीरें थीं। पहली में एक भरा-पूरा, हंसता-खेलता परिवार था — वैसा परिवार जिसकी तस्वीर कभी हमारे अपने घर की दीवार पर भी हुआ करती थी। हर अगली तस्वीर में चेहरे कम होते गये। और पांचवीं तस्वीर तक आते-आते घर में केवल पति-पत्नी रह गए। 35 सेकंड की यह कहानी शायद किसी एक परिवार की नहीं थी; यह हमारे बदलते समाज का आईना थी।

हमने अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दी। वे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी के योग्य बने। उनकी तनख्वाह भी ऐसी, जिसे हम सफलता का प्रतीक मानते हैं। फिर उनका विवाह हुआ और उनके जीवनसाथी भी अच्छी नौकरी में हैं। दोनों मिलकर कमाते हैं, फिर भी आज की परिस्थितियों में दो या तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाना उन्हें कठिन लगता है।

तब मन में एक सहज प्रश्न उठता है — जिस अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी और अच्छी आय के लिए हमने इतनी मेहनत की, यदि उसी के बावजूद परिवार बढ़ाना संभव नहीं रह गया, तो आखिर उस आर्थिक सफलता का उद्देश्य क्या रह जाता है?

हम वरिष्ठ लोगों को अपने बचपन के दिन याद आते हैं। हमारे दादा-दादी पूरे परिवार के साथ रहते थे। पांच-सात भाई-बहन होना कोई असाधारण बात नहीं थी। घर में चहल-पहल रहती थी। काम बंटा हुआ था। घर का बना भोजन मिलता था और उसमें केवल स्वाद ही नहीं, अपनापन भी होता था। परिवार बड़ा था, लेकिन शायद जिम्मेदारियां भी उसी अनुपात में बांटी हुई थीं। अधिकांश बच्चे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ते थे और आगे चलकर अपनी जीविका कमाने में सक्षम हो जाते थे।

लेकिन केवल अतीत को याद करके वर्तमान को नहीं समझा जा सकता। समय बदल चुका है। आज शिक्षा महंगी है, आवास महंगा है, बच्चों की परवरिश महंगी है और नौकरी तथा जीवन की अनिश्चितताएं भी पहले से अलग हैं।

चलिए, भविष्य की कल्पना भी करें।

हमारे पोते-पोतियां जब 70 वर्ष के होंगे, तब दुनिया कैसी होगी, यह हम शायद कभी जान नहीं पाएंगे। तब तक हम इस दुनिया में होंगे भी नहीं। लेकिन आज जो दिखाई दे रहा है, उससे एक बात पर विचार करना आवश्यक है — यदि परिवार लगातार छोटे होते गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पारिवारिक रिश्तों का स्वरूप कैसा होगा?

एक मध्यमवर्गीय परिवार का उदाहरण लें। पति-पत्नी और उनके दो बच्चे — एक बेटा और एक बेटी। बच्चे बड़े हुए और वे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए। लगभग 65 वर्ष की आयु में पति का निधन हो गया और पत्नी अकेली रह गईं। दुर्भाग्य से कुछ समय बाद बेटे का भी बीमारी के कारण कम उम्र में निधन हो गया। बेटी अपने वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों के कारण अपनी मां के साथ रहने लगी। अंततः मां के निधन के बाद उस परिवार की वह पीढ़ी वहीं समाप्त हो गई।

एक अन्य परिचित परिवार में दो बेटे थे। दोनों ने बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त की, योग्य बने और अमेरिका में अच्छी नौकरियां प्राप्त कीं। वे भारत लौटे, यहीं की लड़कियों से विवाह किया और फिर अमेरिका चले गए। जीवन आगे बढ़ता गया। बच्चे हुए, करियर बना, परिवार बढ़े — लेकिन दूसरी ओर माता-पिता बूढ़े होते गए।

बुढ़ापे में जब माता-पिता को सबसे अधिक साथ और सहारे की आवश्यकता होती है, तब वे हजारों किलोमीटर दूर अपने बच्चों की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। और जब पति-पत्नी में से किसी एक का निधन हो जाता है, तब अकेलेपन का भार और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वृद्धाश्रम कई बार एक व्यावहारिक सहारा बन जाता है — भले ही भावनात्मक रूप से वह उस कमी को पूरा न कर सके जिसकी आवश्यकता उस समय सबसे अधिक होती है।

यह किसी व्यक्ति, किसी पीढ़ी या किसी व्यवस्था को दोष देने का विषय नहीं है। समाज बदल रहा है और परिवार भी उसके साथ बदल रहे हैं। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और अब कभी-कभी केवल दंपति तक सीमित परिवार — यह परिवर्तन हमारे सामने है।

शायद हमें यह स्वीकार करना होगा कि समय को पीछे नहीं मोड़ा जा सकता। संयुक्त परिवार लौटेंगे या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं है। परिवार छोटे हो रहे हैं और आगे भी छोटे होते जाएंगे। बच्चे दूर शहरों और देशों में बसेंगे। एक समय ऐसा भी आ सकता है जब एक परिवार में भाई-बहन का रिश्ता ही बहुत कम दिखाई दे, चचेरे-ममेरे भाई-बहनों से मिलना तो दूर की बात होगी।

यह केवल भावनात्मक चिंता नहीं है। परिवार हमारे सामाजिक जीवन की सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण संस्था रहा है। यदि परिवार का आकार लगातार घटता गया, तो इन जिम्मेदारियों को निभाने का तरीका भी बदलना पड़ेगा।

सवाल यह नहीं है कि परिवार क्यों छोटे हो रहे हैं — इसके पीछे आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत अनेक कारण हैं। असली सवाल यह है कि यदि परिवार इसी तरह छोटा होता गया, तो आने वाली पीढ़ियों में परिवार का स्वरूप क्या रह जाएगा?

A video based on this article has been posted on Never Say Retired YouTube channel. The link is https://www.youtube.com/watch?v=hn7Bv3CjINQ

The English version of this article, titled The Vanishing Family, has been posted on our website and the link is
https://neversayretired.in/the-vanishing-family/