We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Thursday, November 13, 2025

न डॉक्टर, न इंजीनियर — मुझे तो दादा बनना है

हाल ही में एक बेहद दिलचस्प व्हाट्सएप संदेश देखा। एक छोटे बच्चे से पूछा गया कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। जवाब चौंकाने वाला था —

मैं न डॉक्टर बनना चाहता हूं, न इंजीनियर, न अफसर और न मंत्री… मुझे तो दादा बनना है!

और उसके पास इसके पीछे ठोस कारण भी थे। उसने बताया कि दादा जी जब चाहें तब उठते हैं, जब चाहें तब सो जाते हैं। टीवी देखना हो तो किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ती। उन्हें स्कूल नहीं जाना पड़ता, न होमवर्क करना पड़ता है। बस या ट्रेन में भी उन्हें विशेष सहूलियत मिलती है। वे जो चाहें कर सकते हैं, कोई रोक-टोक नहीं!

मैसेज की भाषा और उदाहरणों से लगता था कि यह किसी पश्चिमी देश — अमेरिका या यूरोप — की सोच पर आधारित है। परंतु यह सवाल मन में आया कि क्या भारतीय परिवेश में भी ऐसा ही उत्तर कोई बच्चा दे सकता है? संभवतः बहुत कम बच्चे ऐसा कहेंगे, लेकिन अगर कहें भी, तो उनके कारण कुछ भिन्न होंगे। आखिर बच्चे वही देखते और सीखते हैं जो वे अपने घर में, अपने बड़ों के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।

हमारे आचरण से बनती है अगली पीढ़ी की सोच

हम बुजुर्ग अपने घर के बच्चों के सामने कैसे रहते हैं, कैसी दिनचर्या अपनाते हैं, दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं — यह सब बच्चों पर गहरा प्रभाव डालता है। बच्चे केवल स्कूल की किताबों से नहीं सीखते; बहुत कुछ वे हमें देखकर, हमारे आचरण से सीखते हैं। हमारे शब्दों से ज़्यादा असर हमारे व्यवहार का होता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी संस्कारवान, अनुशासित और जीवन का आनंद लेने वाली बने — तो हमें वह जीवन स्वयं जीना होगा।

बिना उपदेश दिए भी सिखाने का एक तरीका

यह हमारे लिए एक अद्भुत अवसर है कि हम अपने आचरण के माध्यम से बच्चों में जीवन मूल्यों के बीज बो सकें — बिना सीधे उपदेश दिए। अगर हम रोज सुबह टहलने जाते हैं, व्यायाम करते हैं और कभी-कभी सहजता से बच्चों से यह साझा करते हैं कि “हमारा स्वस्थ रहना इसी नियमितता का परिणाम है,” तो हमें उन्हें अलग से समझाने की ज़रूरत नहीं। वे सब देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं।

यह संदेश उनके मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाता है। हो सकता है कि वे तुरंत इस पर अमल न करें, लेकिन समय आने पर वही संस्कार उनके जीवन का हिस्सा बन जाएंगे।

पूजा, पाठ और आध्यात्मिकता की सहज छाप

इसी तरह जब हम नित्यकर्म के बाद भगवान के सामने शांत भाव से बैठते हैं, प्रार्थना करते हैं या रामायण–महाभारत की कथा सुनाते हैं, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। यह वही समय है जब हम उन्हें कहानियों के माध्यम से धर्म, कर्तव्य, साहस और त्याग जैसे गुणों की सहज सीख दे सकते हैं। यह पाठ्यक्रम से नहीं, वातावरण से सिखाने की प्रक्रिया है — और यह सबसे प्रभावशाली है।

ज्ञान और जिज्ञासा की साझी खिड़की

हर सुबह जब हम अख़बार पढ़ते हैं, तो किसी विशेष समाचार पर बच्चों से चर्चा करना उपयोगी हो सकता है। इससे उनका सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, और साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि दुनिया को समझने के लिए केवल सोशल मीडिया पर्याप्त नहीं। उन्हें यह समझाना कि “पढ़ने की आदत” केवल ज्ञान ही नहीं, भाषा और सोच को भी निखारती है — यह भी एक मूल्यवान सीख है।

संस्कार जो बोलते नहीं, दिखते हैं

घर में जब कोई अतिथि आते हैं, तो बच्चों को बुलाकर उनका अभिवादन कराना, पैर छूकर आशीर्वाद लेना सिखाना — ये सब बातें धीरे-धीरे उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं। थोड़े समय में उन्हें बताने की आवश्यकता ही नहीं रहती; वे अपने आप ऐसा करने लगते हैं।

यही तो संस्कार हैं — जो शब्दों से नहीं, व्यवहार से संप्रेषित होते हैं।

दादा-दादी की भूमिका — अमूल्य और अपूरणीय

आज के तेज रफ्तार युग में जहां माता-पिता अक्सर व्यस्त रहते हैं, वहां दादा-दादी बच्चों के लिए सबसे स्थिर, धैर्यवान और स्नेहमय उपस्थिति होते हैं। उनके पास अनुभव है, समय है और वह आत्मिक शांति है जो बच्चों को सुरक्षा का अहसास कराती है। उनकी मुस्कान, उनका सान्निध्य, और उनका प्यार — ये सब मिलकर बच्चों के व्यक्तित्व की नींव तैयार करते हैं।

शायद इसी कारण वह बच्चा कहता है — “मुझे तो दादा बनना है।” क्योंकि उसे दादा में आजादी दिखती है, स्नेह दिखता है, और सबसे बढ़कर, एक संतुलित जीवन जीने की कला दिखती है। वह जानता है कि डॉक्टर और इंजीनियर बनना भी सम्मानजनक है, पर दादा बनना — यानी जीवन के उस मुकाम पर पहुंचना जहां ज्ञान, अनुभव और प्रेम एक साथ झरते हैं — यह तो सर्वोच्च सम्मान है।

कहने का सार यही है —

बच्चे वही बनते हैं जो वे देखते हैं। हमारे चेहरे पर मुस्कान, हमारे आचरण में शांति, और हमारे जीवन में अनुशासन — यही उनकी सबसे बड़ी शिक्षा है। अगर हम सचमुच चाहते हैं कि अगली पीढ़ी हमें देखकर कहे “मुझे भी दादा बनना है”, तो हमें वैसा दादा बनना होगा — जो प्रेरणा दे, जो प्रेम दे, और जो जीवन को सुंदर ढंग से जीना सिखाए।

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