आज बात करते हैं अपनी दिमागी सेहत की। जब भी स्वास्थ्य की चर्चा होती है, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की बात साथ-साथ होती है। यदि पूछा जाए कि दोनों में से किस पर अधिक ध्यान देना चाहिए, तो मेरा मानना है कि दोनों को समान महत्व देना चाहिए। शरीर स्वस्थ हो, लेकिन मन अशांत हो, तो जीवन का आनंद अधूरा रह जाता है। इसी तरह, मन में उत्साह हो, लेकिन शरीर साथ न दे, तो भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
एक दिलचस्प बात पर गौर कीजिए। जब हम अपनी सेहत सुधारने के बारे में सोचते हैं, तो मन में विचार आता है कि प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए, योग करना चाहिए और सुबह खुली हवा में सैर करनी चाहिए। लेकिन इन सबका विचार भी तो हमारा दिमाग ही करता है! हमारा मस्तिष्क ही हमें निर्णय लेने और उन पर अमल करने के निर्देश देता है। इसलिए अपने मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।
इसके लिए हमें कोई बहुत असाधारण काम करने की अनिवार्यता नहीं है। घर के बड़ों से मिली अच्छी सीख को जीवन में उतारने की अपेक्षा है।
सबसे पहले, लोगों से संवाद बनाए रखें। अपने मन की आवश्यक बातें किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करें। मन में बातें दबाकर रखने से चिंता बढ़ सकती है, जबकि खुलकर बातचीत करने से मन हल्का होता है। इसी से जुड़ी एक और बात है — सच बोलना। यदि हम किसी बात को छिपाते हैं या झूठ बोलते हैं, तो अगली बार उस व्यक्ति से मिलते समय हमें याद रखना पड़ता है कि पिछली बार क्या कहा था। इस अनावश्यक मानसिक दबाव से बचने का सरल उपाय है ईमानदारी और स्पष्टता।
दूसरी बात, तनाव से यथासंभव दूर रहने का प्रयास करें। आप कह सकते हैं कि यह कहना आसान है, लेकिन जीवन में परिवार, रिश्तों, आर्थिक परिस्थितियों और अन्य कारणों से चिंताएं आती ही रहती हैं। तनाव को पूरी तरह समाप्त करना हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन उससे निपटने का तरीका हम सीख सकते हैं। ऐसे समय में अध्यात्म, प्रार्थना, ध्यान और कुछ समय शांत बैठना बहुत सहायक हो सकता है। अपनी आस्था के अनुरूप कोई भी अभ्यास मन को स्थिरता दे सकता है।
जीवन की परिस्थितियों को स्वीकार करना भी सीखें। हर बात हमारे अनुसार नहीं होती और हर व्यक्ति की सोच तथा व्यवहार एक जैसा नहीं होता। कई बार हम दूसरों के व्यवहार पर तुरंत नाराज हो जाते हैं, जबकि हमें उनकी परिस्थितियों की पूरी जानकारी नहीं होती।
उदाहरण के लिए, ऑटो या टैक्सी में कभी बहुत विनम्र चालक मिलता है और कभी कोई रूखा व्यवहार करता है। संभव है कि उसके साथ पिछले यात्री ने दुर्व्यवहार किया हो या वह किसी निजी परेशानी से गुजर रहा हो। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें गलत व्यवहार सहते रहना चाहिए, बल्कि यह कि हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेकर अपने मन की शांति खराब करना भी उचित नहीं है।
इसी तरह, क्षमा करने की आदत डालें। इसका अर्थ गलत बात को सही मान लेना नहीं है। क्षमा का अर्थ है अपने मन में नाराजगी और कड़वाहट का बोझ अनावश्यक रूप से ढोते न रहना। कई बार हम किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में सोच-सोचकर स्वयं अपना तनाव बढ़ाते रहते हैं। ऐसे में क्षमा करना स्वयं को मानसिक शांति देने का एक अच्छा उपाय बन सकता है।
अब बात करें मस्तिष्क को सक्रिय रखने की। नियमित योगाभ्यास और ध्यान के साथ-साथ पढ़ना, लिखना, नई चीजें सीखना और लोगों से बातचीत करना भी उपयोगी है। अखबारों में आने वाली सुडोकू, शब्द पहेली और क्रॉसवर्ड जैसी गतिविधियों को हल करें। अपने पोते-पोतियों के साथ खेलें। उनसे नई तकनीक और नई चीजें सीखने में संकोच न करें। इससे पीढ़ियों के बीच संवाद भी बढ़ेगा और सीखने की रुचि भी बनी रहेगी।
उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भूलने की समस्या, लगातार उदासी, चिंता या किसी काम में रुचि समाप्त होना जैसे बदलावों को केवल बुढ़ापे का स्वाभाविक हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि ऐसे लक्षण लगातार बने रहें या दैनिक जीवन को प्रभावित करें, तो चिकित्सकीय सलाह अवश्य लें। इसी प्रकार, अचानक अत्यंत तेज सिरदर्द, शरीर के एक ओर कमजोरी या बोलने में परेशानी जैसे लक्षणों में तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
अंत में, मेरा यही कहना है — पढ़ते रहें, लिखते रहें, लोगों से संवाद करते रहें, नई चीजें सीखते रहें और जीवन में प्रसन्नता के अवसर तलाशते रहें। अपनी भावनाओं को समझें, जरूरत पड़ने पर दूसरों की मदद लें और अपने मन पर अनावश्यक बोझ न डालें।
याद रखिए, स्वस्थ जीवन का अर्थ केवल शरीर का स्वस्थ होना नहीं है। मन की शांति, विचारों में सकारात्मकता और जीवन के प्रति उत्साह भी उतने ही आवश्यक हैं। यही आदतें हमारी दूसरी पारी को अधिक सुखद, सक्रिय और सार्थक बना सकती हैं।
दिमाग का ध्यान रखिए, मन को प्रसन्न रखिए और जीवन को भरपूर जीते रहिए। यही तो है — ‘नेवर से रिटायर्ड’ की भावना!
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