बार-बार टोकना और दूसरों की हर बात में गलतियां निकालना — पता नहीं क्यों, लेकिन यह छवि धीरे-धीरे वरिष्ठजनों के साथ जुड़ती जा रही है। कई बार हम किसी को सही कारण से भी कोई काम ठीक से न करने के लिए टोकते हैं या उसकी किसी गलती के बारे में उसे आगाह करते हैं, लेकिन सामने से तुरंत जवाब आता है — “बढ़ती उम्र में आपका नेचर ही ऐसा हो गया है।”
सवाल यह है कि क्या वास्तव में उम्र बढ़ने के साथ हमारा स्वभाव ऐसा हो जाता है? शायद पूरी तरह नहीं। इसके पीछे हमारी चिंता, अनुभव और अपने बच्चों के लिए कुछ अच्छा करने की इच्छा भी होती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अच्छी बात भी अगर बार-बार और गलत तरीके से कही जाए तो सामने वाले को अच्छी नहीं लगती।
समय बदल गया है। हमें अपने बच्चों और उनसे भी आगे की पीढ़ी यानी अपने पोते-पोतियों को भी कुछ इस तरह समझना होगा कि हम अपनी बात कह सकें और उन्हें बुरा भी न लगे।
आज की पीढ़ी का सोचने और काम करने का तरीका हमसे अलग है। धैर्य शायद पहले जितना नहीं रहा। बच्चे और युवा अपने काम में व्यस्त रहते हैं, अपने मित्रों से प्रभावित होते हैं और आधुनिक तकनीक तथा नए तौर-तरीकों के साथ बड़े हुए हैं। किसी काम को करने का उनका तरीका हमारे तरीके से अलग हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि उनका तरीका गलत ही हो।
दूसरी ओर, हम वरिष्ठजनों को अपनी आंखों के सामने कोई गलती होते देखना अच्छा नहीं लगता। आखिर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों का जीवन सुखी हो, उनका भविष्य अच्छा हो और वे गलत फैसलों से बचें। हमारी सलाह के पीछे यही प्रबल इच्छा होती है।
लेकिन यहीं हमें थोड़ा सावधान होने की आवश्यकता है।
हमारी बात सही हो सकती है, लेकिन उसे कहने का तरीका गलत हो सकता है। अगर हम हर छोटी-बड़ी बात पर यह जताने लगें कि “तुम्हें कुछ पता ही नहीं”, “तुम हमेशा गलती करते हो” या “हमसे ज्यादा तुम क्या जानते हो”, तो सामने वाला हमारी सलाह सुनने के बजाय उससे बचने लगेगा।
हमें इसके बजाय अपनी बात समझाने का तरीका बदलना होगा। किसी बात को आदेश की तरह कहने के बजाय अपने अनुभव का उदाहरण दें। कह सकते हैं — “मेरे साथ एक बार ऐसा हुआ था, इसलिए मुझे लगता है कि तुम्हें यह तरीका अपनाना चाहिए।” या फिर पूछ सकते हैं — “क्या तुमने इस विकल्प के बारे में सोचा है?”
जब सलाह बातचीत का हिस्सा बनती है तो उसे स्वीकार करने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन जब वही सलाह आलोचना का रूप ले लेती है तो सामने वाला स्वाभाविक रूप से उसका विरोध करने लगता है।
वह जमाना भी अब नहीं रहा जब हमारे माता-पिता या दादा-दादी कुछ कह देते थे और हम उसे लगभग ब्रह्मवाक्य मानकर तुरंत स्वीकार कर लेते थे। आज की पीढ़ी हर बात के पीछे तर्क ढूंढती है। कुछ हद तक देखें तो यह गलत भी नहीं है। आधुनिक जीवन, नई तकनीक और बदलते सामाजिक तौर-तरीकों ने काम करने के अनेक नए तरीके पैदा किए हैं। जो तरीका हमें सही लगता है, जरूरी नहीं कि वही आज भी सबसे सही हो।
एक और महत्वपूर्ण बात पर हमें विचार करना चाहिए। हर समय किसी को रोकना, उसकी गलतियां ढूंढना और फिर हमारी बात न माने जाने पर अपना मन खराब करना — इसका फायदा किसे है? हम दुखी होते हैं क्योंकि हमने तो अच्छी सलाह दी थी, फिर सामने वाले ने मानी क्यों नहीं। लेकिन हमें यह स्वीकार करना सीखना होगा कि सलाह देना हमारे हाथ में है, उसे मानना सामने वाले के हाथ में।
यह भी याद रखना चाहिए कि भले ही हमने अपने बच्चों को बड़ा किया है, लेकिन उनकी शिक्षा, उनके मित्र, उनका अनुभव, उनका कार्यक्षेत्र और परिस्थितियों ने भी उनके व्यक्तित्व को आकार दिया है। उन्होंने अपनी एक अलग सोच और अपनी दिशा बनाई है।
हमारा प्रयास तो केवल यह होना चाहिए कि हम उन्हें इतना सक्षम बनाये कि वो सही और गलत में अंतर कर सकें, परिस्थितियों को समझ सकें, अपने फैसले स्वयं ले सकें और अपने भविष्य के बारे में सोच सकें। और अगर कभी वे कोई गलती करते भी हैं तो हर गलती पर तुरंत प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं। कुछ गलतियां इंसान को वह सिखा देती हैं जो दस सलाहें नहीं सिखा सकतीं।
वरिष्ठ होने का अर्थ यह नहीं कि हर बात पर अपनी वरिष्ठता साबित की जाए। वरिष्ठ होने का असली अर्थ है — अपने अनुभव का उपयोग दूसरों का जीवन बेहतर बनाने में करना।
हमारे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। उनके बच्चे भी अब बड़े हो रहे हैं और आने वाले समय में वे भी इन्हीं परिस्थितियों का सामना करेंगे। हम उन्हें केवल अपनी बातों से ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से भी शिक्षा दे रहे हैं।
यह शिक्षा किसी पुस्तक में नहीं मिलेगी। वे देखेंगे कि उनके दादा-दादी असहमति होने पर कैसे व्यवहार करते हैं, गलती होने पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और रिश्तों को अपनी बात से अधिक महत्व देते हैं या नहीं।
शायद अब समय है कि हम टोकना थोड़ा कम करें, समझाना थोड़ा बढ़ाएं; गलतियां निकालना कम करें और उदाहरण देकर रास्ता दिखाएं। क्योंकि अंततः हमें यह तय करना है कि हम अपने अनुभव से रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं या हर बात में सही साबित होना।
English version available on website www.neversayretired.in
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