एक ऐसा विषय है, जिसका सामना हर बुजुर्ग दंपती को कभी न कभी करना है, लेकिन इस पर बात करने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं—जब जीवनसाथी नहीं रहेगा, तब मैं कैसे जीऊंगा?
आज के समाज में बुजुर्ग अलग-अलग परिस्थितियों में रह रहे हैं। कुछ दंपती साथ रहते हैं, जबकि उनके बच्चे दूसरे शहरों या देशों में रहे हैं। कुछ भाग्यशाली हैं कि बच्चे और पोते-पोतियां उनके साथ हैं। कुछ पूरी तरह अकेले रहते हैं।
लेकिन एक डर लगभग हर दंपती को भीतर से सताता है—जब हममें से एक इस दुनिया से विदा हो जाएगा, तब दूसरे का क्या होगा?
कौन पहले जाएगा, कोई नहीं जानता।
यह डर स्वाभाविक है। पुरुष और महिला की परिस्थितियां भी अलग हो सकती हैं। बहुत कुछ उनके स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति, सामाजिक संबंधों और वर्तमान जीवन-परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
कई बुजुर्ग दंपतियों के लिए जीवनसाथी केवल जीवन का साथी नहीं होता। वह दूसरे की दवाइयों, स्वास्थ्य समस्याओं, खान-पान और यहां तक कि छोटी-छोटी असामान्य बातों को भी समझता है। पेशेवर मदद इस कमी को कुछ हद तक पूरा कर सकती है। लेकिन ऐसी मदद न तो आसानी से सस्ती मिलती है और न ही हर जगह उपलब्ध है।
अच्छी बात यह है कि स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। बढ़ती जरूरत और बढ़ती वरिष्ठ आबादी को देखते हुए कई स्टार्ट-अप और संस्थाएं वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के क्षेत्र में आ रही हैं। घर पर देखभाल, आपातकालीन सहायता, असिस्टेड लिविंग और सीनियर कम्युनिटी लिविंग जैसी सुविधाएं बढ़ रही हैं।
कुछ वरिष्ठों के लिए अच्छी तरह संचालित सीनियर कम्युनिटी में रहना अकेले रहने की तुलना में अधिक सुरक्षित और साथीपूर्ण हो सकता है। लेकिन बड़ी संख्या में बुजुर्गों के लिए ऐसी सुविधाएं अभी भी आर्थिक रूप से संभव नहीं हैं।
यहीं हमें अलग तरीके से सोचने की जरूरत है।
जीवनसाथी के बिना जीने की तैयारी का अर्थ मृत्यु की प्रतीक्षा करना नहीं है। इसका अर्थ है आगे के जीवन के लिए तैयार होना।
हर दंपती को धीरे-धीरे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोनों एक-दूसरे के जीवन की जरूरी बातों से परिचित हों।
क्या दोनों को पता है कि महत्वपूर्ण दस्तावेज, बैंक खाते, बीमा पॉलिसियां और निवेश कहां हैं? क्या दोनों दवाइयों का प्रबंधन कर सकते हैं, आपात स्थिति संभाल सकते हैं और जरूरी कामों के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर सकते हैं? क्या दोनों को उन महत्वपूर्ण लोगों के संपर्क नंबर मालूम हैं, जिनकी जरूरत पड़ सकती है?
ये बातें बहुत सामान्य लग सकती हैं, लेकिन जब एक जीवनसाथी अचानक नहीं रहता, तो यही छोटी बातें बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
एक और तैयारी उतनी ही महत्वपूर्ण है—जीवनसाथी के अलावा भी अपना जीवन बनाना।
कई दंपती इतने वर्षों तक साथ रहते हैं कि उनका पूरा सामाजिक संसार भी साझा हो जाता है। यह खूबसूरत है, लेकिन इससे एक तरह की निर्भरता भी पैदा हो सकती है। इसलिए दोनों के अपने मित्र, रुचियां और गतिविधियां भी होनी चाहिए।
जिस व्यक्ति के पास मित्र, रुचियां, सामाजिक संपर्क और जीवन में कोई उद्देश्य होता है, उसके लिए अकेले जीवन का सामना करना अपेक्षाकृत आसान होता है। कुछ पल अध्यात्म से जुड़ कर जीवन के हर क्षण को सहज और सुन्दर बनाया जा सकता है।
बच्चों की भी इसमें भूमिका है। वे दूर रह रहे हों तो भी दूरी का अर्थ संपर्क टूटना नहीं होना चाहिए। माता-पिता को सामाजिक रूप से सक्रिय, आर्थिक रूप से व्यवस्थित और डिजिटल रूप से सक्षम बने रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चों को भी अपने माता-पिता की भावनात्मक जरूरतों के साथ-साथ उनकी व्यावहारिक जरूरतों की जानकारी होनी चाहिए।
परंपरागत पारिवारिक व्यवस्था बदल रही है। बच्चे दूसरे शहरों और देशों में जा रहे हैं और परिवार छोटे होते जा रहे हैं। यह मान लेना कि बच्चे हमेशा बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए उपलब्ध रहेंगे, अब व्यावहारिक नहीं है।
हमें इसके लिए नई पीढ़ी को दोष दिए बिना इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। लेकिन यह भी समझना होगा कि परिवार के सहारे के कमजोर होने की एक कीमत है। समाज को सस्ती वरिष्ठ देखभाल, घर पर सहायता, आपातकालीन सेवाएं, असिस्टेड लिविंग और साथ-संगत उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना होगा।
हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो चर्चा में रहा, जिसमें दो बेटियां अपने पिता के अंतिम संस्कार को स्क्रीन पर दूर से देखती हुई दिखाई देती हैं और ₹5,100 का योगदान करती हैं। परिस्थितियों से सहमत हों या नहीं, ऐसी तस्वीरें आधुनिक जीवन की एक कड़वी सच्चाई सामने रखती हैं।
इसका समाधान डर में जीना नहीं है। समाधान है—तैयार रहना।
हर बुजुर्ग दंपती को एक ऐसी बातचीत जरूर करनी चाहिए, जो शुरुआत में थोड़ी असहज लग सकती है:
अगर हममें से एक नहीं रहा, तो दूसरा कैसे जीवन बिताएगा?
बात शुरू करना कठिन हो सकता है। लेकिन ऐसी बातचीत व्यावहारिक फैसले लेने, बेहतर वित्तीय योजना बनाने, सामाजिक संबंध मजबूत करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद कर सकती है।और शायद सबसे महत्वपूर्ण तैयारी मानसिक है।
हमें अपने जीवनसाथी से गहरा प्रेम करना चाहिए, एक-दूसरे पर भरोसा करना चाहिए और हर पल को संजोना चाहिए—लेकिन साथ ही अपने पैरों पर खड़े रहने की क्षमता भी बनाए रखनी चाहिए।
इसलिए जब तक हम एक-दूसरे के साथ हैं, आइए एक-दूसरे को इस तरह तैयार करें कि जीवनसाथी के न रहने पर भी दूसरा अच्छी तरह जी सके।
यह मृत्यु के बारे में सोचना नहीं है। यह उस व्यक्ति के जीवन की चिंता करना है, जिससे हम सबसे अधिक प्रेम करते हैं।
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