We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Friday, August 21, 2026

वरिष्ठ नागरिकों की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं

उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत का हर पांचवां व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का होगा। आज हर नौवां भारतीय वरिष्ठ नागरिक है और वर्ष 2035 तक यह संख्या बढ़कर हर सातवें व्यक्ति तक पहुंच जाएगी। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इस बात का संकेत हैं कि देश को तेजी से बढ़ती वरिष्ठ नागरिक आबादी के लिए अभी से तैयार होना होगा।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार हैं? और क्या यह पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार की है, या समाज को भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी?

हम आम नागरिक सरकार को लेकर लंबी-लंबी बहस कर सकते हैं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन केवल चर्चा से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। बेहतर होगा कि हम व्यावहारिक सुझाव तैयार करें और उन्हें अपने विधायक तथा सांसदों तक पहुंचाएँ, ताकि वे उचित मंचों पर इन मुद्दों को उठा सकें।

साथ ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम स्वयं क्या कर सकते हैं।

आज महानगरों की अनेक आवासीय सोसायटियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) में वरिष्ठ नागरिकों के अलग समूह सक्रिय हैं। सुबह पार्कों में योग, व्यायाम, सैर और हंसी-मजाक करते वरिष्ठजन सहज ही दिखाई देते हैं। ऐसे समूह केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मित्रता, भावनात्मक सहयोग, मार्गदर्शन और अपनापन भी प्रदान करते हैं। जीवन की दूसरी पारी में यह सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

रांची के माहेश्वरी समाज का एक प्रेरक उदाहरण उल्लेखनीय है। लगभग चार वर्ष पहले उन्होंने 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए ‘चौपाल’ की शुरुआत की। प्रत्येक माह होने वाली बैठकों, उपयोगी गतिविधियों और आपसी सहयोग ने इसे अत्यंत सफल बना दिया। इसकी सफलता से प्रेरित होकर अन्य शहरों में भी ऐसी चौपालें प्रारंभ हुई हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज स्वयं भी वरिष्ठों के लिए प्रभावी सहयोग व्यवस्था विकसित कर सकता है।

भारत सरकार, विशेषकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनेक योजनाएं और कार्यक्रम चला रहा है। इन प्रयासों की सराहना होनी चाहिए। केवल आलोचना करने के बजाय समाज और स्वयंसेवी संस्थाओं को रचनात्मक सुझाव देने चाहिए तथा सरकार के साथ मिलकर समाधान खोजने चाहिए। सकारात्मक सहयोग हमेशा अधिक परिणाम देता है।

सबसे कठिन स्थिति उन वरिष्ठ नागरिकों की होती है जिनके पास परिवार का सहारा नहीं है। हाल ही में मैंने सोशल मीडिया पर एक समाजसेवी द्वारा लद्दाख की लगभग अस्सी वर्षीय एक अकेली महिला की सहायता का मार्मिक उदाहरण देखा। ऐसे अनेक लोग हमारे आसपास हैं जिन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए समाज के सहयोग की आवश्यकता है।

एक और महत्वपूर्ण मुद्दा स्वरोजगार से जुड़े वरिष्ठ नागरिकों का है। कुछ छोटे व्यापारियों की बैठक में एक सज्जन ने कहा, “सरकारी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन मिलती है, लेकिन छोटे दुकानदारों और स्वरोजगार करने वालों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।” यह विचार गंभीरता से सोचने योग्य है। सरकार उनकी आयकर या अन्य योगदान के आधार पर किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा योजना पर विचार कर सकती है।

बदलते पारिवारिक ढांचे और बढ़ती आयु के कारण अच्छे वृद्धाश्रमों तथा सहायक आवासों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। सरकार यदि इस क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को कर रियायत, प्रोत्साहन और सरल नियम उपलब्ध कराए, तो समाज की भागीदारी और बढ़ सकती है।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में निश्चित रूप से सुधार हुआ है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विशेषकर अकेले रहने वाले वरिष्ठों के लिए घर पर चिकित्सा सुविधा, मानसिक स्वास्थ्य, फिजियोथेरेपी और आपातकालीन सहायता की उपलब्धता बढ़ाने की आवश्यकता है। अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रही हैं, परंतु समस्या इतनी व्यापक है कि कहीं अधिक सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।
वरिष्ठ नागरिक केवल कल्याण योजनाओं के लाभार्थी नहीं हैं। वे अनुभव, ज्ञान और जीवन मूल्यों की अमूल्य धरोहर हैं। यदि उन्हें सक्रिय और सम्मानजनक अवसर दिए जाएं, तो वे समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों के बेहतर भविष्य की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं हो सकती। इसके लिए सरकार, समाज, स्वयंसेवी संस्थाएं, परिवार और प्रत्येक नागरिक को मिलकर काम करना होगा। तभी हम अपने वरिष्ठों को केवल लंबा जीवन ही नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण, सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण जीवन भी दे सकेंगे।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने वरिष्ठ नागरिकों का कितना सम्मान करता है और उन्हें कितना सशक्त बनाता है।

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