We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Tuesday, February 24, 2026

जब “रामायण” और “महाभारत” सीरियल्स का जादू था

आज मैं आपको 80 के दशक के उस दौर में ले चलना चाहता हूं, जब भारत टेलीविजन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर रहा था। वह समय केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि सामूहिक अनुभवों का समय था। आज हम बात करेंगे उन धारावाहिकों की, जिन्होंने भारतीय जनमानस को टेलीविजन से इस तरह जोड़ दिया कि प्रसारण के समय सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था।

उन दिनों दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था। मनोरंजन के साधन सीमित थे, लेकिन जो था, वह पूरे देश को एक सूत्र में बांध देता था। 1982 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला लोकप्रिय कार्यक्रम “चित्रहार” लोगों के बीच अत्यंत प्रिय था। इसमें पुराने और नए हिंदी फिल्मों के गीत दिखाए जाते थे। इसका प्रसारण शाम के समय होता था, जब परिवार के सभी सदस्य दिनभर के काम से निवृत्त होकर एक साथ बैठते थे। टेलीविजन के सामने बैठना एक पारिवारिक अनुष्ठान जैसा बन गया था।

हमें भली-भांति याद है दूरदर्शन का पहला लोकप्रिय धारावाहिक “हम लोग”, जो जुलाई 1984 में प्रारंभ हुआ। यह मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी थी और लगभग डेढ़ सौ एपिसोड तक चला। इसके पात्र इतने वास्तविक लगते थे कि दर्शक उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानने लगे थे। इसके बाद 1986 में “बुनियाद” का प्रसारण हुआ, जो भारत विभाजन और उसके सामाजिक प्रभावों पर आधारित था। इस धारावाहिक ने लोगों के हृदय को गहराई से छुआ।

फिर आया वह ऐतिहासिक क्षण—जनवरी 1987 में रामानंद सागर की “रामायण” का प्रसारण आरंभ हुआ। यह केवल एक धारावाहिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन बन गया था। रविवार सुबह 9:30 बजे जैसे ही इसका प्रसारण शुरू होता, पूरा देश थम-सा जाता था। सड़कें सूनी हो जाती थीं, दुकानें बंद रहती थीं और सार्वजनिक परिवहन लगभग खाली दिखाई देता था।

लोगों की श्रद्धा इतनी प्रबल थी कि कई दर्शक प्रसारण से पहले स्नान करते, आरती उतारते और अपने टेलीविजन सेट को फूलों की माला पहनाते थे। भगवान राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल और माता सीता की भूमिका में दीपिका चिखलिया जहां भी जाते, लोग उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते थे। उन्हें साक्षात देवी-देवता के रूप में देखा जाने लगा था। रावण की भूमिका निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी इतने प्रभावशाली थे कि उनके किरदार की मृत्यु के प्रसारण पर उनके गृह नगर में शोक का वातावरण बन गया था।

उस समय सभी के घर में टेलीविजन नहीं हुआ करता था। सैकड़ों लोग एक ही मोहल्ले में एक टीवी सेट के सामने इकट्ठा होकर एपिसोड देखा करते थे। प्रसारण के समय महत्वपूर्ण सरकारी बैठकों तक को टाल दिया जाता था। बिजली विभाग पर भी विशेष दबाव रहता था, क्योंकि थोड़ी देर की बिजली कटौती भी लोगों के रोष का कारण बन जाती थी।

“रामायण” के बाद बी.आर. चोपड़ा की “महाभारत” 1988 से 1990 के बीच प्रसारित हुई। इसका शीर्षक गीत “मैं समय हूँ…” आज भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है। भीष्म पितामह के रूप में मुकेश खन्ना, श्रीकृष्ण की भूमिका में नितीश भारद्वाज और दुर्योधन के रूप में पुनीत इस्सर ने अपने अभिनय से पात्रों को जीवंत कर दिया। “महाभारत” केवल एक पौराणिक कथा नहीं थी, बल्कि नीति, धर्म, राजनीति और मानवीय संबंधों की गहन व्याख्या थी। इसके संवाद इतने प्रभावशाली थे कि लोग उन्हें याद कर लिया करते थे। हर एपिसोड के बाद घरों में उस दिन की कथा पर चर्चा होती थी, मानो कोई पारिवारिक गोष्ठी चल रही हो।

इन धारावाहिकों का प्रभाव इतना व्यापक था कि भारत में टेलीविजन सेटों की बिक्री में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। उन्होंने एक साझा राष्ट्रीय अनुभव का निर्माण किया, जिसमें लाखों लोग एक ही समय पर, एक ही कथा से जुड़ते थे। यह भारतीय सामाजिक इतिहास का एक स्वर्णिम कालखंड था, जिसने मनोरंजन को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ दिया।

यदि भारतीय टेलीविजन के इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत सितंबर 1959 में नई दिल्ली से हुई थी। प्रारंभिक प्रसारण सीमित घंटों के लिए होता था, जबकि दैनिक नियमित सेवा 1965 में शुरू हुई। 1972 में इसका विस्तार मुंबई और अमृतसर तक हुआ। 1982 के एशियाई खेलों ने रंगीन टेलीविजन की शुरुआत कर देश में एक नया युग आरंभ किया। इसी पृष्ठभूमि में 80 का दशक भारतीय टेलीविजन का स्वर्णिम युग बन गया।

आज भले ही सैकड़ों चैनल और ओटीटी प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं, कार्यक्रमों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उस दौर की बात ही कुछ और थी। तब विकल्प कम थे, पर अपनापन अधिक था। पूरा देश एक समय, एक भावना और एक कहानी में बंध जाता था। वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक था।

शायद यही कारण है कि “रामायण” और “महाभारत” आज भी भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में स्मरण किए जाते हैं—एक ऐसा दौर, जब टेलीविजन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला माध्यम था।

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