We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Wednesday, September 23, 2026

लक्ष्य हो तो सुनहरी उम्र भी बनेगी खुशहाल

पिछले दिनों मुझे स्वामी गिरीशानंद सरस्वती जी महाराज के पांच दिवसीय श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय पर उनके ओजस्वी प्रवचन सुनने का सौभाग्य मिला। प्रतिदिन वे ऐसे अनेक प्रसंग सुनाते थे, जो दिल और दिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाते थे।

एक दिन उन्होंने कहा कि अपनी जिंदगी को सही मायने में जीने के लिए जीवन में एक लक्ष्य लेकर चलना चाहिए। उन्होंने यह बात सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए कही थी। लेकिन उनके इस विचार ने मुझे विशेष रूप से वरिष्ठजनों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या यह बात हमारे लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है?

हममें से अधिकांश लोग जीवन के चार-पांच दशक किसी न किसी काम में लगा देते हैं। नौकरी, व्यवसाय, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियां — इन सबके बीच हमारा जीवन एक निश्चित दिशा में चलता रहता है। फिर एक दिन हम उस काम से अवकाश ले लेते हैं। नौकरी समाप्त हो जाती है, पद और जिम्मेदारियां पीछे छूट जाती हैं और हम अपने जीवन के एक नए पड़ाव में प्रवेश करते हैं।

लेकिन एक बात नहीं बदलती — जिंदगी चलती रहती है।

सेवानिवृत्ति का अर्थ काम से अवकाश हो सकता है, जिंदगी से नहीं। उम्र के इस पड़ाव पर भी हमारे सामने कई वर्ष हो सकते हैं। फिर क्यों न उन वर्षों को किसी उद्देश्य, किसी लक्ष्य और किसी उत्साह के साथ जिया जाए?

आखिर हममें से कौन चाहता है कि जीवन केवल दिन गिनते हुए बीते? सुबह उठना, नाश्ता करना, अखबार पढ़ना, टीवी देखना, खाना और फिर सो जाना—और अगले दिन यही क्रम दोहराना। यदि जीवन केवल इसी दिनचर्या तक सीमित हो जाए और हम किसी अंतिम पड़ाव की प्रतीक्षा ही करते रहें, तो इसमें जीवन की खुशी कहां रह जाएगी?

कदापि नहीं। हमें लक्ष्य बनाना होगा।

यह लक्ष्य बहुत बड़ा हो, यह जरूरी नहीं। न ही इसका संबंध पैसे या पद से होना चाहिए। लक्ष्य कुछ भी हो सकता है — समाज सेवा करना, बच्चों को पढ़ाना, किसी युवा को मेंटर करना, किसी संस्था के साथ जुड़ना या घर की कोई ऐसी जिम्मेदारी अपने हाथ में लेना जिसे अब तक कोई और संभालता रहा हो।

और लक्ष्य हमेशा गंभीर ही हो, ऐसा भी जरूरी नहीं।

किसी को संगीत पसंद है तो वह तय कर सकता है कि अगले छह महीने में वह गाना सीखकर इतना अच्छा गाएगा कि किसी छोटे मंच पर अपनी कला प्रस्तुत कर सके। फिर वह रोज रियाज करेगा, किसी शिक्षक से सीखेगा, संगीत सुनेगा और अपनी प्रगति को देखेगा। देखते ही देखते उसके दिन में एक नई व्यस्तता आ जाएगी। और यह व्यस्तता बोझ नहीं होगी, बल्कि खुशी देगी।

यही लक्ष्य हमारे शरीर और मन दोनों के लिए अच्छा है। जब हमें किसी काम को पूरा करने की उत्सुकता होती है तो हम सक्रिय रहते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, कुछ नया सीखते हैं, घर से बाहर निकलते हैं और अपने स्वास्थ्य पर भी अधिक ध्यान देने लगते हैं।

एक मोटिवेशनल स्पीकर को सुनते हुए मैंने एक बहुत साधारण लेकिन प्रभावी बात सुनी। उन्होंने कहा कि जब आप सुबह उठें और आपके मन में यह स्पष्ट हो कि “आज मुझे यह काम पूरा करना है,” तो आपका दिन अपने आप बेहतर हो जाता है। आपके पास करने के लिए कुछ है, इसलिए आप सक्रिय रहते हैं। इसीलिए केवल जीवन का कोई बड़ा लक्ष्य ही नहीं, बल्कि हर दिन का भी एक लक्ष्य होना चाहिए।

मेरे परिचित एक सज्जन करीब सत्तर वर्ष के हुए तो उन्होंने अपने लिए एक अनोखा लक्ष्य बनाया। वे वर्षों से प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करते थे, लेकिन उन्हें लगा कि वे उसके अर्थ को पूरी तरह नहीं समझते। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे हनुमान चालीसा को गहराई से समझेंगे।

उन्होंने इस विषय पर मिलने वाली पुस्तकें पढ़नी शुरू कीं। जहां कहीं हनुमानजी की कथा या व्याख्यान होता, वहां जाने का प्रयास करते। इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से भी उन्होंने अध्ययन किया। धीरे-धीरे उनका ज्ञान बढ़ता गया। कुछ वर्षों में वे इस विषय के इतने जानकार हो गए कि अब दूसरे लोग उनसे हनुमान चालीसा का अर्थ और उसकी गहराई सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं।

सोचिए, यदि उन्होंने उस उम्र में यह कहकर छोड़ दिया होता कि “अब मेरी उम्र सीखने की नहीं है,” तो वे इस आनंद से वंचित रह जाते।

यही सोच हमें भी बदलनी होगी। लक्ष्य तय करने की उम्र समाप्त नहीं होती। बल्कि वरिष्ठावस्था में लक्ष्य का महत्व और बढ़ जाता है। जीवन के इस पड़ाव पर हमारे पास अनुभव है, समय है और अपनी पसंद के काम करने की स्वतंत्रता भी अपेक्षाकृत अधिक है।

इसलिए उम्र को लक्ष्य बनाने में बाधा न बनने दें। कोई नया हुनर सीखिए, कुछ पढ़िए, किसी को सिखाइए, समाज के लिए कुछ कीजिए, कोई पुराना सपना पूरा कीजिए या रोज अपने लिए कोई छोटा-सा लक्ष्य तय कीजिए।

जीवन की दूसरी पारी का सबसे बड़ा सुख यही है कि अब हमें किसी और के लक्ष्य पूरे नहीं करने हैं। अब हम अपने लक्ष्य चुन सकते हैं।

और जब जीवन में लक्ष्य रहेगा, तो हर सुबह नई उम्मीद लेकर आएगी, हर दिन कुछ करने की प्रेरणा देगा और हमारी सुनहरी उम्र केवल लंबी नहीं, बल्कि सार्थक, सक्रिय और खुशहाल भी बनेगी।

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