We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Thursday, April 09, 2026

बढ़ती आयु में भी कागज पर लिखते रहें

मैंने फरवरी 2025 में एक लेख लिखा था—“चिट्ठी लिखना बहुत याद आता है”। उस लेख में मैंने पुराने समय की उन भावनाओं को याद किया था, जब हम अपने प्रियजनों को चिट्ठियां लिखते थे और हर शब्द में अपनापन झलकता था। उसी संदर्भ में आज एक दिलचस्प वीडियो देखने को मिला, जिसमें बताया गया कि फाउंटेन पेन उठाकर कागज़ पर लिखना न केवल एक भावनात्मक अनुभव है, बल्कि हमारे शरीर और विशेष रूप से दिमाग के लिए अत्यंत लाभदायक भी है।

एक जानकारी के अनुसार, 2011 से 2019 के बीच जापान के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. हिरोशी तनाका ने अपने शोध में पाया कि जो बुजुर्ग प्रतिदिन 10–15 मिनट हाथ से लिखते थे, उनमें डिमेंशिया और संज्ञानात्मक गिरावट (cognitive decline) के लक्षण बहुत कम या न के बराबर दिखाई दिए। संज्ञानात्मक क्षमता का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व है—यह न केवल हमारी याददाश्त को प्रभावित करती है, बल्कि हमारे सीखने, निर्णय लेने और नई परिस्थितियों में ढलने की क्षमता को भी निर्धारित करती है।

इस शोध का एक और रोचक पहलू यह था कि इसमें शामिल लोगों की जीवनशैली एक जैसी नहीं थी। किसी का खान-पान संतुलित था तो किसी का नहीं; कुछ लोग नियमित रूप से व्यायाम करते थे, जबकि कुछ बिल्कुल भी सक्रिय नहीं थे। उनकी नींद की आदतें भी अलग-अलग थीं। लेकिन इन सब भिन्नताओं के बावजूद एक समानता स्पष्ट रूप से सामने आई—वे सभी हाथ से लिखते थे और टाइपिंग या मोबाइल संदेशों पर निर्भर नहीं थे।

डॉ. तनाका के अनुसार, लिखना एक साधारण क्रिया नहीं है। यह एक ऐसा अभ्यास है जिसमें प्रयास, ध्यान और उद्देश्य तीनों का समन्वय आवश्यक होता है। जब हम पेन से कागज़ पर लिखते हैं, तो हर अक्षर हमारे दिमाग को सक्रिय करता है। हम सोचते हैं, शब्दों का चयन करते हैं, उन्हें आकार देते हैं—और यही पूरी प्रक्रिया हमारे मस्तिष्क के लिए एक प्रभावी व्यायाम बन जाती है।

अपने अध्ययन में उन्होंने प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा—एक समूह जो नियमित रूप से टाइप करता था और दूसरा जो हाथ से लिखता था। छह महीने बाद जब दोनों समूहों का मूल्यांकन किया गया, तो यह पाया गया कि हाथ से लिखने वाले लोगों की याददाश्त अधिक तेज और स्पष्ट थी। ब्रेन स्कैन से यह भी स्पष्ट हुआ कि लिखने के दौरान मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय होते हैं जो गतिशीलता, स्थानिक समझ, भाषा और स्मृति की गहरी प्रोसेसिंग से जुड़े होते हैं। टाइपिंग में यह गहराई अपेक्षाकृत कम होती है।

ऐसे लोग न केवल नाम बेहतर याद रखते थे, बल्कि बोलने में भी अधिक सहज और प्रवाहपूर्ण थे। वे नई जानकारी को जल्दी समझकर उसे अपने जीवन में लागू कर लेते थे। उनकी दिनचर्या अधिक व्यवस्थित और कम भ्रमपूर्ण होती थी।

इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि उम्र के साथ याददाश्त का कम होना अनिवार्य नहीं है। कई बार इसका कारण केवल दिमाग का कम उपयोग होता है। हमारा मस्तिष्क एक मांसपेशी की तरह है—जितना अधिक हम उसका उपयोग करेंगे, वह उतना ही मजबूत और सक्रिय बना रहेगा।

कुछ ही महीने पहले मेरी मुलाकात 97 वर्षीय उद्योगपति लक्ष्मी नारायण झुनझुनवाला जी से हुई। इस आयु में भी वे प्रतिदिन सुबह और शाम तीन-तीन घंटे पढ़ते और लिखते हैं। उनकी डायरी को देखकर उनकी सुंदर और सुस्पष्ट लिखावट ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। वे आज भी समसामयिक विषयों पर पूरी स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ चर्चा करते हैं।

हम अपने स्कूल के दिनों को याद करें तो पाएंगे कि जब भी हम किसी शब्द की वर्तनी भूल जाते थे, तो शिक्षक हमें उसे बार-बार लिखने के लिए कहते थे। वास्तव में वही हमारी स्मृति को मजबूत करने का सबसे प्रभावी तरीका था।

आज के डिजिटल युग में, जहां मोबाइल और कंप्यूटर ने हमारे जीवन को आसान बना दिया है, वहीं उन्होंने हमारी कुछ अच्छी आदतों को भी पीछे छोड़ दिया है। आज बच्चे और युवा लिखने की बजाय टाइपिंग पर अधिक निर्भर हो गए हैं। यहां तक कि परीक्षाओं की पद्धति भी धीरे-धीरे बदल रही है। भविष्य में संभव है कि लिखना और भी कम हो जाए।

लेकिन इन सबके बीच यह आवश्यक है कि हम अपनी लेखनी को कभी बंद न होने दें। तो आइए, आज से ही एक छोटा सा संकल्प लें—रोजाना कम से कम 15 मिनट पेन से कागज पर लिखें। यह आदत न केवल हमारी दिनचर्या को बेहतर बनाएगी, बल्कि हमारे मस्तिष्क को भी लंबे समय तक सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखेगी।

रिश्तों की डोर मजबूत रखें

आज के समय में हमारे समाज में रिश्तों का महत्व कुछ कम होता नजर आ रहा है, खासकर हमारी युवा पीढ़ी में। लोग मोबाइल पर संदेश भेज देते हैं, फोन पर औपचारिक बातचीत भी कर लेते हैं, परंतु आमने-सामने बैठकर दिल से बात करने का समय जैसे कम होता जा रहा है। तकनीक ने हमें जोड़ा तो है, लेकिन कहीं न कहीं भावनात्मक दूरी भी बढ़ा दी है। रिश्तों का वास्तविक आनंद तभी आता है जब हम एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं, एक-दूसरे को महसूस करते हैं।

आज भले ही युवा रिश्तों की गहराई को पूरी तरह न समझ पा रहे हों, लेकिन जब वे जीवन के अगले पड़ाव में, वरिष्ठता की ओर बढ़ेंगे, तब उन्हें इन रिश्तों की कमी और अहमियत का एहसास अवश्य होगा। उस समय पछतावा न हो, इसके लिए आज से ही सजग होना आवश्यक है।

रिश्तों को टूटने से बचाने और उन्हें जीवंत बनाए रखने के लिए केवल प्यार ही नहीं, बल्कि समझदारी, धैर्य और निरंतर प्रयास की भी आवश्यकता होती है। यह कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है, बस थोड़ी सजगता और संवेदनशीलता चाहिए।

कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार करें, जो रिश्तों को मजबूत बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं—

  1. खुलकर संवाद करें: जब भी कोई समस्या हो, उसे मन में दबाकर रखने के बजाय खुलकर बात करें। अनदेखी करना या ‘एटीट्यूड’ दिखाना रिश्तों को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर देता है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि हम सुनना सीखें। केवल अपनी बात कहना ही पर्याप्त नहीं है, सामने वाले की भावनाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है।
  2. सम्मान को बनाए रखें: हर रिश्ते की नींव सम्मान पर टिकी होती है। कभी भी आत्म-सम्मान को खोकर व्यवहार न करें, और न ही दूसरों के सम्मान को ठेस पहुंचाएं। जिस दिन सम्मान समाप्त हो जाता है, उस दिन रिश्ता भी जीवित नहीं रहता। चाहे वह पति-पत्नी का रिश्ता हो, माता-पिता और बच्चों का, भाई-बहनों का या मित्रों का—सम्मान हर जगह अनिवार्य है।
  3. अपेक्षाएं कम रखें, स्वीकार्यता बढ़ाए: लंबे समय तक रिश्तों को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपनी अपेक्षाओं को सीमित रखें और बदलाव को स्वीकार करें। यह समझें कि सामने वाला भी एक इंसान है, उसमें भी कमियां हो सकती हैं। ‘पूर्णता’ की अपेक्षा रिश्तों को बोझिल बना देती है। लोगों को बदलने की कोशिश करने के बजाय उन्हें वैसे ही अपनाएं जैसे वे हैं।
  4. रिश्तों को प्राथमिकता दें: व्यस्त जीवनशैली में अक्सर रिश्ते पीछे छूट जाते हैं। लेकिन यदि हम सचेत रूप से उन्हें प्राथमिकता दें और साथ में ‘क्वालिटी टाइम’ बिताएं, तो रिश्तों में नई ऊर्जा बनी रहती है। कभी-कभी छोटी-सी मुलाकात या साथ बिताया गया समय भी बहुत कुछ संवार देता है।
  5. माफ करना सीखें: रिश्तों में गलतियां होना स्वाभाविक है। ऐसे में माफ करना सीखना बहुत आवश्यक है। दूसरों को माफ करने से सबसे अधिक शांति हमें स्वयं को मिलती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम गलत को सही ठहराएं, बल्कि यह कि हम पुराने बोझ को छोड़कर आगे बढ़ें।
  6. समायोजन की भावना रखें: यदि रिश्ते को बनाए रखना है, तो थोड़ा-बहुत ‘एडजस्ट’ करना सीखना होगा। हर बार यह सोचकर नहीं चलना चाहिए कि केवल हम ही समझौता कर रहे हैं। कभी ठहरकर यह भी देखना चाहिए कि सामने वाला भी अपने स्तर पर प्रयास कर रहा है।
  7. अपनी खुशी स्वयं खोजें: जब हम खुद संतुष्ट और खुश रहते हैं, तभी हम दूसरों के साथ भी खुशी बांट सकते हैं। अपनी खुशी के लिए केवल दूसरों पर निर्भर रहना रिश्तों पर अनावश्यक दबाव डालता है।
  8. भरोसे को बनाए रखें: रिश्तों की सबसे मजबूत नींव विश्वास है। इसे कभी टूटने न दें। छोटी-छोटी बातें, छोटे झूठ भी रिश्तों में दरार डाल सकते हैं। विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे फिर से बनाना बहुत कठिन होता है।

निष्कर्ष

रिश्ते कभी भी स्वाभाविक रूप से समाप्त नहीं होते, वे हमारी लापरवाही, अहंकार या ‘एटीट्यूड’ के कारण धीरे-धीरे खत्म होते हैं। यदि हम सचेत प्रयास करें, तो अधिकांश रिश्तों को बचाया और संजोया जा सकता है।

ध्यान दें: यदि कोई रिश्ता लगातार मानसिक या शारीरिक कष्ट दे रहा हो, तो आत्म-सम्मान को प्राथमिकता देते हुए उससे अलग होना भी एक साहसिक और सही निर्णय हो सकता है।

अंततः, जीवन में ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहिए जिससे हम अपने रिश्तों को और मजबूत बना सकें। हमारा ध्येय स्पष्ट होना चाहिए—

हम रिश्तों को टूटने नहीं देंगे, बल्कि उन्हें सहेजकर, संवारकर आगे बढ़ाएंगे।