We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Monday, January 19, 2026

वरिष्ठजन – आपकी उपस्थिति स्वयं में एक आशीर्वाद है

जब हम एक नए वर्ष में कदम रखते हैं, तो हमारे मन में कई प्रकार की भावनाएं होती हैं—जीवन के प्रति कृतज्ञता, उन प्रियजनों की स्मृतियां जो अब हमारे साथ नहीं हैं, और आने वाले समय को लेकर स्वाभाविक चिंताएं। उम्र के साथ उत्सव शांत हो जाते हैं, चिंतन गहरा होता जाता है और अपेक्षाएं सरल हो जाती हैं। ऐसे समय में सकारात्मकता वास्तविकता से मुंह मोड़ना नहीं, बल्कि एक सचेत और परिपक्व निर्णय होता है। और वरिष्ठजनों के लिए यही निर्णय सुखद और गरिमामय वृद्धावस्था की नींव बनता है। आइए, इस नए वर्ष की शुरुआत केवल सकारात्मक भावनाओं के साथ करें, क्योंकि हमारे स्वर्णिम वर्षों में सकारात्मकता कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है।

आज हम जीवित हैं, उपस्थित हैं—यह स्वयं में एक बड़ा आशीर्वाद है। इस तथ्य को हम अक्सर भूल जाते हैं। आज की दुनिया तेज़ी, लक्ष्य और उपलब्धियों के पीछे भाग रही है। ऐसे वातावरण में वरिष्ठजन संतुलन और स्थिरता प्रदान करते हैं। हमारे बच्चे, पोते-पोतियां और समाज, सभी हमारी उपस्थिति से चुपचाप लाभान्वित होते हैं। यह शांत उपस्थिति अमूल्य है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह परिवारों को भरोसा देती है, भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करती है और जीवन में निरंतरता का भाव बनाए रखती है।

हमारी यह शांत उपस्थिति युवाओं की बेचैनी को भी कम करती है। भले ही वे इसे शब्दों में न कहें, लेकिन वे हमारे अनुभव और स्थिरता से ऊर्जा पाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि हम हर समय सलाह दें या मार्गदर्शन करें। कई बार बिना टोके, बिना जज किए, केवल सुन लेना ही सबसे बड़ा उपहार होता है। सहानुभूति से भरी चुप्पी, अक्सर लंबे भाषणों से अधिक प्रभावी होती है।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, हमारे तर्क-वितर्क भी बढ़ने लगते हैं। वर्षों के अनुभव के कारण हमारी राय दृढ़ हो जाती है, कभी-कभी कठोर भी। हमें लगता है कि हमने जीवन बहुत देख लिया है, इसलिए हमारा दृष्टिकोण सही ही होगा। परंतु वास्तविक बुद्धिमत्ता इसमें है कि हर परिस्थिति में प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं होता। हमें तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए और अनावश्यक बहसों से दूरी बनानी चाहिए। हर मुद्दे पर सहमत होना जरूरी नहीं है। कई बार असहमति को स्वीकार करना ही समझदारी होती है।

इस उम्र में संबंधों को बनाए रखना, छोटी-छोटी बहसें जीतने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। तर्क जीतने से इस अवस्था में कोई स्थायी आनंद नहीं मिलता। आप सही हो सकते हैं, लेकिन परिपक्वता इस बात में है कि शांति को प्राथमिकता दी जाए। आज वरिष्ठजन व्हाट्सऐप जैसे माध्यमों पर भी सक्रिय हैं। वहां भी हमें सावधानी बरतनी चाहिए। बेवजह की बहसें, तीखी प्रतिक्रियाएं और अंतहीन चर्चाएं हमारे मानसिक संतुलन को बिगाड़ देती हैं। यहां भी मौन कई बार सबसे बेहतर उत्तर होता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि दूसरों को सुधारना हमारा कर्तव्य नहीं है। हर व्यक्ति की सोच उसके अनुभव, परिवेश और संस्कारों से बनती है। यदि किसी की राय हमसे भिन्न है, तो उसे स्वीकार करना चाहिए। हमें जीवन में इतने विविध लोग मिले हैं कि सभी को एक ही दृष्टि से देखना व्यर्थ है। जीवन हर व्यक्ति को अपने ढंग से और अपने समय पर सिखाता है। अब हमारी भूमिका सिखाने की नहीं, समझने की है।

अक्सर घर में या बाहर, युवा हमारी समझाइश को पक्षपात या हस्तक्षेप मान लेते हैं। भीतर से वे जानते हैं कि बात सही है, लेकिन अहंकार आड़े आ जाता है। ऐसे समय में धैर्य और भावनात्मक दूरी अधिक उपयोगी होती है। अनुभव बताता है कि स्वयं सीखे गए सबक अधिक गहरे उतरते हैं।

इसलिए हमें अनावश्यक विवादों से दूर रहना चाहिए। छोटे-छोटे दुखों को निगलकर आगे बढ़ना सीखना चाहिए, क्योंकि अंततः हम खुश रहना चाहते हैं। विवादों से बचना कमजोरी नहीं, बल्कि एक सजग और गरिमामय निर्णय है। इस उम्र में खुशी अत्यंत मूल्यवान और नाज़ुक होती है। शांति वास्तव में आत्म-देखभाल का सर्वोच्च रूप है।

डॉक्टर भी बार-बार हमें तनाव से बचने की सलाह देते हैं, क्योंकि तनाव का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। मानसिक शांति, दीर्घायु और बेहतर स्वास्थ्य—तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। सभी विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि शांत मन जीवन को लंबा और स्वस्थ बनाता है।
बुज़ुर्ग होना अप्रासंगिक होना नहीं है, बल्कि परिष्कृत होना है। शोर की जगह विवेक लेता है, कठोरता की जगह कोमलता और जल्दबाज़ी की जगह गरिमा।

अंत में, हमें यह याद रखना चाहिए कि वरिष्ठजन न केवल परिवार और समाज के लिए, बल्कि स्वयं अपने लिए भी एक आशीर्वाद हैं। 2026 और उसके आगे भी, हमें अपने अस्तित्व को महत्व देना चाहिए। तब हमारे ये स्वर्णिम वर्ष वास्तव में उद्देश्यपूर्ण, प्रसन्न, स्वस्थ और गरिमामय बनेंगे।

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