We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Sunday, November 16, 2025

वरिष्ठ जन की सलाह — भोजन घर का ही अच्छा

पचास के दशक की बात है। हम तब स्कूल में पढ़ते थे। रेस्टोरेंट में जाकर खाना खाना बहुत दुर्लभ बात हुआ करती थी। बड़े शहरों को छोड़ दें, तो बाकी छोटे कस्बों में तो रेस्टोरेंट होते ही बहुत कम थे। अगर किसी को काम के सिलसिले में दूसरे गांव या शहर जाना पड़ता था, तो वह किसी रिश्तेदार के घर ही रुकता था। बहुत से व्यापारी वर्ग के लोगों की अपनी-अपनी गद्दियां होती थीं, जहां बाहर से आने वाले व्यापारी रुकते और वहीं उनके भोजन का भी प्रबंध रहता था। कहीं-कहीं महाराज के “बासे” भी चलते थे — जहां बहुत ही कम मूल्य में भरपूर, घर जैसा भोजन मिल जाता था।

फिर साठ का दशक आया। हम कॉलेज पहुंचे तो रेस्टोरेंट कभी-कभी ही जाते थे — जब किसी मित्र का जन्मदिन होता था, या किसी खास मौके पर। परंतु सामान्य जीवन में भोजन घर पर ही होता था। धीरे-धीरे समय बदलता गया। नौकरी या कारोबार के सिलसिले में जब अपने शहर से बाहर जाना शुरू हुआ, तो रिश्तेदारों के यहां रुकने की बजाय होटल में रुकने का चलन बढ़ गया। और स्वाभाविक ही भोजन भी बाहर का होने लगा।

आज की दुनिया तो बिल्कुल ही अलग हो गई है। युवा अब अकेले रहते हैं — काम के सिलसिले में परिवार से दूर। और उनका भोजन किसी “जोमैटो” या “स्विगी” जैसी सेवाओं के जरिए सीधे दरवाजे पर पहुंच जाता है। समय की कमी, सुविधा की चाह, और कभी-कभी ‘टेस्ट’ के मोह में, रसोई का चूल्हा ठंडा पड़ता जा रहा है।

परंतु इस नई जीवनशैली का असर स्वास्थ्य पर कितना गहरा पड़ा है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। जीवन-प्रत्याशा (life expectancy) तो बढ़ी है, लेकिन स्वस्थ जीवन घटा है। अब तो युवावस्था में ही लोग गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में आने लगे हैं। रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, हार्ट अटैक — ये सब अब बुजुर्गों की नहीं, युवाओं की बीमारियां बन चुकी हैं। कम उम्र में मृत्यु के बढ़ते आंकड़े एक चेतावनी हैं — शायद इस बात की कि घर का भोजन ही असली दवा था, जिसे हमने नज़रअंदाज़ कर दिया।

घर का भोजन न करने का एक और गहरा सामाजिक पहलू भी है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक बहुत ही सार्थक लेख वायरल हुआ — “The Silent Kitchen — A Cultural Warning from America to India.” इसमें बताया गया है कि जब घर का चौका बंद होने लगता है, तब परिवार का विघटन शुरू हो जाता है। अमेरिका इसका सजीव उदाहरण है।

इस पोस्ट के अनुसार, 1971 में जहाँ 79% अमेरिकी पारिवारिक जीवन में थे, आज वहां केवल 20% रह गए हैं। तलाक़ की दर बढ़ी है, अकेलेपन का संकट विकराल हुआ है, और मानसिक रोगों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई है। जब रसोई से धुआं उठना बंद हुआ, तो घर से अपनापन भी उठ गया।

दूसरी ओर जापान को देखिए — वहां आज भी घर पर भोजन बनता है, परिवार साथ बैठकर भोजन करता है, और शायद यही कारण है कि जापानी लोग विश्व में सबसे लंबी उम्र जीते हैं। घर का भोजन वहां सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि परिवार को जोड़े रखने का माध्यम है।

भारत की संस्कृति भी सदियों से यही सिखाती आई है — “अन्नं ब्रह्म” यानी भोजन में ईश्वर का वास है। भोजन केवल शरीर को नहीं, मन और आत्मा को भी पोषित करता है। जब माँ या पत्नी प्रेम से भोजन परोसती है, तो वह सिर्फ स्वाद नहीं देती — वह घर का स्नेह, सुरक्षा और संस्कार परोसती है।

आज के माता-पिता और दादा-दादी की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को इस परंपरा का मूल्य समझाएं। घर की रसोई को “साइलेंट किचन” बनने से बचाना है। साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा को फिर जीवित करना है। यह केवल स्वास्थ्य की नहीं, संस्कार की भी रक्षा है।

एक समय था जब पूरे परिवार का एक साथ बैठकर भोजन करना दिन का सबसे सुखद क्षण होता था। वहां हंसी होती थी, संवाद होता था, दिनभर की बातें होती थीं। यह सिर्फ भोजन नहीं, रिश्तों का बंधन था। आज अगर हम उस परंपरा को पुनः जीवित कर लें, तो न केवल सेहत सुधरेगी, बल्कि परिवार में प्रेम, एकता और शांति भी बढ़ेगी।

हम वरिष्ठ जनों की यही सलाह है —

रसोई का चूल्हा ठंडा मत होने दीजिए।
घर के भोजन की थाली में सिर्फ स्वाद नहीं, जीवन की मिठास है।
यह हमारी संस्कृति की पहचान है, हमारी सेहत की सुरक्षा है, और हमारे परिवार की आत्मा भी।

आइए, एक बार फिर संकल्प लें —

हम अपने किचन को साइलेंट नहीं होने देंगे!
क्योंकि घर का भोजन ही सच्चा पोषण है, और घर का साथ ही सच्चा जीवन।

Thursday, November 13, 2025

Elders – It’s Time to Live for Yourself

Recently, through the Never Say Retired platform, we have been sharing a thought almost every day — a small spark of reflection. One of those thoughts said: “Give time to yourself — your first need is you.” What a profound truth! Especially for us seniors, this message holds a mirror to our lives.

All our lives, we have lived for others — for our families, our jobs, our responsibilities. From education to employment, from raising children to fulfilling endless duties, we were always running — often forgetting that we too existed. Now that we’ve reached the golden years of life, it’s time to pause, breathe, and give ourselves the attention we truly deserve. It’s time to say — “Now, I will also live for myself.”

As we age, both body and mind change. That’s natural. But ignoring these changes is not wise. Let us take a pledge — to make our golden years truly golden — by giving time, care, and love to ourselves.

Here’s how we can start:

  1. Spend time with your body
  2. Make walking a habit
  3. Enjoy sunshine and self-massage
  4. Stay connected
  5. The real way to be stress-free
  6. Revive your old hobbies
  7. Befriend yourself

Spend time with your body

Out of the 24 hours in a day, give at least two hours to your physical and mental well-being. Exercise a little, practice yoga or pranayama, meditate, or simply go for a walk.

These small efforts improve sleep, digestion, and mood — and fill us with fresh energy. Remember — your body is now your closest companion; take care of it like a friend.

Make walking a habit

Our legs are the foundation of our independence. Once they lose strength, life becomes confined within four walls. That’s why we must walk at least 5000 steps every day — in the park, on the terrace, or even indoors. Walking improves blood circulation, strengthens muscles, and keeps the mind active. It’s the simplest and most powerful medicine — for free!

Enjoy sunshine and self-massage

For elders, sunlight is a natural healer. In winter, make it a routine to sit in the sun for a while and gently massage your body with oil. If no one is available for a massage, do it yourself — especially your feet and legs. This improves blood flow, relaxes the body, and uplifts the mind. Think of it as a peaceful ritual — “meditation through motion.”

Stay connected

In earlier times, conversations meant face-to-face meetings. Now, thanks to technology, staying in touch is easier than ever. Make it a daily rule — talk to someone every day — a family member, a friend, or even an old colleague. Conversations strengthen relationships, reduce loneliness, and bring smiles to both sides. Sometimes, all it takes is a simple phone call to make your day brighter.

The real way to be stress-free

Doctors often say, “Don’t take tension.” But very few tell us how not to take tension.

The real answer lies in positive engagement. When we immerse ourselves in something we love — reading, gardening, music, spiritual study, or volunteering — stress quietly disappears. When the mind is constructively occupied, there’s no room left for negativity.

Revive your old hobbies

Many of us sacrificed our hobbies while fulfilling duties. Now that time is with us again, let’s return to them. Paint, write, sing, read, photograph, or play an instrument — whatever gives you joy. When you follow your passion, your spirit feels young again. Hobbies feed the soul — and a nourished soul keeps the body healthy.

Befriend yourself

Perhaps the most important relationship is the one you have with yourself. Spend some quiet moments alone — reflect, write, listen to music, or simply sit in silence. When you connect with your inner self, peace naturally follows. It’s this peace that gives meaning to the rest of life.

These years are not an ending — they are a beautiful new beginning. After decades of living for others, it’s time to live for yourself. Give time to your body, your mind, and your soul —
Because now, your first need is truly you.

Videos based on all articles are available on Never Say Retired YouTube channel.

बुजुर्ग खुद को समय जरूर दें - 7 मंत्र

‘नेवर से रिटायर्ड’ के प्लेटफॉर्म से पिछले कुछ समय से हम रोज एक सुविचार साझा करने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में एक विचार ने मुझे विशेष रूप से छू लिया — “खुद को समय जरूर दें, आपकी पहली जरूरत आप खुद हैं।” कितना गहरा सत्य है यह वाक्य! और विशेषकर हम जैसे वरिष्ठजनों के लिए तो यह और भी अधिक प्रासंगिक है।

हमने जीवन का अधिकांश हिस्सा दूसरों के लिए जीते हुए बिताया। पढ़ाई, नौकरी, परिवार बसाना, बच्चों की पढ़ाई, विवाह, करियर — जिम्मेदारियों का सिलसिला कभी थमता ही नहीं था। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई, अपने लिए समय निकालना और भी कठिन होता गया। हर वक्त किसी न किसी की चिंता, किसी न किसी काम का बोझ। लेकिन अब, जब हम जीवन के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां दायित्वों का बोझ कुछ हल्का हुआ है — यह समय है अपने आप से मिलने का, स्वयं की देखभाल का, स्वयं को प्राथमिकता देने का।

हम सबको यह स्वीकार करना होगा कि उम्र के साथ शरीर और मन दोनों में बदलाव आता है। यह स्वाभाविक है, पर इन्हें नजरअंदाज़ करना ठीक नहीं। अब हमें अपने जीवन के ‘सुनहरे वर्षों’ को संवारने का संकल्प लेना होगा।

आइए देखें कि हम अपने लिए क्या-क्या कर सकते हैं

  1. शरीर को रोज समय दें
  2. रोज 5000 कदम चलने की आदत डालिए
  3. धूप और तेल मालिश – दोनों का संग
  4. रोज संवाद बनाए रखें
  5. टेंशन से निपटने का सही उपाय
  6. अपने शौक फिर से जिएं
  7. खुद से दोस्ती करें

शरीर को रोज समय दें

दिन के 24 घंटों में से कम से कम दो घंटे अपने शरीर और मन के लिए निकालिए। थोड़ा टहलना, हल्का व्यायाम, योगासन या प्राणायाम — कुछ भी जो आपको सहज लगे। यह न केवल शरीर को सक्रिय रखेगा, बल्कि मानसिक ताजगी भी देगा। रात को नींद अच्छी आएगी, पाचन सुधरेगा और मन प्रसन्न रहेगा। याद रखिए — आपका शरीर अब आपका सबसे बड़ा साथी है, इसे अनदेखा मत कीजिए।

रोज 5000 कदम चलने की आदत डालिए

हमारे पैर हमारे जीवन का आधार हैं। जब पैर जवाब दे जाते हैं तो दुनिया छोटी हो जाती है — घर की चारदीवारी तक सीमित। इसलिए ज़रूरी है कि हम रोज़ कम से कम 5000 कदम चलें। चाहे घर के अंदर ही टहलें या पास के पार्क में, चलना न छोड़िए। पैरों की ताक़त, उनमें रक्त प्रवाह, झनझनाहट या सुन्नपन — ये सब चलने से ही सुधरते हैं। चलना जीवन की गति को बनाए रखने का सबसे सस्ता और असरदार उपाय है।

धूप और तेल मालिश – दोनों का संग

बुजुर्गों के लिए धूप किसी दवा से कम नहीं। सर्दी के मौसम में धूप में बैठना और हल्की तेल मालिश करना शरीर के लिए वरदान है। अगर किसी मसाज वाले की व्यवस्था न हो, तो खुद ही पैरों, हाथों और पीठ पर तेल मलें। यह न केवल रक्त संचार को बढ़ाता है, बल्कि मन को भी सुकून देता है। धूप में बैठकर मालिश करना एक तरह का “मेडिटेशन इन मोशन” है — जहां शरीर और मन दोनों विश्राम पाते हैं।

रोज संवाद बनाए रखें

हमारे समय में जब फोन या व्हाट्सऐप नहीं थे, तो मिलना-जुलना ही संवाद का माध्यम था। अब, तकनीक ने दूरी मिटा दी है — बस इच्छा होनी चाहिए। हर दिन कुछ न कुछ बातचीत कीजिए — परिवारवालों से, पुराने मित्रों से, पड़ोसियों से। संवाद से रिश्ते मज़बूत होते हैं, मन हल्का होता है और अकेलेपन का बोझ कम होता है। कभी किसी को फोन लगाइए, कभी किसी पुराने मित्र से मिलने जाइए — क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, और बुजुर्गावस्था में समाज ही हमारी ताकत है।

टेंशन से निपटने का सही उपाय

डॉक्टर अक्सर कहते हैं — “टेंशन मत लीजिए।” लेकिन यह कोई नहीं बताता कि टेंशन न लेने का उपाय क्या है! मेरा अनुभव कहता है कि सकारात्मक व्यस्तता ही इसका इलाज है।जब हम किसी प्रिय कार्य में मन लगाते हैं — बागवानी, पढ़ना, संगीत, धार्मिक क्रियाएं या सेवा कार्य — तो मन में नकारात्मकता टिक नहीं पाती। अपने जीवन में खालीपन को भरना है तो सकारात्मक क्रियाओं से भरिए, शिकायतों से नहीं।

अपने शौक फिर से जिएं

जीवनभर रोजगार और जिम्मेदारियों में हममें से अधिकांश ने अपने शौक को किनारे रख दिया। किसी को पेंटिंग पसंद थी, किसी को लेखन, किसी को संगीत या फोटोग्राफी। अब, जब समय है, तो इन अधूरे शौकों को फिर से जगा दीजिए। यकीन मानिए, जब आप अपने मन की किसी रुचि में खो जाते हैं, तो शरीर भी जवान महसूस करता है। शौक आत्मा का पोषण करते हैं, और आत्मा को सशक्त किए बिना हम शरीर को स्वस्थ नहीं रख सकते।

खुद से दोस्ती करें

कभी-कभी सबसे जरूरी रिश्ता होता है — अपने आप से। एकांत में कुछ समय खुद के साथ बिताइए। सोचिए कि आप वास्तव में क्या चाहते हैं, किस चीज़ में शांति मिलती है। डायरी लिखिए, संगीत सुनिए, या बस खामोशी में बैठिए। खुद से संवाद करना आत्मिक ऊर्जा देता है — और यही ऊर्जा हमारे बाकी जीवन को अर्थ देती है।

जीवन का यह पड़ाव ‘अंत’ नहीं, बल्कि एक नया आरंभ है — जब हम अनुभव, शांति और आत्मसंतोष के साथ जी सकते हैं। हमने वर्षों तक सबके लिए जिया, अब वक्त है अपने लिए जीने का। अपने शरीर, मन और आत्मा को समय दीजिए — क्योंकि अब आप ही आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं।

कभी हम क्लासरूम में एक साथ बैठते थे!

याद है वो दिन—कोई पचास-साठ वर्ष पहले—जब हम सब एक ही क्लासरूम में बैठते थे। लकड़ी की बेंचें, ब्लैकबोर्ड, चॉक की हल्की सी धूल और घंटी की आवाज़ — बस यही तो था हमारा संसार। हमारे क्लासरूम में कोई चालीस बच्चे होते थे। आज के जमाने में तो शिक्षा विभाग नियम बनाता है कि एक कक्षा में इतने से अधिक विद्यार्थी नहीं होने चाहिए, वरना स्कूल की मान्यता ही खतरे में पड़ जाएगी। पर तब किसी को इन बातों की परवाह नहीं थी। शायद आज के मापदंड से ज्यादा बच्चे थे क्लासरूम में, पर अपनापन भी उतना ही था। और हां, उन दिनों ज्यादातर लड़को और लड़कियों के लिए अलग अलग स्कूल होती थी।

हम सब एक जैसी यूनिफॉर्म पहनते थे — खाकी पैंट और सफेद शर्ट। लंच ब्रेक में टिफिन बॉक्स खुलते ही पूरा क्लासरूम खुशबू से भर जाता। किसी के डिब्बे में पराठा, किसी के में इडली या पूरी-सब्जी। एक-दूसरे का खाना चखना, मजाक में डिब्बा छिपाना — यही तो हमारी दोस्ती की मिठास थी। और फिर, छुट्टी की घंटी बजते ही सब अपने-अपने घर की ओर निकल जाते, लेकिन जाते-जाते “कल मिलते हैं!” जरूर कहते।

उस वक्त किसे मालूम था कि यह “कल” धीरे-धीरे कितने सालों के फासले में बदल जाएगा!

वो क्लासरूम जहां लकड़ी की बेंचें थीं, चॉक की खुशबू थी और दोस्ती की सादगी। वक्त बदला, पर वो अपनापन आज भी दिल में है। कभी हम सब उसी एक ही क्लासरूम में बैठते थे — अब बस तस्वीरों में वो पल मुस्कुराते हैं। क्लासरूम ने सिखाया था — साथ चलना ही असली सफलता है। वही सीख आज भी जीवन का आधार है।

वो बच्चे, जो एक साथ बेंच पर बैठकर एक ही शिक्षक से पढ़ाई करते थे, आज जिंदगी के अलग-अलग मोड़ों पर हैं। कोई डॉक्टर बना, कोई इंजीनियर, कोई सरकारी अफसर, कोई व्यापारी। कुछ ने अपने घर-परिवार के लिए संघर्ष किया, कुछ ने ऊंचे पद हासिल किए। और कुछ को जीवन ने ऐसी चुनौतियों के सामने ला खड़ा किया जिनका सामना करना आसान नहीं था।

कभी-कभी सोचता हूं — एक ही किताबें पढ़ीं, एक ही सवालों के जवाब लिखे, एक ही स्कूल की दीवारों के भीतर बड़े हुए — फिर भी जिंदगी ने सबको इतनी अलग राहों पर क्यों भेज दिया? क्या यह केवल भाग्य का खेल था? या फिर सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता ने हमें अलग-अलग मंजिलों तक पहुंचाया? सच तो यह है कि जीवन एक परीक्षा-कक्ष ही है — बस फर्क इतना है कि इसमें न कोई निर्धारित सिलेबस है, न कोई तय तारीख। यहां हर व्यक्ति का प्रश्नपत्र अलग है। और यहां पास या फेल होने की परिभाषा भी हर किसी की अपनी होती है। किसी के लिए सफलता एक बड़ा पद है, तो किसी के लिए एक सुसंस्कृत परिवार या संतोषपूर्ण मन।

आज जब पुराने सहपाठियों की बातें होती हैं — किसी रीयूनियन में, या सोशल मीडिया पर मिलने पर — तो एक अजीब सी अनुभूति होती है। कुछ चेहरे पहचान में आ जाते हैं, कुछ बदले हुए दिखते हैं। कोई अब भी वही चंचल मुस्कान लिए बैठा है, तो कोई जीवन के अनुभवों से गहराई लिए हुए।

हम सब समय के सांचे में ढलकर अब वरिष्ठ जनों की श्रेणी में पहुंच चुके हैं — सफ़ेद बालों और झुर्रियों के साथ, पर मन अब भी वही बालपन ढूंढ़ता है। कभी-कभी मन करता है कि फिर एक दिन वही क्लासरूम मिले। वही बेंचें, वही ब्लैकबोर्ड, और वही दोस्त। पर अब यह संभव नहीं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया है — स्कूल भी, शहर भी, और हम भी। फिर भी यादें हैं कि मिटती नहीं। वे ही तो हमारी पूंजी हैं।

आज के बच्चे शायद कभी न समझ पाएं कि उस दौर की सादगी में कितनी मिठास थी। न मोबाइल थे, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया — फिर भी हर खबर, हर दोस्ती, हर भावनात्मक जुड़ाव एकदम असली था। आज हम सब जीवन के अनुभवों से भरे हुए हैं। शायद यही उचित समय है कि उन बचपन के दिनों से मिली सीख को, उस सादगी और मिलनसारिता को, अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।

क्लासरूम में बैठने की उस एकता ने हमें यह सिखाया था कि समाज भी एक बड़ा क्लासरूम है — जहां हर किसी को साथ लेकर चलना ज़रूरी है। किसी को पीछे छोड़ देने से सफलता अधूरी रह जाती है। और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा पाठ है — जो उस पुराने स्कूल की दीवारों ने हमें बिना बताए सिखा दिया।

आज, जब कभी पुराने सहपाठियों की तस्वीरें देखता हूं या किसी का संदेश आता है — तो मन कह उठता है, “कभी हम क्लासरूम में एक साथ बैठते थे!” वो साथ अब नहीं है, पर वो अपनापन, वो यादें, वो मासूमियत — आज भी हमारे भीतर जिंदा हैं। और शायद इसी को कहते हैं — वक्त बदल जाता है, पर बचपन कहीं नहीं जाता।

न डॉक्टर, न इंजीनियर — मुझे तो दादा बनना है

हाल ही में एक बेहद दिलचस्प व्हाट्सएप संदेश देखा। एक छोटे बच्चे से पूछा गया कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। जवाब चौंकाने वाला था —

मैं न डॉक्टर बनना चाहता हूं, न इंजीनियर, न अफसर और न मंत्री… मुझे तो दादा बनना है!

और उसके पास इसके पीछे ठोस कारण भी थे। उसने बताया कि दादा जी जब चाहें तब उठते हैं, जब चाहें तब सो जाते हैं। टीवी देखना हो तो किसी की अनुमति नहीं लेनी पड़ती। उन्हें स्कूल नहीं जाना पड़ता, न होमवर्क करना पड़ता है। बस या ट्रेन में भी उन्हें विशेष सहूलियत मिलती है। वे जो चाहें कर सकते हैं, कोई रोक-टोक नहीं!

मैसेज की भाषा और उदाहरणों से लगता था कि यह किसी पश्चिमी देश — अमेरिका या यूरोप — की सोच पर आधारित है। परंतु यह सवाल मन में आया कि क्या भारतीय परिवेश में भी ऐसा ही उत्तर कोई बच्चा दे सकता है? संभवतः बहुत कम बच्चे ऐसा कहेंगे, लेकिन अगर कहें भी, तो उनके कारण कुछ भिन्न होंगे। आखिर बच्चे वही देखते और सीखते हैं जो वे अपने घर में, अपने बड़ों के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।

हमारे आचरण से बनती है अगली पीढ़ी की सोच

हम बुजुर्ग अपने घर के बच्चों के सामने कैसे रहते हैं, कैसी दिनचर्या अपनाते हैं, दूसरों से कैसा व्यवहार करते हैं — यह सब बच्चों पर गहरा प्रभाव डालता है। बच्चे केवल स्कूल की किताबों से नहीं सीखते; बहुत कुछ वे हमें देखकर, हमारे आचरण से सीखते हैं। हमारे शब्दों से ज़्यादा असर हमारे व्यवहार का होता है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी संस्कारवान, अनुशासित और जीवन का आनंद लेने वाली बने — तो हमें वह जीवन स्वयं जीना होगा।

बिना उपदेश दिए भी सिखाने का एक तरीका

यह हमारे लिए एक अद्भुत अवसर है कि हम अपने आचरण के माध्यम से बच्चों में जीवन मूल्यों के बीज बो सकें — बिना सीधे उपदेश दिए। अगर हम रोज सुबह टहलने जाते हैं, व्यायाम करते हैं और कभी-कभी सहजता से बच्चों से यह साझा करते हैं कि “हमारा स्वस्थ रहना इसी नियमितता का परिणाम है,” तो हमें उन्हें अलग से समझाने की ज़रूरत नहीं। वे सब देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं।

यह संदेश उनके मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाता है। हो सकता है कि वे तुरंत इस पर अमल न करें, लेकिन समय आने पर वही संस्कार उनके जीवन का हिस्सा बन जाएंगे।

पूजा, पाठ और आध्यात्मिकता की सहज छाप

इसी तरह जब हम नित्यकर्म के बाद भगवान के सामने शांत भाव से बैठते हैं, प्रार्थना करते हैं या रामायण–महाभारत की कथा सुनाते हैं, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। यह वही समय है जब हम उन्हें कहानियों के माध्यम से धर्म, कर्तव्य, साहस और त्याग जैसे गुणों की सहज सीख दे सकते हैं। यह पाठ्यक्रम से नहीं, वातावरण से सिखाने की प्रक्रिया है — और यह सबसे प्रभावशाली है।

ज्ञान और जिज्ञासा की साझी खिड़की

हर सुबह जब हम अख़बार पढ़ते हैं, तो किसी विशेष समाचार पर बच्चों से चर्चा करना उपयोगी हो सकता है। इससे उनका सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, और साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि दुनिया को समझने के लिए केवल सोशल मीडिया पर्याप्त नहीं। उन्हें यह समझाना कि “पढ़ने की आदत” केवल ज्ञान ही नहीं, भाषा और सोच को भी निखारती है — यह भी एक मूल्यवान सीख है।

संस्कार जो बोलते नहीं, दिखते हैं

घर में जब कोई अतिथि आते हैं, तो बच्चों को बुलाकर उनका अभिवादन कराना, पैर छूकर आशीर्वाद लेना सिखाना — ये सब बातें धीरे-धीरे उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं। थोड़े समय में उन्हें बताने की आवश्यकता ही नहीं रहती; वे अपने आप ऐसा करने लगते हैं।

यही तो संस्कार हैं — जो शब्दों से नहीं, व्यवहार से संप्रेषित होते हैं।

दादा-दादी की भूमिका — अमूल्य और अपूरणीय

आज के तेज रफ्तार युग में जहां माता-पिता अक्सर व्यस्त रहते हैं, वहां दादा-दादी बच्चों के लिए सबसे स्थिर, धैर्यवान और स्नेहमय उपस्थिति होते हैं। उनके पास अनुभव है, समय है और वह आत्मिक शांति है जो बच्चों को सुरक्षा का अहसास कराती है। उनकी मुस्कान, उनका सान्निध्य, और उनका प्यार — ये सब मिलकर बच्चों के व्यक्तित्व की नींव तैयार करते हैं।

शायद इसी कारण वह बच्चा कहता है — “मुझे तो दादा बनना है।” क्योंकि उसे दादा में आजादी दिखती है, स्नेह दिखता है, और सबसे बढ़कर, एक संतुलित जीवन जीने की कला दिखती है। वह जानता है कि डॉक्टर और इंजीनियर बनना भी सम्मानजनक है, पर दादा बनना — यानी जीवन के उस मुकाम पर पहुंचना जहां ज्ञान, अनुभव और प्रेम एक साथ झरते हैं — यह तो सर्वोच्च सम्मान है।

कहने का सार यही है —

बच्चे वही बनते हैं जो वे देखते हैं। हमारे चेहरे पर मुस्कान, हमारे आचरण में शांति, और हमारे जीवन में अनुशासन — यही उनकी सबसे बड़ी शिक्षा है। अगर हम सचमुच चाहते हैं कि अगली पीढ़ी हमें देखकर कहे “मुझे भी दादा बनना है”, तो हमें वैसा दादा बनना होगा — जो प्रेरणा दे, जो प्रेम दे, और जो जीवन को सुंदर ढंग से जीना सिखाए।

All my articles in English are also posted on website www.neversayretired.in

छोटों के सामने अपने जमाने की बात कम ही करें

हम उम्र के लोगों के साथ बैठने का एक अपना ही आनंद होता है। पुरानी यादें, भूले-बिसरे किस्से, साझा अनुभव — सब एक बार फिर से जीवंत हो उठते हैं। उन पलों में जैसे ज़िंदगी फिर से अपने सुनहरे पन्ने पलटने लगती है। अपने-अपने दौर की बातें सुनाते हुए जब हंसी के ठहाके गूंजते हैं, तो लगता है जैसे समय थम गया हो।

ऐसी बैठकों में बस इतना ध्यान रखना जरूरी है कि बातचीत एकतरफा न हो जाए। ग्रुप में सभी को अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी अभिव्यक्ति की शैली होती है — कोई खुलकर बोल देता है, कोई भीतर ही भीतर संकोच में रह जाता है। अगर हम लगातार बोलते ही चले जाएं, तो कई लोग मन की बात कहने से चूक जाते हैं।

यह भी सच है कि इस उम्र में आकर हममें से बहुत से लोग बातें दोहराने लगते हैं। कोई कम, कोई ज़्यादा — पर यह स्वाभाविक है। इसके पीछे कई कारण हैं। एक तो स्मृति का थोड़ा कमजोर होना, और दूसरा यह कि हमें यकीन नहीं होता कि हमारी कही बात सामने वाले ने सचमुच सुनी या समझी भी है या नहीं। इसलिए कभी-कभी वही बात फिर कह देते हैं।

लेकिन जब हम अपने परिवार के युवा सदस्यों या अन्य छोटों के बीच होते हैं, तो वहां यह स्वाभाविकता थोड़ी सावधानी मांगती है। आज की पीढ़ी की सोच तेज, अभिव्यक्ति मुखर और समय सीमित है। उनमें उतनी सहनशीलता नहीं है कि वे बार-बार दोहराई गई बातें धैर्य से सुनें। यदि आपने एक ही बात दो बार कह दी, तो वे तुरंत टोक देंगे — “आप यह पहले भी बता चुके हैं!” उन्हें यह नहीं सूझता कि दोहराना किसी हठ का नहीं, बल्कि उम्र का स्वाभाविक असर है।

छोटों के साथ बैठते समय एक और बात याद रखनी चाहिए — “हमारे ज़माने में ऐसा होता था” जैसी बातें ज्यादा न कहें। यह वाक्य अक्सर हमारे मुंह से सहज ही निकल जाता है, पर यह युवा मन को दूरी का एहसास कराता है। जब वे अपनी कोई नई बात या अनुभव साझा करते हैं और हम तुरंत अपने दौर की तुलना करने लगते हैं, तो उन्हें लगता है कि हम उनकी बात को कमतर आंक रहे हैं। वे भले कुछ कहें नहीं, पर भीतर से चिढ़ जरूर जाते हैं।

दरअसल, पूरी बात ‘कैसे’ कही जाती है, यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि ‘क्या’ कहा जा रहा है। टोन का ही तो सारा खेल है। वही बात अगर हम सहज, स्नेहपूर्ण लहजे में कहें, तो सामने वाला सहर्ष स्वीकार कर लेता है। लेकिन जरा-सा भी आदेशात्मक या ऊंचे स्वर में कहा गया वाक्य, मन पर चोट कर जाता है।

घर के भीतर तो यह और भी ज्यादा मायने रखता है। कई बार हम भावनाओं में बहकर कह बैठते हैं — “मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ किया, और आज…” या “मैं बड़ा हूं, इसलिए मुझे ज़्यादा पता है।” हमें लगता है कि हम सच्चाई कह रहे हैं, पर सुनने वाले को यह ताना या दोषारोपण जैसा लगता है। बच्चे तब चुप हो जाते हैं, पर दिल से दूरी बढ़ जाती है।

यह भी जरूरी है कि हम हर वक्त उन्हें सीख देने या सुधारने की कोशिश न करें। सुझाव देना अच्छी बात है, पर यह उम्मीद न रखें कि हर सुझाव को तुरंत माना जाएगा। अगर कोई नहीं भी माने, तो बुरा मानने की जरूरत नहीं है। आखिर आज के बच्चे अपनी दुनिया अपने ढंग से बना रहे हैं, जैसे हमने अपने समय में की थी। हमारा अनुभव उनके लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन यह उन पर थोपना नहीं चाहिए।

यह संतुलन ही रिश्तों की मिठास बनाए रखता है। हमें अपने जीवन के अनुभवों का बोझ नहीं, बल्कि प्रकाश बांटना है। युवाओं के सामने हमारी भूमिका एक समझदार मार्गदर्शक की होनी चाहिए, न कि ‘हमेशा सही रहने वाले’ बुजुर्ग की।

एक और बात — चाहे हालात जैसे भी हों, हमें अपने मन में किसी प्रकार की ग्लानि नहीं रखनी चाहिए। यह भावना कि “अब मेरी बात की किसी को आवश्यकता नहीं” या “अब मेरी अहमियत कम हो गई है” — यह मन को कमजोर करती है। उम्र बढ़ने के साथ आत्मसम्मान और सकारात्मक दृष्टि बनाए रखना सबसे बड़ी बात है।

विशेषज्ञ भी कहते हैं कि बुजुर्गों को बातचीत करते रहना चाहिए। बातें करना मन को हल्का रखता है, स्मृति को सक्रिय रखता है, और सामाजिक जुड़ाव बनाए रखता है। पर साथ ही, यह भी ध्यान रखना है कि बातचीत में मिठास, मर्यादा और लचीलापन बना रहे।

हर पीढ़ी की अपनी गति और दृष्टि होती है। हमारी पीढ़ी ने जो देखा और जिया, वह उनके लिए इतिहास है; और जो वे देख रहे हैं, वह हमारे लिए नया अनुभव है। अगर दोनों एक-दूसरे को सुनें, समझें और सम्मान दें, तो अनुभव और उत्साह का सुंदर संगम बन सकता है।

अंततः यही संतुलन हमें रिश्तों को सहेजने और खुद को भीतर से संतुलित रखने में मदद करता है:

बातें करें, पर ध्यान से; साझा करें, पर थोपें नहीं; और सबसे बढ़कर, सुनना न छोड़ें।

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