We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Tuesday, February 24, 2026

जब “रामायण” और “महाभारत” सीरियल्स का जादू था

आज मैं आपको 80 के दशक के उस दौर में ले चलना चाहता हूं, जब भारत टेलीविजन के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर रहा था। वह समय केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि सामूहिक अनुभवों का समय था। आज हम बात करेंगे उन धारावाहिकों की, जिन्होंने भारतीय जनमानस को टेलीविजन से इस तरह जोड़ दिया कि प्रसारण के समय सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था।

उन दिनों दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल हुआ करता था। मनोरंजन के साधन सीमित थे, लेकिन जो था, वह पूरे देश को एक सूत्र में बांध देता था। 1982 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला लोकप्रिय कार्यक्रम “चित्रहार” लोगों के बीच अत्यंत प्रिय था। इसमें पुराने और नए हिंदी फिल्मों के गीत दिखाए जाते थे। इसका प्रसारण शाम के समय होता था, जब परिवार के सभी सदस्य दिनभर के काम से निवृत्त होकर एक साथ बैठते थे। टेलीविजन के सामने बैठना एक पारिवारिक अनुष्ठान जैसा बन गया था।

हमें भली-भांति याद है दूरदर्शन का पहला लोकप्रिय धारावाहिक “हम लोग”, जो जुलाई 1984 में प्रारंभ हुआ। यह मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी थी और लगभग डेढ़ सौ एपिसोड तक चला। इसके पात्र इतने वास्तविक लगते थे कि दर्शक उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानने लगे थे। इसके बाद 1986 में “बुनियाद” का प्रसारण हुआ, जो भारत विभाजन और उसके सामाजिक प्रभावों पर आधारित था। इस धारावाहिक ने लोगों के हृदय को गहराई से छुआ।

फिर आया वह ऐतिहासिक क्षण—जनवरी 1987 में रामानंद सागर की “रामायण” का प्रसारण आरंभ हुआ। यह केवल एक धारावाहिक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन बन गया था। रविवार सुबह 9:30 बजे जैसे ही इसका प्रसारण शुरू होता, पूरा देश थम-सा जाता था। सड़कें सूनी हो जाती थीं, दुकानें बंद रहती थीं और सार्वजनिक परिवहन लगभग खाली दिखाई देता था।

लोगों की श्रद्धा इतनी प्रबल थी कि कई दर्शक प्रसारण से पहले स्नान करते, आरती उतारते और अपने टेलीविजन सेट को फूलों की माला पहनाते थे। भगवान राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल और माता सीता की भूमिका में दीपिका चिखलिया जहां भी जाते, लोग उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते थे। उन्हें साक्षात देवी-देवता के रूप में देखा जाने लगा था। रावण की भूमिका निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी इतने प्रभावशाली थे कि उनके किरदार की मृत्यु के प्रसारण पर उनके गृह नगर में शोक का वातावरण बन गया था।

उस समय सभी के घर में टेलीविजन नहीं हुआ करता था। सैकड़ों लोग एक ही मोहल्ले में एक टीवी सेट के सामने इकट्ठा होकर एपिसोड देखा करते थे। प्रसारण के समय महत्वपूर्ण सरकारी बैठकों तक को टाल दिया जाता था। बिजली विभाग पर भी विशेष दबाव रहता था, क्योंकि थोड़ी देर की बिजली कटौती भी लोगों के रोष का कारण बन जाती थी।

“रामायण” के बाद बी.आर. चोपड़ा की “महाभारत” 1988 से 1990 के बीच प्रसारित हुई। इसका शीर्षक गीत “मैं समय हूँ…” आज भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है। भीष्म पितामह के रूप में मुकेश खन्ना, श्रीकृष्ण की भूमिका में नितीश भारद्वाज और दुर्योधन के रूप में पुनीत इस्सर ने अपने अभिनय से पात्रों को जीवंत कर दिया। “महाभारत” केवल एक पौराणिक कथा नहीं थी, बल्कि नीति, धर्म, राजनीति और मानवीय संबंधों की गहन व्याख्या थी। इसके संवाद इतने प्रभावशाली थे कि लोग उन्हें याद कर लिया करते थे। हर एपिसोड के बाद घरों में उस दिन की कथा पर चर्चा होती थी, मानो कोई पारिवारिक गोष्ठी चल रही हो।

इन धारावाहिकों का प्रभाव इतना व्यापक था कि भारत में टेलीविजन सेटों की बिक्री में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। उन्होंने एक साझा राष्ट्रीय अनुभव का निर्माण किया, जिसमें लाखों लोग एक ही समय पर, एक ही कथा से जुड़ते थे। यह भारतीय सामाजिक इतिहास का एक स्वर्णिम कालखंड था, जिसने मनोरंजन को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ दिया।

यदि भारतीय टेलीविजन के इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत सितंबर 1959 में नई दिल्ली से हुई थी। प्रारंभिक प्रसारण सीमित घंटों के लिए होता था, जबकि दैनिक नियमित सेवा 1965 में शुरू हुई। 1972 में इसका विस्तार मुंबई और अमृतसर तक हुआ। 1982 के एशियाई खेलों ने रंगीन टेलीविजन की शुरुआत कर देश में एक नया युग आरंभ किया। इसी पृष्ठभूमि में 80 का दशक भारतीय टेलीविजन का स्वर्णिम युग बन गया।

आज भले ही सैकड़ों चैनल और ओटीटी प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं, कार्यक्रमों की कोई कमी नहीं है, लेकिन उस दौर की बात ही कुछ और थी। तब विकल्प कम थे, पर अपनापन अधिक था। पूरा देश एक समय, एक भावना और एक कहानी में बंध जाता था। वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक था।

शायद यही कारण है कि “रामायण” और “महाभारत” आज भी भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में स्मरण किए जाते हैं—एक ऐसा दौर, जब टेलीविजन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाला माध्यम था।

स्वीकार्यता: वृद्धावस्था की सबसे बड़ी पूंजी

कहना आसान है, पर करना अत्यंत कठिन—विशेषकर जीवन के उत्तरार्ध में—कि हर कठिन परिस्थिति को सहजता और मुस्कान के साथ स्वीकार किया जाए। उम्र अनुभव तो देती है, पर दुःख, आघात और पीड़ा से बचाव नहीं करती। कई बार तो लगता है कि जीवन के इस पड़ाव पर, जब हम सोचते हैं कि अब बहुत कुछ सह लिया है, कोई अप्रत्याशित घटना भीतर तक हिला देती है।

इस लेख की शुरुआत मैं अपने एक हालिया व्यक्तिगत आघात से कर रहा हूं। मेरे एक मित्र, जिनसे मेरी मित्रता सत्तर वर्षों से अधिक पुरानी है, और जो अब अपने इक्यासीवें वर्ष में हैं, उन्होंने अपने इकलौते पुत्र को खो दिया—महज छियालीस वर्ष की आयु में—एक दुर्घटना में। वह क्षण उनके लिए कैसा रहा होगा, इसकी कल्पना करना भी असंभव है। ऐसी खबर किसी भी माता-पिता के लिए वज्रपात से कम नहीं होती। हम जैसे मित्र भी स्तब्ध रह गए—न समझ में आया कि क्या कहें, कैसे सांत्वना दें। कुछ दुःख शब्दों से परे होते हैं।

यह घटना मुझे वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के साथ हुई एक समान त्रासदी की याद दिला गई। कुछ समय पहले उन्होंने भी अपने उनचास वर्षीय पुत्र को अमेरिका में एक स्कीइंग दुर्घटना में खो दिया था। इसके बाद उन्होंने जो पत्र लिखा, वह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। उस पत्र की पंक्तियां सीधे हृदय को छू जाती हैं—
अपने ही पुत्र को विदा करना एक पिता के लिए असहनीय पीड़ा है। पुत्र का जाना पिता से पहले नहीं होना चाहिए।” ये शब्द केवल उनके नहीं, हर माता-पिता की व्यथा को व्यक्त करते हैं।

जीवन अत्यंत अनिश्चित है। जो हमें सहारा देता है, वह है—आस्था। यह मान लिया जाता है कि वृद्धावस्था हमें हर प्रकार के वियोग के लिए तैयार कर देती है, पर यह सच नहीं है। माता-पिता को खोना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है, पर संतान को खोना कभी भी स्वाभाविक नहीं लगता—किसी भी उम्र में। ऐसा दुःख विश्वास, संतुलन और उद्देश्य—सबको झकझोर देता है। फिर भी समाज वरिष्ठजनों से अपेक्षा करता है कि वे चुपचाप सब सह लें, मजबूत बने रहें।

आधुनिक जीवन हमें अनेक भ्रम देता है—योजना, सुरक्षा, बीमा, संपत्ति, स्वास्थ्य, सफलता। हम मान लेते हैं कि सावधानी हमें हर संकट से बचा लेगी। पर जीवन कोई गारंटी नहीं देता। वह बिना चेतावनी दिए प्रहार करता है। यह सच्चाई विचलित करने वाली है, पर साथ ही मुक्त करने वाली भी। यह हमें हमारी सीमाएं दिखाती है और विनम्रता सिखाती है।

इसीलिए वरिष्ठजनों को यह सीखने का प्रयास करना चाहिए कि हर परिस्थिति को स्वीकार करें—मुस्कान के साथ। यह मुस्कान पीड़ा से इनकार नहीं है, न ही समर्पण। स्वीकार्यता कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रमाण है। यह हमें गरिमा के साथ दुःख को जीने का साहस देती है। जब तर्क असफल हो जाता है, तब आस्था शेष रह जाती है। ईश्वर में विश्वास उस निरर्थक प्रतीत होने वाली पीड़ा को भी अर्थ देता है। हम उसके विधान को समझ न सकें, यह स्वाभाविक है—शायद हमें समझना आवश्यक भी नहीं। आस्था दुःख को मिटाती नहीं, पर उसे वहन करने की शक्ति देती है।

मृत्यु ही जीवन की एकमात्र निश्चित सच्चाई है; उसका समय हमारे हाथ में नहीं। इस सत्य को स्वीकार करना भय नहीं, बल्कि विनम्रता लाता है। वरिष्ठजनों के लिए यह बोध चिंता नहीं, शांति का कारण होना चाहिए। जीवन आगे भी हमें चौंका सकता है—कभी सुख से, कभी दुःख से। हमारी असली परीक्षा सुख में नहीं, संकट में होती है। भावनात्मक संतुलन, आस्था और स्वीकार्यता—ये केवल गुण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता के संकेत हैं।

संयोग ही है कि पिछले सप्ताह मेरा लेख था—“वरिष्ठजन, मन का विश्वास कम न होने दें।” उसमें एक पुरानी, आत्मा को छूने वाली प्रार्थना का उल्लेख था। किसे पता था कि कुछ ही दिनों में इतना निकट का व्यक्तिगत आघात होगा और मुझे फिर से विश्वास, स्वीकार्यता और आंतरिक शक्ति पर लिखना पड़ेगा।

जीवन की लंबी यात्रा तय कर चुके वरिष्ठजन अब यह भलीभांति जानते हैं कि धन, सत्ता और प्रभाव—सब नियति के आगे तुच्छ हैं। जीवन हमेशा न्यायपूर्ण न हो, पर उद्देश्यहीन भी नहीं होता। जिसे हम बदल नहीं सकते, उसे गरिमा के साथ स्वीकार करना ही बुद्धिमानी है। और यदि यह स्वीकार्यता एक शांत मुस्कान के साथ हो सके—तो वही सच्चे अर्थों में उम्र की कमाई हुई समझ है।

Wednesday, February 11, 2026

वरिष्ठजन, मन का विश्वास कम न होने दे

हम सभी को एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण भजन अवश्य याद होगा, जिसे हम अपने बालपन से सुनते आ रहे हैं— “इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।” इन दो पंक्तियों में जीवन का सार छिपा हुआ है। आज के समय में, और विशेष रूप से हम वरिष्ठजनों के लिए, यह पंक्तियां किसी संबल से कम नहीं हैं। आयु कितनी ही क्यों न बढ़ गई हो, यदि अपने ऊपर विश्वास बना हुआ है, तो जीवन की राह कभी पूरी तरह कठिन नहीं होती। विश्वास ही वह शक्ति है जो हमें गिरने के बाद फिर खड़ा होना सिखाती है।

भगवान से हमारी यह प्रार्थना होनी चाहिए कि वे हमें इस विश्वास के पथ से भटकने न दें। जीवन की संध्या में जब शरीर कुछ सीमाएं तय करने लगता है, तब मन का मजबूत रहना और भी आवश्यक हो जाता है। यदि मन हार गया, तो सबसे बड़ा पराजय वहीं हो जाती है। लेकिन यदि मन ने कहा—“मैं कर सकता हूं, मैं सीख सकता हूं, मैं आगे बढ़ सकता हूं”—तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।

इस भजन की अगली पंक्तियां भी उतनी ही गहरी हैं— “हम चले नेक रास्ते पर, हमसे भूल कर भी कोई भूल हो ना।” इसे अपने जीवन में उतारना आसान नहीं है। मनुष्य होने के नाते हमसे भूलें होती रही हैं और आगे भी हो सकती हैं। परंतु जीवन के इस पड़ाव पर, जब हमने अनेक अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है, तब यह प्रयास तो अवश्य होना चाहिए कि हमारी भूलें कम से कम हों। यही वे सुनहरे वर्ष हैं जब हमें अत्यंत संयम, संतुलन और विवेक के साथ जीना है।

यह वह समय है जब हम अपने से छोटे लोगों को उपदेश देने के बजाय, अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करें। हमने जो कुछ भी जीवन में अर्जित किया है—ज्ञान, अनुभव, समझ और धैर्य—उसे बांटना ही वरिष्ठ होने का सबसे बड़ा धर्म है। आज की पीढ़ी के पास तकनीक है, गति है, लेकिन अनुभव की वह गहराई नहीं जो उम्र के साथ आती है। यदि हम शांत भाव से, बिना अहंकार के, अपने अनुभव साझा करें, तो समाज को उसका बड़ा लाभ मिल सकता है।

भजन की आगे की पंक्तियां भी हम वरिष्ठजनों के लिए एक स्पष्ट संदेश देती हैं— “अज्ञान के अंधेरे से दूर रहे, ज्ञान की रोशनी हमें दे।” अक्सर यह मान लिया जाता है कि बढ़ती उम्र में सीखने की आवश्यकता नहीं रहती। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि खतरनाक भी है। सीखना बंद करते ही व्यक्ति भीतर से जड़ हो जाता है। आज के समय में थोड़ी सी अज्ञानता भी हमें भारी नुकसान पहुंचा सकती है—चाहे वह ऑनलाइन फ्रॉड हो, गलत स्वास्थ्य सलाह हो या भ्रामक सूचनाएं।

इसलिए यह आवश्यक है कि हम आज भी सीखते रहें। नई तकनीक से डरने के बजाय, उसे समझने का प्रयास करें। प्रश्न पूछने में संकोच न करें। यह स्वीकार करना कि “मुझे नहीं पता” कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की पहली सीढ़ी है। जब हम ज्ञान की रोशनी को अपने जीवन में प्रवेश करने देते हैं, तब अज्ञान का अंधेरा स्वतः ही दूर हो जाता है।

भजन में आगे कहा गया है कि हम हर बुराई से बचकर रहें और हमारी शेष जीवन-यात्रा भली हो। यह संदेश अत्यंत सरल है, पर उसका पालन उतना ही गहन है। मन में किसी के प्रति द्वेष न हो, बदले की भावना न आए, और यह भावना भी न पनपे कि किसी ने हमारे साथ अन्याय किया है। जीवन बहुत छोटा है इन भावनाओं में उलझने के लिए। शांति और क्षमा ही इस अवस्था के सबसे बड़े आभूषण हैं।

यह सोचने के बजाय कि हमें जीवन से क्या मिला, यह विचार करना अधिक सार्थक है कि हमने जीवन को क्या दिया। अंततः कवि की यही कामना है कि सभी का जीवन मधुबन बन जाए—जहां मधुरता हो, सौहार्द हो और संतोष हो। इससे सुंदर कल्पना और क्या हो सकती है?

पुराने भजन हों या गीत, ऐसा लगता है कि उस समय के रचनाकार शब्दों के माध्यम से आत्मा को स्पर्श करना जानते थे। उनकी रचनाओं में संदेश भी होता था और संवेदना भी। आज भी यदि हम उन पंक्तियों को अपने जीवन में उतार लें, तो बहुत सी उलझनें अपने आप सुलझ सकती हैं।

अंत में, एक बार फिर यही दोहराना चाहूंगा कि हम वरिष्ठजन हर परिस्थिति में अपने मन को मजबूत रखें। यह जीवन की एक सच्चाई है कि जब हम स्वयं पर विश्वास करना नहीं छोड़ते, तब परिस्थितियां भी धीरे-धीरे हमारा साथ देने लगती हैं। जितना अधिक विश्वास हम अपने भीतर जगाएंगे, जीवन की राह उतनी ही सरल और सुखद होती चली जाएगी। यही नेवर से रिटायर्ड अभियान का मूल संदेश है—जीवन के अंतिम क्षण तक विश्वास, उद्देश्य और सक्रियता के साथ जीना।

पांच वर्ष का सफर : नेवर से रिटायर्ड — एक अभियान, एक दृष्टि

शुरुआत : एक विचार से अभियान तक (2020–2021)

नेवर से रिटायर्ड मिशन का औपचारिक शुभारम्भ जनवरी 2021 में हुआ, हालांकि इसका विचार कुछ माह पहले ही मन में आकार लेने लगा था। उस समय मुझे एक विरोधाभास लगातार परेशान कर रहा था। एक ओर औसत आयु बढ़ रही थी और लोग अधिक स्वस्थ जीवन जी रहे थे, वहीं दूसरी ओर 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्ति को जीवन की पूर्णविराम रेखा मान लिया गया था।

सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ा देना समाधान नहीं था, क्योंकि इससे युवाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। वास्तविक समस्या यह थी कि 30–35 वर्षों का अनुभव, ज्ञान और विवेक रखने वाले सेवानिवृत्त नागरिक—जो देश की अमूल्य पूंजी हैं—अनुपयोगी छोड़ दिए जा रहे थे। यदि इस अनुभव को सकारात्मक दिशा में लगाया जाए, तो यह राष्ट्र-निर्माण में बड़ी भूमिका निभा सकता है। यही नेवर से रिटायर्ड की आधारशिला बनी।

एक मित्र की सहायता से वेबसाइट बनी और यह यात्रा औपचारिक रूप से शुरू हुई।

प्रारम्भिक प्रयास : जागरूकता और जुड़ाव

शुरुआत में ध्यान वरिष्ठजनों से जुड़े प्रसंगों और सकारात्मक उदाहरणों को साझा करने पर रहा। समाचार-पत्रों, डिजिटल मीडिया और वास्तविक जीवन से प्रेरित कहानियां वेबसाइट और फेसबुक समूह पर पोस्ट की जाने लगीं।

एक घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय रही—एक वृद्ध महिला की जान केवल इसलिए बच सकी क्योंकि वह एक व्हाट्सऐप समूह का हिस्सा थीं, जहां हर सुबह सभी सदस्य अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे। एक दिन उनके उत्तर न देने पर साथी सदस्यों ने चिंता जताई, घर जाकर देखा और उन्हें अचेत अवस्था में पाया। समय पर अस्पताल पहुंचाने से उनकी जान बच गई। जब इस उदाहरण को साझा कर ऐसे समूह बनाने का आग्रह किया गया, तो कई लोगों ने इसे अपनाया। इसने यह विश्वास और मजबूत किया कि छोटे प्रयास भी जीवनरक्षक बन सकते हैं।

लेखन : प्रेरणा का सशक्त माध्यम

इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के बाद नियमित लेखन आरम्भ हुआ। उद्देश्य था—वरिष्ठजनों को सक्रिय, संलग्न और सकारात्मक बने रहने के लिए प्रेरित करना। मूल दर्शन स्पष्ट था: दूसरों की मदद करके हम वास्तव में अपनी ही मदद करते हैं। सक्रियता से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, मानसिक सजगता बनी रहती है और नकारात्मकता स्वतः दूर होती है। अब तक लगभग 100 लेख लिखे जा चुके हैं, जो वरिष्ठजनों से जुड़े मुद्दों, अवसरों और प्रेरणाओं पर केन्द्रित हैं।

फुटपाथों की दुर्दशा और उसके कारण वरिष्ठजनों की पैदल चलने की आदत पर पड़ने वाले प्रभाव पर लिखा गया एक लेख अत्यंत चर्चित रहा। इस विषय पर माननीय प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा गया, क्योंकि वरिष्ठ-अनुकूल अधोसंरचना सार्वजनिक स्वास्थ्य का ही एक आयाम है।

नीति और पक्ष-प्रस्तुति (Advocacy)

समय के साथ नेवर से रिटायर्ड केवल प्रेरणा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीति-स्तर पर संवाद की दिशा में भी आगे बढ़ा। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी को देखते हुए सेवानिवृत्त शिक्षकों एवं पेशेवरों की सेवाएं लेने का सुझाव दिया गया। इस संबंध में प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री एवं अन्य संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखे गए और लेख भी प्रकाशित हुआ।

इसी क्रम में वृद्धाश्रमों की बढ़ती आवश्यकता, उनकी संख्या, नियमन तथा न्यूनतम सुविधाओं पर भी ध्यान आकर्षित किया गया। बदलते पारिवारिक ढांचे और बढ़ती आयु के साथ वृद्धाश्रम अब सामाजिक विफलता नहीं, बल्कि समय की आवश्यकता हैं। नेवर से रिटायर्ड के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री को इस विषय पर विस्तार से अवगत कराया गया, ताकि वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक, सुरक्षित और मानवीय जीवन मिल सके।

डिजिटल विस्तार

वरिष्ठजनों तक व्यापक पहुंच के लिए यूट्यूब चैनल शुरू किया गया, जहां 100 से अधिक वीडियो उपलब्ध हैं—सभी वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े विषयों पर। इसके अतिरिक्त फेसबुक समूह व पेज, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम, लिंक्डइन तथा हाल ही में शुरू किया गया व्हाट्सऐप चैनल भी सक्रिय हैं।

मान्यता और सहभागिता

आवासीय परिसरों और वरिष्ठ नागरिक समूहों से संबोधन के निमंत्रण मिलने लगे। एक सुखद क्षण तब आया जब सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के एक अधिकारी ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए कानूनी जागरूकता सत्र आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। यह संकेत था कि यह अभियान अब संस्थागत स्तर पर भी पहचाना जा रहा है।

हर तरफ से मिल रही सराहना

इस मिशन को महत्वपूर्ण हस्तियों और कई मित्रों एवं रिश्तेदारों से सराहना मिलने लगी। कई संतों और सार्वजनिक हस्तियों ने संदेश भेजे, जिनके प्रशंसापत्र वेबसाइट पर दर्ज किए गए हैं। मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला जब न्यूजीलैंड से किसी ने फोन करके अपनी 75 वर्षीय मां के लिए सुझाई जाने वाली गतिविधियों के बारे में पूछा, या जब सिलीगुड़ी से किसी ने उस वृद्धाश्रम के बारे में और जानकारी मांगी जिसके बारे में मैंने अपने हालिया लेख में लिखा था। कई शुभचिंतकों ने मुझे प्रतिदिन संदेश/वीडियो भेजने शुरू कर दिए हैं, जो मेरे मिशन से संबंधित हैं। वास्तव में, इनसे मुझे अपने लेखन में मदद मिल रही है।

आगे की राह

पांच वर्षों में नेवर से रिटायर्ड एक विचार से आंदोलन की दिशा में बढ़ा है। मूल विश्वास आज भी अटल है—

सेवानिवृत्ति जीवन से विदाई नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण योगदान के एक नए चरण की शुरुआत है।