We have all been criticising about what is not being done by the government. However, we rarely give our own solutions to any problem that we see. May be the suggestion is ridiculous - but still if we look things in a positive way may be we can suggest solutions which some one can like and decide to implement. I know this is very wishful thinking but this is surely better than just criticising.

Monday, September 22, 2025

वरिष्ठ जन की चिंता – सिकुड़ता परिवार

 हाल ही में व्हाट्सएप पर एक मजेदार, लेकिन सोचने पर मजबूर कर देने वाला वीडियो देखने को मिला। वीडियो को हास्य के रूप में प्रस्तुत किया गया था, परंतु इसके भीतर छिपा संदेश हमारे समाज की गंभीर समस्या को उजागर करता है। इसमें दिखाया गया कि एक देवी जी ने दुकान खोली है, जहां पीछे बैनर लगा है – “यहां रिश्तेदार भाड़े पर मिलते हैं।”

एक कपल जिनके घर में बेटे की शादी होने वाली है, को अपने समारोह को सफल बनाने के लिए रिश्तेदार चाहिए, लेकिन उनके पास वास्तविक रिश्तेदार नहीं हैं, और वो पहुंच जाते है इस दुकान पर। देवी जी की इस दुकान में हर प्रकार के रिश्तेदार उपलब्ध हैं – फूफा, मासी, बुआ, चाचा – सभी किराए पर, और सबकी अपनी-अपनी दरें।

पहली नजर में यह दृश्य हंसी पैदा करता है, लेकिन जब गहराई से देखें तो यह हमारे परिवारिक ढांचे की बदलती हकीकत को सामने लाता है। कभी भारतीय समाज में संयुक्त परिवार उसकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करते थे।

परिवार केवल माता-पिता और बच्चों तक सीमित नहीं था, बल्कि दादा-दादी, चाचा-चाची, मामा-मामी, बुआ-मासी और उनके बच्चों तक फैला हुआ होता था। इन रिश्तों की मिठास ही परिवारों की असली पूंजी थी। लेकिन समय के साथ हमने “हम दो, हमारे दो” को अपनाया और धीरे-धीरे परिवार छोटे होते चले गए।

आज की स्थिति यह है कि बच्चे यह भी पूछने लगे हैं कि मासी या बुआ होती कौन है। क्योंकि घर में उन्हें ये रिश्ते देखने को ही नहीं मिलते। चचेरे और ममेरे भाई-बहनों की परंपरा लगभग समाप्ति की ओर है। अगली पीढ़ी के लिए यह रिश्ते किताबों या फिल्मों में ही रह जाएंगे।

इसका एक कारण बदलती जीवनशैली और सोच भी है। आज के युवा देर से विवाह करना पसंद करते हैं। करियर और आर्थिक स्थिरता पाने की होड़ में विवाह टलते-टलते तीस की उम्र पार कर जाते हैं। फिर जब शादी होती भी है, तो बच्चे पैदा करने में भी संकोच रहता है। “एक ही काफी है, और न भी हुआ तो भी चलेगा” – यह सोच बहुत आम हो गई है।

इसके पीछे कई कारण हैं:

  1. नौकरी प्रधान मानसिकता – पहले परिवार के लोग कृषि या व्यवसाय से जुड़े रहते थे, जहां परिवार बड़ा होना सहायक सिद्ध होता था। लेकिन अब अधिकतर लोग नौकरी पर आश्रित हैं। नौकरी में समय और अवसर सीमित रहते हैं, जिससे बड़े परिवार की कल्पना ही कठिन हो जाती है।
  2. शिक्षा और खर्च का दबाव – आज की शिक्षा बेहद महंगी है। एक बच्चे की पढ़ाई का खर्च ही माता-पिता की कमाई का बड़ा हिस्सा ले लेता है। ऐसे में दूसरा बच्चा पालना आर्थिक जोखिम जैसा लगता है।
  3. स्वास्थ्य पर असर – देर से विवाह करने और मातृत्व-पितृत्व टालने से स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं। फर्टिलिटी की समस्याएं अब युवाओं में भी आम होती जा रही हैं। यही वजह है कि गंभीर बीमारियां भी जल्दी आ घेरती हैं।

इन सब कारणों से परिवार छोटा ही नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी सिकुड़ता जा रहा है। रिश्तों की गर्माहट, सामूहिकता की शक्ति और पारिवारिक सहयोग – ये सब धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। पहले शादी-ब्याह, त्यौहार या संकट के समय पूरा परिवार साथ खड़ा होता था। अब कई घरों में यह जिम्मेदारी केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित रह गई है। बुजुर्ग माता-पिता अकेलापन महसूस करने लगे हैं, क्योंकि उनके आसपास अब वही भीड़भाड़ वाला परिवार नहीं रहा।

इसका समाधान क्या हो सकता है? क्या हम इस प्रवृत्ति को बदल सकते हैं?

समाजशास्त्री और चिंतक मानते हैं कि हमें फिर से परिवार की अहमियत समझनी होगी। संयुक्त परिवार भले ही आज के दौर में कठिन हो, लेकिन कम से कम रिश्तों को जीवित रखना हमारी जिम्मेदारी है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि रिश्ते केवल खून के नहीं, बल्कि भावनाओं के बंधन से भी जुड़े होते हैं। त्योहारों पर रिश्तेदारों से मिलने जाना, बच्चों को दादी-नानी की कहानियां सुनाना, पारिवारिक आयोजनों में सबको शामिल करना – यह छोटी-छोटी बातें बड़े बदलाव ला सकती हैं।

साथ ही, सरकार और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। अगर शिक्षा और स्वास्थ्य का बोझ कम किया जाए तो लोग परिवार बढ़ाने के लिए अधिक सहज होंगे। धार्मिक और सामाजिक संगठन भी विवाह और परिवार की पवित्रता को लेकर जागरूकता फैला सकते हैं। मीडिया का दायित्व भी है कि वह परिवार के मूल्यों को हास्य या बोझ के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के आधार के रूप में प्रस्तुत करे।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह विशेष चिंता का विषय है। वे ही वह पीढ़ी हैं जिन्होंने बड़े परिवारों की रौनक देखी है। आज जब वे अपने बच्चों और पोते-पोतियों के बीच अकेले पड़ते जा रहे हैं, तो उन्हें सबसे अधिक पीड़ा होती है। इसलिए यह चर्चा केवल समाजशास्त्र या अर्थशास्त्र की नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की भी है।

यदि हमने समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए तो वह दिन दूर नहीं जब रिश्तेदार किराए पर मिलने की यह कॉमेडी वीडियो, हकीकत में बदल जाएगी। आने वाली पीढ़ियां पारिवारिक मूल्यों से वंचित हो जाएंगी और सामाजिक ढांचा और अधिक कमजोर हो जाएगा। इसलिए आज जरूरत है कि हम सब मिलकर परिवार के महत्व को पुनर्जीवित करें और रिश्तों की डोर को मजबूत बनाएं। यही हमारे समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।

बुजुर्गों को सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करें

मेरी एक भतीजी अक्सर मुझे सलाह देती है कि अब मुझे गाड़ी नहीं चलानी चाहिए। कहती है, “अब आप 78 साल के हो गए हैं, आपको ड्राइवर रखना चाहिए या Uber से चलना चाहिए।” दूर रहने वाली एक नातिन को जब पता चला कि मैं अब भी गाड़ी खुद चलाता हूं, तो वह हैरान रह गई।

हाल ही में फेसबुक पर एक पोस्ट देखी—92 साल के एक बुज़ुर्ग आत्मविश्वास से बता रहे थे कि वे आज भी गाड़ी चलाते हैं। मुझे खुशी हुई। क्योंकि मैं मानता हूं कि गाड़ी चलाना सिर्फ एक यात्रा का माध्यम नहीं है, बल्कि एक बेहतरीन मानसिक व्यायाम भी है। यह हमें सतर्क रखता है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है और सबसे बड़ी बात—स्वतंत्रता का अनुभव कराता है।

अक्सर हम देखते हैं कि घर में बच्चों या युवाओं की ओर से बुज़ुर्गों को कुछ न करने की सलाह दी जाती है—“ये मत उठाइए, ज्यादा मत चलिए, थक जाएंगे, गिर जाएंगे।” इरादे नेक होते हैं, पर असर उल्टा हो सकता है। ज़रूरत से ज़्यादा सावधानी बुज़ुर्गों को निर्भर बना देती है।

यदि बुज़ुर्ग कोई काम नहीं करेंगे, तो उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होता जाएगा। शरीर कमज़ोर पड़ने लगेगा, और मन भी सुस्त हो जाएगा। इसलिए ज़रूरी है कि उन्हें रोजमर्रा के कामों में शामिल किया जाए।

हर काम शारीरिक मेहनत वाला नहीं होता। कपड़े तह करना, पौधों को पानी देना, किसी कॉल का जवाब देना, खाना बनाने में मदद करना—ये छोटे-छोटे काम शरीर और मन दोनों को सक्रिय रखते हैं।

मैंने देखा है कि कई माता-पिता अपने पोते-पोतियों को स्कूल बस स्टॉप तक ले जाते हैं, या पार्क में घुमाने जाते हैं। कभी-कभी बाज़ार से कुछ सामान भी ले आते हैं। ये छोटी यात्राएं बहुत मायने रखती हैं—चलने का अभ्यास होता है, लोगों से मिलने का मौका मिलता है, और दुनिया के साथ जुड़ाव बना रहता है।

जब हम किसी रेस्टोरेंट में जाते हैं और हमारे साथ माता-पिता होते हैं, तो ज़्यादातर समय हम उनके लिए ऑर्डर करते हैं। अगर हम उन्हें मेन्यू थमा दें और कहें, “आज आप सबके लिए ऑर्डर कीजिए,” तो उनका चेहरा खिल उठेगा। यह छोटा सा बदलाव उन्हें एक नई ऊर्जा देता है। जब वे सक्रिय और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं, तो उनकी प्रशंसा करें और उन्हें और प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करें।

सक्रिय उम्रदराज़ी (active aging) का मतलब यह नहीं कि बुजुर्ग जवान होने का दिखावा करें। इसका मतलब है कि वो अपनी उम्र को स्वीकार करते हुए भी जीवन के हर पहलू में सक्रिय रहें। उम्र बढ़ने से व्यक्ति रुक नहीं जाते — वो सिर्फ धीमे होते हैं।

बुजुर्ग व्यक्तियों को उनके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बनाए रखने और समाज में सक्रिय योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्हें नियमित व्यायाम करने, स्वस्थ आहार लेने, सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने, अपना व्यक्तिगत रूप-रंग बनाए रखने और अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। इसके लिए, एक सहायक और सम्मानजनक वातावरण बनाना ज़रूरी है, जहां उनकी ज़रूरतों को समझा जाए और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार जीवन जीने का अवसर मिले।

तो आइए, हम अपने बुज़ुर्गों को ये याद दिलाना बंद करें कि वे बूढ़े हो गए हैं। इसके बजाय, उन्हें यह एहसास दिलाएं कि वे अब भी महत्वपूर्ण हैं, अब भी सक्षम हैं, और अब भी हमारे जीवन का एक मजबूत स्तंभ हैं।

सफेद बाल है
अनुभव की पहचान,
झुर्रीयों में छिपा है
जीवन का गान,
वरिष्ठ नागरिक
हमारे गौरव और सम्मान।

बुढ़ापा सभी को एक आम इंसान बना देता है

आप एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के सीईओ रहे हों, या एक प्रसिद्ध चिकित्सक जिनसे अपॉइंटमेंट लेना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता था, या फिर किसी देश के प्रमुख पद पर रहे हों — आपके जीवन के स्वर्णिम दिनों में आपका सम्मान, प्रभाव और पहचान सर्वोच्च रही होगी। परंतु जैसे-जैसे उम्र ढलती है, समय और बुढ़ापा धीरे-धीरे सबको साधारण बना देता है।

आपने चाहे कितनी भी डिग्रियाँ ली हों, कितने भी पुरस्कार जीते हों, कितने ही बड़े मंचों से भाषण दिए हों — पर बुढ़ापे की दहलीज़ पर कदम रखते ही वह सब पीछे छूट जाता है। यह उम्र वह पड़ाव है जहां सब कुछ एक समान हो जाता है। यहां तक कि जो कभी शिक्षा से वंचित रहा, वह भी आज आपकी ही तरह एक समान ज़िंदगी जी रहा है।

जिन अधीनस्थों को आप आदेश देते थे, वे तो आपकी सेवा-निवृत्ति के साथ ही चले गए। अब आपके मिलने के लिए कोई प्रतीक्षा नहीं करता। कोई खास कार्यक्रम या मीटिंग नहीं होती। पहले जो व्यस्तता और भागदौड़ थी, वह अब एक शांत जीवन में बदल चुकी है।

लेकिन यह बदलाव अनोखा नहीं है, और इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह जीवन की सामान्य प्रक्रिया है, जिससे हर व्यक्ति को होकर गुजरना होता है।

हमें धीरे-धीरे इस नई स्थिति से सामंजस्य बैठाना सीखना होगा। अकेले रहना भी एक कला है, जिसे हमें सीखना होता है। हमारे बुजुर्गों में से बहुत कम लोग हमारे साथ होंगे। और एक दिन हमारा जीवनसाथी भी हमें छोड़कर चला जाएगा। ईश्वर ने हर व्यक्ति के लिए एक निश्चित समय तय किया है जब उसे इस दुनिया से विदा लेनी है। शायद ही कभी ऐसा होता है कि पति-पत्नी एक साथ या बहुत कम अंतर में इस संसार से विदा लें।

इसलिए अपने बढ़ते वर्षों में हमें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए हमारे रिश्ते निभाने में, चाहे वह हमारे परिवार के सदस्यों के साथ हों या देखभाल करने वाले सहायक के साथ। इस उम्र में हमें रिश्तों को समझदारी और संवेदनशीलता से निभाना होता है।

बुढ़ापा केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी बदलाव लाता है। एक समय था जब आपका कैलेंडर मीटिंग्स और यात्राओं से भरा होता था, आज वही कैलेंडर खाली रहता है। फोन की घंटी अब कम बजती है, और सामाजिक दायरा सिमटने लगता है।

परंतु यह समय हमारे अस्तित्व के लिए कोई खतरा नहीं है। यह समय है खुद को एक नए दृष्टिकोण से देखने का। अब आपकी पहचान केवल आपकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उस जीवन से है जिसे आपने जिया है, जिन मूल्यों को आपने अपनाया है और जिन लोगों को आपने छुआ है।

इस जीवन के अंतिम चरण में, हम जो अकेलापन अनुभव करते हैं, उससे बचना मुश्किल है। लेकिन यदि हमने जीवनभर अच्छे संबंध बनाए हैं, तो कुछ लोग हमारे साथ रहेंगे — परिवार के सदस्य, मित्र या देखभाल करने वाले। लेकिन इनसे संबंध रखते समय सतर्कता भी ज़रूरी है। उम्र बढ़ने के साथ हमारी निर्भरता बढ़ती है, और इसी कारण हमें अपने आसपास के लोगों को समझदारी से चुनना चाहिए।

यह समय केवल सावधानी का नहीं, यह हमारे लिए नई परिस्थितियों, विचारों या परिवर्तनों के अनुकूल ढलने की क्षमता को बढ़ाने का है। हमें अपने विचारों और व्यवहार को अनिश्चितता अथवा विभिन्न व्यक्तियों के अनुसार अधिक प्रभावी करना होगा, जिससे बेहतर परिणाम दिखाई दे। आप नई चीजें सीख सकते हैं, नए शौक अपना सकते हैं, और नए रिश्ते बना सकते हैं। जीवन का यह “साधारण” दौर भी बहुत सुंदर हो सकता है — यदि हम इसे अपनाना सीखें।

इन सुनहरे वर्षों में, हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी पहचान किसी पद या पुरस्कार से नहीं होती, बल्कि उस शांति से होती है जो हमारे भीतर होती है, उन रिश्तों से होती है जो हम निभाते हैं, और उस अनुभव से होती है जो हम आने वाली पीढ़ियों को सौंपते हैं।

अंत में, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम गरिमा के साथ जिएं, बदलाव को स्वीकार करें और जीवन की इस साधारण सुंदरता को पूरी तरह महसूस करें। यह मान कर चले कि इस स्थिति में हम अकेले नहीं हैं। हम सब एक आम इंसान हैं इस पड़ाव पर पहूंच कर।

Wednesday, September 03, 2025

Artificial Intelligence – An Opportunity and a Challenge for Senior Citizens

These days, Artificial Intelligence (AI) is being discussed everywhere. It almost feels as if, in the near future, we won’t be able to do anything without it. But what exactly is AI? If we look closely, we have actually been using it for decades—be it a simple calculator or the early computers we worked with. The difference is that today’s AI is far more powerful, versatile, and deeply integrated into our daily lives.

The real concern, however, is that if we stop using our brains actively and begin to rely on AI for every little task, it may weaken our mental agility. Today, even for writing a simple letter or preparing a speech, people turn to ChatGPT. Experts warn that such over-dependence might make us mentally lazy. A video that recently went viral demonstrated the difference between the brain activity of AI users and that of non-users.

When the thought came to me to write my next article on this subject, I shared a short questionnaire with a few groups and also posted it on Facebook. My aim was to understand how much senior citizens (70+) knew about AI and whether they were keen to learn about it. The responses were eye-opening. Most seniors had very little knowledge of AI, yet they expressed great curiosity—especially about how it could be useful in daily life. At the same time, a few elderly individuals were already using AI.

When ChatGPT was launched on 30 November 2022, it took the world by storm. I first read about it in newspapers, and my curiosity grew stronger. In March 2023, I wrote an article titled “From Google to ChatGPT – What’s In It For Senior Citizens?”. Before writing that piece, I had discussed ChatGPT with some of my friends, and to my surprise, none of them had even heard of it. Even today, ChatGPT remains the most talked-about AI tool, but now so many new AI platforms are emerging that it has become difficult to decide which one is truly useful. There is a kind of race—whose AI can do more and better.

There is no doubt that AI is immensely useful, and the future of the world will be shaped by it. India, like other developed nations, is also moving forward in this field. IITs and other institutions are actively teaching and researching AI. Even our Prime Minister frequently refers to AI in his addresses, encouraging young people to advance further in this area.

Negative Aspects of Artificial Intelligence

At the same time, the negative aspects of AI cannot be ignored. Deepfake videos, for instance, have become a major threat, where anyone’s face can be manipulated to spread misleading messages. This makes it increasingly difficult to trust what we see on screen. Recently, I read about a tragic case where a man relied on AI to choose his medicines, which unfortunately led to his death. Although this may be an extreme example, it serves as a cautionary tale. On the other hand, AI has also proved to be a boon in the medical field. One widely shared story on social media told of a rare disease that AI was able to diagnose when even experienced doctors could not.

Therefore, it is essential that senior citizens too become aware of this technology. We possess enough wisdom and life experience to discern what is right and what is misleading, and to decide wisely how and how much to use AI. As part of the Never Say Retired mission, we aim to soon organize a workshop on AI, to help senior citizens understand how they can use it in the right way.

The initiative of the Kerala government in this regard is truly inspiring. Through its program DigiKeralaM, it set out to make every citizen digitally literate. The results were remarkable—even a 105-year-old became digitally literate under this initiative.

One of my 82-year-old acquaintances summed it up beautifully with his comment:

“I disagree with the term Artificial Intelligence. After all, it is nothing but a byproduct of human intelligence—otherwise, how could it have been created? I would rather call it Managed Intelligence.”

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) – वरिष्ठ जनों के लिए अवसर और चुनौती

 आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.) की चर्चा चारों ओर हो रही है। ऐसा लगता है मानो आने वाले समय में इसके बिना कोई काम ही नहीं हो सकेगा। लेकिन ए.आई. वास्तव में है क्या? अगर ध्यान से देखें तो दशकों पहले भी हम इसका उपयोग करते थे—चाहे वह एक छोटा-सा कैलकुलेटर हो या शुरुआती कंप्यूटर। अंतर बस इतना है कि आज की ए.आई. कहीं अधिक सक्षम, व्यापक और हमारे रोजमर्रा के जीवन में गहराई से जुड़ चुकी है।

चिंता की बात यह है कि यदि हम अपने मस्तिष्क का उपयोग कम करने लगें और हर छोटे-बड़े काम के लिए केवल ए.आई. पर निर्भर हो जाएं, तो कहीं यह हमारी मानसिक सक्रियता को कमजोर न कर दे। आज स्थिति यह है कि एक साधारण पत्र लिखने से लेकर भाषण तैयार करने तक लोग चैटजीपीटी का सहारा लेने लगे हैं। इसी कारण कुछ विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अत्यधिक निर्भरता हमें सुस्त बना सकती है। हाल ही में एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें ए.आई. उपयोगकर्ताओं और सामान्य व्यक्तियों के मस्तिष्क की सक्रियता का अंतर दर्शाया गया।

जब मेरे मन में यह विचार आया कि अगला लेख इसी विषय पर लिखूं, तो मैंने अपने कुछ समूहों और फेसबुक पर वरिष्ठ नागरिकों (70+) से जुड़े लोगों के बीच एक प्रश्नावली साझा की। उद्देश्य था यह समझना कि उन्हें ए.आई. के बारे में कितनी जानकारी है और क्या वे इसे सीखने में रुचि रखते हैं। प्रतिक्रियाएं चौंकाने वाली रहीं। अधिकांश वरिष्ठ जनों को ए.आई. के बारे में कम जानकारी थी, लेकिन सभी जानना चाहते थे कि यह रोजमर्रा की जिंदगी में किस तरह उपयोगी हो सकता है। वहीं, कुछ वरिष्ठ ऐसे भी निकले जो पहले से इसका प्रयोग कर रहे थे।

30 नवंबर 2022 को जब चैटजीपीटी सामने आया, तो इसने दुनिया को चौंका दिया। मैंने जब इसके बारे में अखबारों में पढ़ा, तो जिज्ञासा जागी और मार्च 2023 में मैंने इस पर एक लेख लिखा—“From Google to ChatGPT – What’s In It For Senior Citizens?”। उस समय अपने मित्रों से चर्चा की, तो आश्चर्य हुआ कि किसी को इसके बारे में पता ही नहीं था। आज भी सबसे ज़्यादा प्रचलन चैटजीपीटी का ही है, लेकिन अब तो हर रोज नए-नए ए.आई. प्लेटफॉर्म सामने आ रहे हैं। यह तय करना कठिन हो गया है कि किसका उपयोग सबसे उपयुक्त होगा। कंपनियों के बीच होड़ लगी है—कौन-सा ए.आई. कितना कर सकता है।

निस्संदेह, ए.आई. के फायदे अपार हैं और भविष्य की दुनिया इसी पर आधारित होगी। भारत भी इस दिशा में पीछे नहीं है। आई.आई.टी. जैसे संस्थानों में इस विषय पर शोध और शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री स्वयं भी समय-समय पर ए.आई. की महत्ता पर बोलते हैं और युवाओं को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कुछ नकारात्मक पहलू

ए.आई. के कुछ नकारात्मक पहलू भी नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। आजकल डीपफेक वीडियो एक बड़ी समस्या बन चुके हैं, जिनमें किसी भी चेहरे को बदलकर गलत संदेश फैलाया जा सकता है। इससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि जो हम देख रहे हैं, वह असली है या नकली। हाल ही में एक खबर आई कि एक व्यक्ति ने ए.आई. से दवाइयां सुझवाईं और दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो गई। यह भले ही एक चरम उदाहरण हो, लेकिन चेतावनी अवश्य है। दूसरी ओर, यही ए.आई. मेडिकल फील्ड में कई बार वरदान भी साबित हो रही है—एक जटिल बीमारी का निदान ए.आई. ने सुझाया, जिसे कई विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं पहचान पाए थे।

इसलिए ज़रूरी है कि वरिष्ठ नागरिक भी इस तकनीक से परिचित हों। हमारे पास इतनी जीवनानुभव शक्ति अवश्य है कि हम सही-गलत का अंतर समझ सकें और विवेकपूर्ण ढंग से तय कर सकें कि कितना और किस रूप में इसका उपयोग करना है। नेवर से रिटायर्ड अभियान की ओर से हमारा प्रयास रहेगा कि जल्द ही इस विषय पर कार्यशाला आयोजित की जाए, ताकि वरिष्ठ जन ए.आई. का सही उपयोग सीख सकें।

इस दिशा में केरल सरकार का डिजिकेरेलम कार्यक्रम अनुकरणीय है। इसका उद्देश्य था सभी नागरिकों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना। परिणाम यह रहा कि एक 105 वर्षीय बुज़ुर्ग भी इस पहल के माध्यम से डिजिटल साक्षर बने।

मेरे एक 82 वर्षीय परिचित ने इस पर एक अनोखी टिप्पणी की—

“मैं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) शब्द से असहमत हूं। यह मूलतः मानव बुद्धि का ही उपोत्पाद है, अन्यथा इसकी खोज ही कैसे संभव होती? मेरा सुझाव है कि इसे ‘प्रबंधित बुद्धिमत्ता’ कहा जाए।”

Seniors Must Make the Second Innings Easier

On the cricket field, once the first innings ends, a very important discussion takes place in the dressing room. The team reflects on how to play the second innings. If the first innings went well and the team is in a winning position, then the second innings is played more carefully to ensure victory. But if there were mistakes in the first innings, then the team corrects itself, makes a new strategy, and tries its best to win through the second innings.

Similarly, senior citizens are now moving on to the second inning of their lives referring to those years of life when they have got a break from job, business or regular work. It is in our hands to make this inning easy and enjoyable. We have to understand the importance of our lives. We have to live the moments of life in a simple and beautiful way, in a playful way.

Learning from the First Innings

Today’s youth must understand that the second innings of the future will be beautiful only if the first innings is played thoughtfully. Paying attention to health, living a balanced life, saving and investing, nurturing relationships—these are precautions to be included in daily life from now itself. If we adopt this discipline early, the challenges of the second innings will be far fewer. “The future is safeguarded only by the one who is alert in the present.”

Preparation for Seniors

As far as we elders are concerned, our second innings will be golden only when we learn to take care of ourselves. This is not just a time to pass, but a time to truly live. Growing older does not mean becoming tired. Rather, it is an opportunity to share experiences, refine ourselves, and contribute meaningfully to society. “Age is not weakness, it is the strength of experience.”

Health is the Real Wealth

The first and foremost need in the second innings is health. If body and mind are fit, the joy of life doubles. A little walk, regular exercise, yoga, pranayam, and balanced food—these simple habits give immense strength. Instead of depending on medicines, it is better to adopt prevention. “Wealth may be valuable, but health is priceless.”

Change in Mindset

The biggest challenge in the second innings is mental. After retirement, one suddenly feels separated from the world of work, no longer valued as before. This can bring emptiness and sadness. But if we change our perspective and realize that now we have the opportunity to do what we truly love, that emptiness transforms into enthusiasm.

Adopting new hobbies—music, writing, painting, gardening, or social service—keeps the mind joyful. Learning new technology and staying connected with the digital world also builds confidence. “Change your thinking, and life will change on its own.”

The Strength of Relationships

In the second innings, relationships become the real support. Spending time with family, interacting with children and grandchildren makes life meaningful. Friendships too must be nurtured. True friends stand by us in difficult times and lighten the journey of life. “Relationships are the wealth that only grow richer with time.”

Giving Back to Society

Our experience and knowledge are priceless for society. If we share them with the younger generation, they can avoid many mistakes. Helping the needy, joining an organization in service, teaching children, planting trees—these small acts bring immense satisfaction. “The true joy of life lies in giving, not in receiving.”

The “Never Say Retired” Approach

This philosophy teaches us that retirement is only from a job, not from life. No matter what the age, a person can always remain active. If we awaken within ourselves the belief that “we are never retired,” then every day will feel like a new opportunity. “One retires from work, not from life.”

Conclusion

The second innings will be easy and joyful only if we make it so through our thoughts and actions. If the first innings was played well, then this is the chance to play even better. And if there were shortcomings in the first innings, then the second innings is the opportunity to correct them and move towards victory.

In this phase of life, we must depend less on others and become capable enough to support those in need. That is the true beauty of life—living fully ourselves and showing others the way to live. “The real victory of life is when you make someone else’s life easier.”

दूसरी पारी को वरिष्ठ जन आसान खुद बनाएं

क्रिकेट के मैदान में पहली पारी समाप्त होने के बाद ड्रेसिंग रूम में बहुत अहम बैठक की जाती है। उसमें विचार होता है कि अब दूसरी पारी कैसे खेली जाए। यदि पहली पारी में बहुत अच्छा प्रदर्शन हुआ है और जीत की स्थिति में हैं, तो दूसरी पारी का खेल और सधा हुआ होगा, ताकि जीत सुनिश्चित की जा सके। लेकिन यदि पहली पारी में चूक हुई है, तो टीम अपने आप को सुधारकर, नई रणनीति बनाकर मैदान में उतरती है और पूरी कोशिश करती है कि दूसरी पारी से जीत हासिल की जाए।

इसी तरह वरिष्ठ व्यक्तियों की जिंदगी की पहली पारी से आगे अब दूसरी पारी चल रही है और इस दूसरी पारी का अर्थ है जीवन के वे वर्ष जब नौकरी, व्यापार या नियमित कार्य से विराम मिल चुका है। यह पारी आसान और आनंद में बने, यह हमारे ही हाथ में है। हमें अपनी जिंदगी की अहमियत को समझना होगा। जिंदगी के पलों को खेल-खेल में कुछ सरल और सुंदर तरीके से जीना होगा।

पहली पारी से सीखना

आज के नौजवानों को यह समझना चाहिए कि भविष्य की दूसरी पारी तभी सुंदर बनेगी जब पहली पारी में सोच-समझकर खेला जाए। सेहत पर ध्यान देना, संतुलित जीवन जीना, बचत और निवेश करना, रिश्तों को निभाना – ये सब वही सावधानियां हैं जो आज से ही अपनी दिनचर्या में शामिल करनी होंगी। अगर हम शुरू से यह अनुशासन अपना लें, तो दूसरी पारी की चुनौतियां बहुत कम हो जाएंगी। “भविष्य वही संभाल सकता है, जो वर्तमान में सजग रहता है।”

बुजुर्गों की तैयारी

जहां तक हम बुजुर्गों का सवाल है, हमारी दूसरी पारी तभी सुनहरी बनेगी जब हम स्वयं को संभालना सीखेंगे। यह समय केवल गुजारने का नहीं, बल्कि जीने का है। उम्र बढ़ने का अर्थ थक जाना नहीं होता। बल्कि यह अवसर है अनुभवों को साझा करने का, खुद को निखारने का और समाज में सार्थक योगदान देने का। “उम्र कमजोरी नहीं, अनुभव की ताकत होती है।”

स्वास्थ्य ही असली पूंजी

दूसरी पारी में सबसे पहली ज़रूरत है – स्वास्थ्य की। यदि शरीर और मन स्वस्थ हैं, तो जीवन का आनंद दोगुना हो जाता है। थोड़ी-सी सैर, नियमित व्यायाम, योग, प्राणायाम, और संतुलित भोजन – ये साधारण-सी आदतें हमें बहुत बड़ी ताक़त देती हैं। दवाइयों पर निर्भर होने से बेहतर है कि हम रोकथाम की आदत डालें। “धन से बढ़कर स्वास्थ्य है, और स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं।”

मानसिकता का बदलाव

जीवन की दूसरी पारी को लेकर सबसे बड़ी चुनौती मानसिक होती है। सेवानिवृत्ति के बाद अचानक लगता है कि काम की दुनिया से अलग हो गए, लोग हमें पहले जैसा महत्व नहीं दे रहे। ऐसे में मन में खालीपन और उदासी घर कर सकती है। लेकिन अगर हम दृष्टिकोण बदलें और सोचें कि अब हमारे पास “अपनी पसंद का करने” का अवसर है, तो वही खालीपन उत्साह में बदल जाएगा।

नई रुचियां अपनाना – संगीत, लेखन, पेंटिंग, बागवानी या सामाजिक सेवा – मन को प्रसन्न रखती हैं। नई तकनीक सीखना, डिजिटल दुनिया से जुड़ना भी आत्मविश्वास को बढ़ाता है। “सोच बदलो, जीवन अपने आप बदल जाएगा।”

रिश्तों की ताकत

दूसरी पारी में रिश्ते ही असली सहारा बनते हैं। परिवार के साथ समय बिताना, बच्चों और पोते-पोतियों के साथ संवाद करना, जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है। दोस्ती का दायरा भी बनाए रखना चाहिए। सच्चे मित्र कठिन समय में संबल देते हैं और जीवन के सफर को हल्का कर देते हैं। “रिश्ते वह पूंजी हैं, जो समय के साथ और अमीर बना देती है।”

समाज को लौटाना

हमारे अनुभव और ज्ञान समाज के लिए अनमोल हैं। यदि हम इन्हें युवा पीढ़ी के साथ साझा करें तो वे कई गलतियों से बच सकते हैं। किसी जरूरतमंद की मदद करना, किसी संस्था से जुड़कर सेवा करना, बच्चों को पढ़ाना, पेड़ लगाना – ये छोटे-छोटे कार्य जीवन को बड़ी संतुष्टि देते हैं। “जीवन का सच्चा सुख, देने में है – न कि पाने में।”

‘नेवर से रिटायर्ड’ का दृष्टिकोण

जीवन का यह दर्शन हमें बताता है कि रिटायरमेंट केवल नौकरी से होता है, जीवन से नहीं। उम्र चाहे कितनी भी हो, मनुष्य हमेशा सक्रिय रह सकता है। यदि हम अपने भीतर यह विश्वास जगा लें कि “हम कभी रिटायर्ड नहीं होंगे”, तो हर दिन एक नया अवसर लगेगा। “रिटायरमेंट काम से हो सकता है, जीवन से नहीं।”

निष्कर्ष

दूसरी पारी आसान और आनंदमयी तभी होगी जब हम इसे अपनी सोच और कर्म से आसान बनाएं। अगर पहली पारी में अच्छा खेल चुके हैं तो यह अवसर है कि और बेहतर खेल दिखाएं। और यदि पहली पारी में कुछ कमियां रह गई हों, तो दूसरी पारी में उन्हें सुधारकर जीत की ओर बढ़ें।

जीवन की इस पारी में हमें दूसरों पर निर्भर कम रहना है, बल्कि इतना सक्षम बनना है कि हम जरूरतमंदों को सहारा दे सकें। यही जीवन का असली सौंदर्य है – खुद जीना और दूसरों को जीने की राह दिखाना। “जीवन की जीत वह है, जब आप दूसरों की जिंदगी आसान बना दें।”